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शेष स्ख ति या

लेखक

रघुवीरसिंह, डी० लिट्‌०

श्राचाये-प्रवर पं० रसचल्द्र जो शुक्ल लिखित “प्रवेशिका” सहित

१९५१ राजकमल प्रकाशन, नई दिल्‍ली : बम्बई

प्रकाशक राजकमल प्रकाशन लिमिटेड नई दिल्‍ली : वम्बई

पहली वार--सन्‌ १९३९ ई०

दूसरी वार--सन्‌ १९४६ ई०

तीसरी वार--सन्‌ १९५१ ई० सूल्य ४)

मुद्रक--जे० के० शर्मा, इलाहाबाद लॉ जर्तल प्रेस इलाहाबाद

जिनकी अब स्मृति-मात्र शेष है उन्हीं मेरी पृज्या स्वर्गीया जननी की उस शेष स्मृति को ये “शेष स्पृतियाँ”? सादर ससनेह समर्पित

विषय सूची

प्रवेशिका--आचार्य-प्रवर पं० रामचन्द्र जी शुक्ल दोष स्मृतियाँ ४७ मे २--एक स्वप्न की शेष स्मृतियाँ ७३ ३--अवशेष ९७ ४--तीन कम्रें १०९

५--उजड़ा स्वर्ग १२७

प्रवेशिकाए

अतीत की स्मृति सें सनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है अर्थ-परायण लाख कहा करें कि 'गड़े सुरदे उखाड़ने से क्‍या फ़ायदा' पर हृदय नहीं सावचता, बार बार अतीत की ओर जाया करता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता इसमें कुछ रहस्य अवश्य हें। हृदय के लिए अतीत मुक्ति-लोक है जहाँ वह अनेक बन्धनों से छूटा रहता है और अपने शुद्ध रूप सें विचरता हैँ। वत्तेमान हमें अन्धा बनाए रहता हैं; अतीत बीच बीच सें हमारी आँखें खोलता रहता है सें तो समझता हूँ कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण सनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ परदा रहता है दीती विलारने वाले आगे की सुध' रखने का दावा किया करें, परि- णाम॒ अशान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वत्तेमान को संभालने ओर आगे की सुध रखने का डंका पीने वाले संसार में जितने ही अधिक होते जाते हूँ संघशक्ति के प्रभाव से जीवन की उलभनें उतनी हो बढ़ती जाती हैं। बीती बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अखंडता और व्यापकता की अनुभूति का विसर्जन, सहृदयता और भावुकदा का भंग--केवल अर्थ की निष्ठुर कीड़ा

कुशल यही हे कि जिनका दिल सही सलामत हैं, जिनका हृदय नारा नहीं यया है, उनकी दृष्टि अतीत की ओर जाती है। क्यों जाती हैं, “या करने जाती है, यह बताते नहीं बदता अतीत कल्पना का लोक है, एक प्रकार का स्वप्नलोक है, इसमें तो सन्देह नहीं अतः यदि वल्पवालोक के सब खंडों को सुखपूर्ण मान लें तब तो प्रश्न देढ़ा नहों रह जाता; भट से कहा जा सकता हैँ कि वह सुख प्राप्त करने

बन नग्न

जाती है पर मेरी समझ में अतीत की ओर सुड़ सुड़ कर देखने की प्रवृत्ति सुख-दुःख की भावना से परे है। स्मृतियाँ मुझे केवल “सुख- पूर्ण दिनों के भग्नावशेष नहीं समझ पड़तीं वे हमें लोन करती हैं, हमारा मर्स स्पर्श करती हैँ, बस, हम इतना ही कह सकते हैं जसे अपने व्यक्तिगत अतीत जीवन की मधुर स्मृति मनुष्य में होती है वैसे ही समष्टि रूप में अतीत नर-जीवन की भी एक प्रकार की स्मृत्याभास कल्पना होती है जो इतिहास के संकेत पर जगती है इसकी मासिकता भी निज के अतीत जीवन की स्मृति की मामिकता , के समान ही होती हैं। नर-जीवन की चिरकाल से चली आती हुईं अखंड परम्परा के साथ तादात्म्य की यह भावना आत्मा के शुद्ध स्वरूप की नित्यता और असीमता का आभास देती है। यह स्मृति- स्वरूपा कल्पना कभी कभी प्रत्यभिज्ञान का भी रूप धारण करती हैं। जेसे प्रसंग उठने पर इतिहास द्वारा ज्ञात किसी घटना के ब्योरों को कहीं वेठे बेठे हम मन में लाया करते हैं, वेसे ही किसी इतिहास- प्रसिद्ध स्थल पर पहुँचने पर हमारी कल्पना या मूत्ते भावना चट उस स्थल पर की किसी सामिक घटना के अथवा उससे सम्बन्ध रखने वाले कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों के बीच हमें पहुँचा देती है जहाँ से फिर हम वत्तेसान की ओर लौट कर कहने लगते हं--यह वही स्थल है जो कभी सजावट से जगमगाता था, जहाँ अमुक सम्राट सभासदों के बीच सिंहासन पर बिराजते थे; यह वही द्वार हैँ जहाँ अमुक राजपूत वीर अपूर्व पराक्रम के साथ लड़ा था इत्यादि इस प्रकार हम उस काल से लेकर इस काल तक अपनी सत्ता के आरोप का अनुभव करते हैं अतीत की कल्पना स्मृति की सी सजीवता प्राप्त करके अवसर पाकर प्रत्यभिज्ञान का स्वरूप धारण कर सकती हुँ जिसका आधार या तो आप्त शब्द (इतिहास) अथवा अनुमान होता हैं अतीत की यह स्मृति-स्वरूपा कल्पना कितनी मधुर, कितनी मामिक ओर कितर्न

लत ई्े किन

लीन करने वाली होती हैं, सहृदयों से छिपा है, छिपाते बनता है मनुष्य की अन्तःप्रकृति पर इसका प्रबल प्रभाव स्पष्ट है। हृदय रखने वाले इसका प्रभाव, इसकी सजीवता अस्वीकृत नहीं कर सकते इस प्रभाव का, इस सजीवता का, मूल है सत्य सत्य से अनुप्राणित होने के कारण ही कल्पना स्मृति और प्रत्यभिज्ञात का सा सजीव रूप प्राप्त करती है कल्पना के इस स्वरूप की सत्यमूलक सजीवता का अनुभव करके ही संस्कृत के पुराने कवि अपने सहाकाव्य और ज्ञाठक किसी इतिहास-पुराण के वृत्त का आधार ले कर ही रचा करते थे सत्य से यहाँ अभिप्राय केबल बस्तुतः घटित बृत्त ही नहीं नि३च- यात्मकता से प्रतीत वृत्त भी हें। जो बात इतिहासों में प्रसिद्ध चली रही है वह यदि प्रम्नाणों से पुष्ठ भी हो तो भी लोगों के विद्वास के बल पर उक्त प्रकार की स्मृति-स्वरूपा कल्पना का आधार हो जाती है। आवद्यक होता हैं इस बात का पूर्ण विश्वास कि इस प्रकार को घटना इस स्थल पर हुईं थी यदि ऐसा विश्वास कुछ विरुद्ध प्रभाण उपस्थित होने पर विचलित हो जायगा तो इस रूप की कल्पना जगेगी दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि आप्त वचन या इतिहास के संकेत पर चलने वाली मूत्ते भावना भी अनुमान का सहारा लेती हें। कभी कभी तो शुद्ध अनुमिति ही मूत्ते भावना का परिचालन करती हैँ यदि किसी अपरिचित प्रदेश में भी किसी विस्तृत खंडहर पर हम जा बेठें तो इस अनुमान के बल पर ही कि यहाँ कभी अच्छी बस्ती थी, हम प्रत्यभिज्ञान के ढंग पर्‌ इस प्रकार की कल्पना में प्रवृत्त हो जाते हैं कि 'यह वही स्थल है जहाँ कभी पुराने मित्रों की संडली जमती थी, रमणियों का हास-विलास होता था, बालकों का क्रीड़ा-करूरव सुनाई पड़ता था” इत्यादि कहने की आव- श्यकता नहीं कि प्रत्यभिज्ञान-स्वरूपा यह कोरी अनुमानाश्रित कल्पना भी सत्यमूल होती है। वत्तेमान समाज का चित्र सामने छाने वाले उपत्यात्त भी अनुमानाश्चित होने के कारण सत्यमूल होते हैं

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हमारे लिए व्यक्त सत्य हैं जगत्‌ ओर जीवन इन्हीं के अन्त- भूत रूप-व्यापार हमारे हृदय पर सासिक प्रभाव डालकर हमारे भावों का प्रवत्तंस करते हैं; इन्हीं रूप-व्यापारों के भीतर हम भग- वान्‌ की कल्पना का साक्षात्कार करते हैं, इन्हीं का सूत्र पकड़ कर हसारी भावत्रा भगवान्‌ तक पहुँचती हैं। जगत्‌ ओर जीवन के ये रूप-प्यापार अनन्त हैं कल्पना द्वारा उपस्थित कोई रूप-व्यापार जब हनके सेल में होता है तब इन्हीं में से एक प्रतीत होता है, अतः ऐसा काव्य सत्य के अन्तर्गत होता है। उसी का गम्भीर प्रभाव पड़ता है। वही हमारे मर्स का स्पदों करता है। कल्पना की जो कोरी उड़ान इस प्रकार सत्य पर आश्रित नहीं बह हलके मनोरंजन की वस्तु है; उसका प्रभाव केवल बेल-बूटे या नक्ञक्ाशी का-सा होता है, सामिक नहीं हमारा भारतीय इतिहास जाने कितने मार्मिक वृत्तों से भरा पड़ा हैं में बहुत दिनों से इस आसरे में था कि सच्ची ऐतिहासिक कल्पना वाले प्रतिभा-सम्पन्न कवि और लेखक हमारे वर्त्तमान हिन्द साहित्य-क्षेत्र में प्रकट हों। किसी काल की सच्ची ऐतिहासिक कल्पना प्राप्त करने के लिए उस काल से सम्बन्ध रखने वाली सारी उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री की छान-बीन अपेक्षित होती है ऐसी छान-बीन कोरे विद्वान्‌ तो करते ही रहते हूँ पर उसकी सहायता से किसी काल का जीता-जागता सच्चा चित्र वें ही खड़ा कर सकते हैं जिनकी प्रतिभा काल का मोटा परदा पार करके अतीत का एका- एक ब्योरा भलका देती हैं। आसरा देखते-देखते स्वर्गीय प्रसाद जी के नाटक सामने आए जिनमें प्राचीन भारत की बहुत-कुछ मधुर ऋलक मिली। उनके देहावसान के कुछ दित पूर्व मेंने उपन्यासों को झूप में भी ऐसी भाँकी दिखाने का अनुरोध उनसे किया था जो उनके मन में बेठ भी गया था। नाटकों के रूप में ऐतिहासिक कल्पना का अतीत-प्रदर्शधक विधान

क्न्क प्‌ तन

देखने पर भावात्सक प्रबन्धों के रूप सें स्मृति-स्वरूपा या प्रत्यभिज्ञाच- स्वरूपा कल्पना का प्रवत्तेत देखने की लालसा, जो पहले से सन सें लिपटी चली आती थी प्रबल हो उठी किधर से यह लालसा पूरी होगी, यह देख ही रहा था कि, ताजमह्॒ और एक स्वप्स की शेष स्मृतियाँ' चासक दो गद्य-प्रबन्ध देखने में आए। दोनों के लेखक थे सहाराजकुमार श्री रघृबीरसिहजी आशा ने एक आधार पाया उक्त दोनों प्रव॒त्धों में जिस प्रतिभा के दर्शन हुए उसके स्वरूप को समभने का प्रयत्त में करने लगा। पहली बात सुभे यह दिखाई पड़ी कि सहाराजकुमार की दृष्टि उस कालखंड के भीतर रसी है जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल' कहलाता है। आपकी कल्पना और भादना को जगाने वाले उस काल के कुछ स्मारक चिह्न हें, यह देख कर इसका भी आभास मिला कि आपकी कल्पना किस ढंग की हूँ। जान पड़ा कि वह स्मृति-स्वरूपा है, जिसकी सासिकता के सस्बन्ध से पहले कहा जा चुका है। सहाराजकुमार ऐसे इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान्‌ के हृदय में ऐसा भाव-सागर लहराते देख में तृप्त हो गया। विद्ता और भावुकता का ऐसा योग संसार में अत्यन्त विरल ह।

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भस्तुत संग्रह का नाम हैँ शेष स्मृतियाँ” इसमें महाराज- हुसार के पाँच भावात्मक निवन्ध हैँ जिनके लक्ष्य हें--ताजमहल, अतहपुर सीकरी, आगरे का क़िला, लाहौर की तीन (जहाँगीर पूरजहों ओर अनारकली की) क़ब्नें और दिल्‍ली का क़िला कहने की आवश्यकता नहीं कि ये पाँचों स्थान जिस प्रकार मुग़ल-सम्प्रादों ते एश्वय, विभृति, प्रताप, आमोद-प्रमोद और भोग-बविलास के प्प्रक हूं उसी प्रकार उनके अवसाद, विषाद, भमैराइय और घोर पतन 3 मनुष्य की ऐंडवर्य, विभति, सूख और सौंदर्य की वासना अभि- पकत होकर जगत्‌ के किसी छोटे या बड़े खंड को अपने रंग में रंग

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हमारे लिए व्यकत सत्य हैं जगत और जीवन इन्हीं के अन्त- भूत रूप-व्यापार हमारे हृदय पर सासिक प्रभाव डालकर हमारे भावों का प्रवत्तेन करते हैं; इन्हीं रूप-व्यापारों के भीतर हम भग- वान्‌ की कल्पना का साक्षात्कार करते हैं, इन्हीं का सत्र पकड़ कर हसारी सावत्रा भगवान्‌ तक पहुँचती हैं। जगतू और जीवन के ये रूप-ब्यापार अनन्त हैं। कल्पना द्वारा उपस्थित कोई झूप-व्यापार जब हनके सेल में होता है तब इन्हीं में से एक प्रतीत होता है, अतः ऐसा काव्य सत्य के अन्तर्गत होता है। उसी का गम्भीर प्रभाव पड़ता है। वही हमारे मर्म का स्पश करता है। कल्पना की जो कोरी उड़ान इस प्रकार सत्य पर आश्रित नहीं वह हलके मनोरंजन की वस्तु है; उसका प्रभाव केवल बेल-बूटे या नक़क़ाशी का-सा होता है, सामिक नहीं हमारा भारतीय इतिहास जाने कितने मामिक वृत्तों से भरा पड़ा हैँ में बहुत दिनों से इस आसरे में था कि सच्ची ऐतिहासिक

कल्पना वाले प्रतिभा-सम्पन्न कवि और लेखक हमारे वत्तंमान हिन्दी '

साहित्य-क्षेत्र में प्रकट हों किसी काल की सच्ची ऐतिहासिक कल्पना प्राप्त करने के लिए उस काल से सम्बन्ध रखने वाली सारी उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री की छान-बीन अपेक्षित होती हैँ ऐसी छान-बीन कोरे विद्वान तो करते ही रहते हैं पर उसकी सहायता से किसी काल का जीता-जागता सच्चा चित्र वें ही खड़ा कर सकते हैं जिनकी प्रतिभा काल का मोटा परदा पार करके अतीत का एक- एक ब्योरा भलका देती हैं। आसरा देखते-देखले स्वर्गीय प्रसाद जी के नाठक सामने आए जिनमें प्राद्चीच भारत की बहुत-कुछ मधुर ऋलक मिली उनके देहावसान के कुछ दिन पूर्व मेंने उपन्यासों के रूप में भी ऐसी भाँकी दिखाने का अनुरोध उनसे किया था जो उनके भन में बेठ भी गया था।

दाठकों के रूप में ऐतिहासिक कल्पना का अतीत-प्रद्शक विधान

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देखने पर भावात्सक प्रबन्धों के रूप सें स्मृति-स्वरूपा या प्रत्यभिज्ञान- स्वरूपा कल्पना का प्रवत्तेत देखने की लालसा, जो पहले से सत सें लिपटी चली आती थी प्रबल हो उठी किधर से यह लालसा पूरी होगी, यह देख ही रहा था कि, ताजमह्॒र और एक स्वप्न की शेष स्मृतियाँ' चासक दो गद्य-प्रबच्ध देखने में आए। दोनों के लेखक थे सहाराजकुमार श्री रघुदीरसिहजी आशा ने एक आधार पाया उक्त दोनों प्रद॒न्धों में जिस प्रतिभा के दर्शन हुए उसके स्वरूप को समभने छा प्रयत्त में करने रगा। पहली बात सुभे यह दिखाई पड़ी कि सहाराजकुसार की दृष्टि उस कालखंड के भीतर रमी है जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल' कहलाता है। आपकी कल्पना ओर भादना को जगाने वाले उस काल के कुछ स्मारक चिद्न हैं, पह देख कर इसका भी आभास सिला कि आपकी कल्पना किस ढंग की हू। जान पड़ा कि वह स्सृति-स्वरूपा है, जिसकी सामिकता के सस्बन्ध में पहले कहा जा चुका है। महाराजकुमार ऐसे इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान के हृदय में ऐसा भाव-सागर लहराते देख में तृप्त हो गया। विद्वत्त और भावकता का ऐसा योग संसार में अत्यन्त विरल है।

प्रस्तुत संग्रह का नाम हैँ शेष स्मृतियाँ” इसमें महाराज- कुमार के पाँच भावात्मक निवन्ध हें जिनके लक्ष्य हें--ताजमहल, अतहपुर सीकरी, आगरे का क़िला, लाहौर की तीन (जहाँगीर, नूरजहाँ ओर अनारकली की) क़ब्नें और दिल्‍ली का क्लिला कहने दी आवश्यकता नहीं कि ये पाँचों स्थान जिस प्रकार मग़ल-सम्राटों के एश्दय, विभूति, प्रताप, आमोद-प्रमोद और भोग-विलास के प्पारक हैं उसी प्रकार उनके अवसाद, विषाद, नैराइय और घोर पदन 5 सनुष्य को ऐंशवर्य, विभूति, सुख और सौंदर्य की वासना अभि- व्यय होकर जगत्‌ के किसी छोटे या बड़े खंड को अपने रंग सें रँग *< भानुदी सजीवता प्रदान करती है। देखते-देखते काल उस

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वासना के आश्रय मनुष्यों को हटाकर किनारे कर देता है। धीरे-धोरे ऐश्वर्य-विभूति का वह रंग भी मिटता जाता है। जो-कुछ दोष रह जाता हैं वह बहुत दिनों तक ईंट-पत्थर की भाषा में एक पुरानी कहानी कहता रहता हैँ संसार का पथिक मनुष्य उसे अपनी कहानी समक्त कर सुनता हे क्योंकि उसके भीतर भलकता है जीवन का नित्य और प्रकृत स्वरूप

ये स्मारक जाने कितनी बातें अपने पेट में लिए कहीं खड़े, कहीं बेठे, कहीं पड़े हें। सीकरी का बुलन्द दरवाज़ा खड़ा है महाराजकुमार उसके सामने जाते हैं और सोचते हैँ--

“यदि आज यह दरवाज़ा अपने संस्मरण कहने लगे, पत्थरों का यह ढेर बोल उठे, तो भारत के जाने कितने अज्ञात इतिहास का पता लग जावे और जाने कितनी ऐतिहासिक त्रुटियाँ ठीक की जा सकें ।”

कुछ व्यक्तियों के स्मारक चिह्न तो उनके पीछे उनके पूरे प्रति- निधि या प्रतीक बन जाते हैं और उसी प्रकार घ॒णा या प्रेम के आल- म्बन हो जाते हैं जिस प्रकार अपने जीवन-काल में वे व्यक्ति थे--

“जीवन बीत चुकने पर जब मनुष्य उसे समेट कर इस लोक से विदा लेता है तब संसार उस विगत आत्मा के संसर्ग में आईं हुई वस्तुओं पर प्रह्मर कर या उन्हें चूम कर समभ लेता है कि वह उस अन्तहित आत्मा के प्रति अपने भाव प्रकट कर रहा है उस मृत व्यक्ति के पाप या पुण्य का भार उठाते हें उसके जीवन से सम्बद्ध ईंट और पत्थर ।”

किसी अतीत जीवन के ये स्मारक या तो यों ही, जश्ञायद काल की कृपा से, बने रह जाते हैं अथवा जान-बूभ कर छोड़े जाते हूँ जान-बुभ कर कुछ स्मारक छोड़ जाने को कामना भी मनुष्य की प्रकृति के अन्तर्गत हैं। अपनी सत्ता के छोप की भावना मनुष्य को असह्य हैं। अपनी भौतिक सत्ता तो वह बनाए नहीं रख सकता;

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अतः वह चाहता है कि उस सत्ता की स्मृति ही किसी जन-समूह फे दोच बनी रहे बाह्म जगत्‌ सें नहीं तो अन्तर्जंगत्‌ फे किसी खंड सें हो वह उसे बताए रखना चाहता है इसे हम असरत्व की आकांक्षा था आत्मा के नित्यत्व का इच्छात्सक आभास कह सकते हेँ--

“अ्विष्य में जाने वाले अपने अन्त के तथा उसके अनन्तर अपने व्यक्तित्व के ही नहीं, अपने सर्वेस्व के, विनष्ट होने के विचार मात्र से ही मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है ।....... मनुष्य इस भौतिक संसार में अपनी स्मृतियाँ--अमिट स्मृतियाँ--छोड़ जाने को विकल हो उठते हैं ।”

अपनो स्मृति बनाए रखने के लिए कुछ सनस्वी फला का सहारा

कि प्पी७प

लेते हैं और उसके आकर्षक सोौंदय की प्रतिष्ठा करके विस्मृति के

वर्ष तक--थासे रहते हे--

“यद्यपि समय के सामने किसी की भी नहीं चलछती तथापि कई मस्तिष्कों ने ऐसी खूबी से काम किया, उन्होंने ऐसी चालें चलीं कि समय के इस प्रलूयंकारी भीषण प्रवाह को भी बाँधने में वे समर्थ हुए। उन्होंने काछू को सौन्दर्य के अदृश्य किन्तु अचूक पादा में बाँध डाला है, उसे अपनी कृतियों की अनोखी छटा दिखा कर लाया हे यों उसे भुलावा देकर कई वार मनुष्य अपनी स्मृति के ही नहीं, किन्तु अपने भावों के स्मारकों को भी चिरस्थायी वना सका हैँ ।”

इस प्रकार ये स्मारक फाल के प्रदाह को कुछ थाम कर मनुष्य वे कई पीढ़ियों की आँखों से आँसू बहवाते चले चलते हैं। मनुष्य भेपने पीछे होने बाले सनुष्यों को अपने लिए रुलाना चाहता हैं। पहाराजकुमार के जामने सत्रादों को अतीत जीवन-लीला फे ध्वस्त मंच हैँ, सामान्य जनता की जीवन-लीला फे नहीं इनमें जिस भफार भाष्य के ऊँचे-से-ऊँचे उत्थान का दृश्य निहित है वैसे ही गहरे-

स-गहूर पतन का भी जो जितने हो ऊँचे पर चढ़ा दिखाई देता है

अन्न यथ नमन

गिरने पर वह उतना ही नीचे जाता दिखाई देता है। दक्षकों को उसके उत्थान की ऊँचाई जितनी कुतृहलपृर्ण और विस्मयकारिणी होती हैं उतनी ही उसके पतन की गहराई सामिक और आकर्षक होती हैं असामान्य की ओर लोगों की दृष्टि भी अधिक दौड़ती है, टकटकी भी अधिक लगती हेँ। अत्यन्त ऊँचाई से गिरने का दृदय मनुष्य कुतृहल के साथ देखता है, जैसा कि इन प्रव॒न्धों में भावक छेखक कहते हेँ--

“ऊँचाई से खड़ड में गिरते वाले जलूप्रपात को देखने के लिए सेकड़ों कोसों की दूरी से मनुष्य चले आते हैं।. .. .... . उन उठे हुए कगारों पर टकरा कर उस जलूघारा का छितरा जाना, खंड-खंड होकर फूहारों के स्वरूप में यत्र-तत्र विखर जाना, हवा में मिल जाना “-वंस इसी दृश्य को देखने में मनृष्य को आनन्द आता है ।”

जीवन तो जीवन--चाहे राजा का हो, चाहे रंक का उसके सुख ओर दुःख दो पक्ष होंगे ही इनमें से कोई पक्ष स्थिर नहीं रह सकता संसार और स्थिरता ? अतीत के हरूम्बे-चोड़े सेदान के बीच इन उभय पक्षों की घोर विषमता सामने रख कर आप जिस भाव-धारा में ड़बे हैँ उसी में ओरों को भी डुबाने के लिए भावुक महाराजकुमार ने ये शब्द-लोत बहाए हैं। इस पुनीत भाव-घारा में अवगाहन करने से वत्तेमान की, अपने-पराये की, रूगी-लिपटी मेरू छंटती हैं और हृदय स्वच्छ होता है सुख-दुःख की विषमता पर जिसकी भावना मुख्यतः प्रवृत्त होगी वह अवश्य एक ओर तो जीवन का भोग-पक्ष--यौवन-मद, विलास की प्रभूत सामग्री, कला-सौंदर्य की जगमगाहट, राग-रंग और आमोद-प्रमोद की चहल-पहल--और दूसरी ओर अवसाद, नेराइय और उदासी सामने रखेगा इतिहास- प्रसिद्ध बड़े-बड़े प्रतापी सम्रादों के जीवन को लेकर भी वह ऐसा ही करेगा। उनके तेज, प्रताप, पराक्रम, इत्यादि की भावना वह इतिहास- विज्ञ पाठक की सहृदयता पर छोड़ देगा अपनी पुस्तक में महाराज-

-> १६ «-

कुमार ने अधिकांश में जो जीवन के भोग-पक्ष का ही अधिक विधान किया है उसका कारण सुझे यही प्रतीत होता है। इसी से मर्द और प्याले' बार बार सामने आए हैं जो किसी को खठक सकते हें

कहने की आवश्यकता नहीं सुख और दुःख के बीच का वेषम्य जैसा सासिक और हृदयस्पर्शी होता है बेसा ही उन्नति और अवनति, प्रताप और ह्वास के बीच का भी। इस बेजस्थ-प्रदर्शत के लिए एक ओर तो किसी के पतन-काल के असासर्थ्य, दीनता, विवशता, उदासीनता इत्यादि के दृश्य सामने रखे जाते हैँ; दूसरी ओर उसके ऐंश्वर्य-काल के प्रताप, तेज, पराक्षम इत्पादि के वृत्त स्मरण किए जाते हूँ। प्रस्तुत पुस्तक में दिल्‍ली को क़िले के प्रसंग सें शाहआलम, मुहम्मद- दाह और बहादुरशह के बुरे दिलों के चुने चित्र दिखा कर जो गृढ़ और गंभीर प्रभाव डाला गया हैँ उसे हृदय के भीतर गहराई तक पहुँचाने दाली वस्तु है अकबर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि बादशाहों के ठेज, प्रताप और पराक्रम की भावना। पर जेसा कि कहा जा चुद हैँ भावुक लेखक ने इस भावना को प्रायः व्यक्त नहीं किया है;

उसे पाठक के अन्तःकरण में इतिहास द्वारा प्रतिष्ठित सान लिया

॥४

बात यह हूँ कि सझादों के प्रभुत्व, प्रताप, अधिकार इत्यादि सूचित करने वाली घटनाओं का उल्लेख तो इतिहास करता ही हैं, अतः भादुझ कदि या लेखक अपनी कल्पना हारा जीवन के उन भीतरो-दाहरी व्योरों को सामने लाता है जिन्हें इतिहास निष्प्रयोजन समझ छल्लग सारता हुआ छोड़ जाता है। ताजमहल जिस दिन उन दार पूरा हो गया होगा और ज्ञाहजहाँ बड़ी घूस-धाम को साथ पहुले-पहल उसे देखने गया होगा वह दिन कितने महत्त्व का रहा छोगा पर जैसा कि सहाराजकुमार कहते हैं, “उस महान्‌ दिवस

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सवारों ने कहीं भी नहीं किया है। कितने

२०७

सहस्न नर-तारी आंबाल-वृद्ध उस दिन उस अपूरव मक़बरें के दर्शनार्थ एकत्र हुए होंगे ? . . . .भिन्न-भिन्न दर्शकों के हदयों में कितने विभिन्न भाव उत्पन्न हुए होंगे ? .. . .जिस समय शाह- जहाँ ने ताज के उस अद्वितीय दरवाज़े पर खड़े होकर उस समाधि को देखा होगा उस समय उसके हृदय की क्‍या दशा हुई होगी ?” भावुक लेखक की कल्पना इतिहास हारा छोड़े हुए जीवन के ब्योरों को सासने रखने में प्रवृत्त हुई है बात बहुत ठीक हैं इस सम्बन्ध में मेरा कहना इतना ही है कि इतिहास के शुष्क निर्जीव विधान में तेज, प्रताप ओर प्रभुत्व व्यंजित करने वाले व्योरे भी छूटे रहते हैं उनके सजीब चित्र भी शक्तिशाली ऐतिहासिक पठुषों की जीवन-स्मृति में अपेक्षित हैं। आशा हैं उनकी ओर भी महाराजकुमार की भाव- प्रेरित कल्पना प्रवृत्त होगी

शेष स्सृतियाँ' में अधिकतर जीवन का भोग-पक्ष विदृत है पर यह विवृति सुख-सौन्दर्य की अस्थिरता की भावना को विषण्णता प्रदान करती दिखाई पड़ती है इसे हम लेखक का साध्य नहीं ठहरा सकते संसार में सुख की भावना किस प्रकार सापेक्ष हे इसकी ओर उनकी दृष्टि है। वे कहते हँं--

“दुःख के बिना सुख ! नहीं, नहीं ! तब तो स्वर्ग नरक से भी अधिक दुःखपूर्ण हो जायगा।. ... . . . स्वर्ग का महत्त्व तभी हो सकता है जब उसके साथ नरक भी हो स्वर्ग के निवासी उसको देखें तथा स्वर्ग की ओर नरकवासियों द्वारा डाली जाने वाली तरसभरी दृष्टि की प्यास को समभ सके ।”

मनुष्य के हृदय से स्वतन्त्र सुख-दुःख की, स्वर्गे-नरक की, कोई सत्ता नहीं जो सुख-दुःख को कुछ नहीं समभते, यदि वे फहों हों भी तो समझना चाहिए कि उनके पास हृदय नहीं है; वे दिलवाले

नहीं--

“स्वर्ग और नरक | उनका भेद, सौन्दर्य और कुरूपता, . . . . -

न. रे ]

इनको तो वे ही समझ सकते हें जिनके वक्ष:स्थल में एक दिल--- चाहे वह अधजला, भूलसा या दठूटा हुआ ही क्यों हो--धड़कता हो। उस स्वर्ग को, उस नरक को, दिलवालों ने ही तो बसाया। यह दुनिया, इसके बन्धन, सुख ओर दुःख. ... . . ये सब भी तो दिलदारों के ही आसरे हैं ।*

“अनन्त यौवन, चिर सुख तथा मस्ती इन सब का निर्माण करके दिल ने उस स्वर्ग की नींव डाली थी परन्तु साथ ही असंतोष तथा दुःख का निर्माण भी तो दिल के ही हाथों हुआ था ।”

सुख के साथ दुःख भी लुका-छिपा लगा रहता है और कभी- स-कभी प्रकट हो कर उस सुख का अच्त कर देता है--

“दिलवालों के स्वर्ग में तरक का विष फंछा। अनन्तयोवना विषकन्या भी होती हैँ। उसका सहवास करके कौन चिरजीवी हुआ हू ? सुख को दुःख के भूत ने सताया। मस्ती और उचन्माद को क्षयरूपी राजरोग लगा ।”

जद संसार में कोई वस्तु स्थायी नहीं तो सुख-दशा कंसे स्थायी रह सकती हूँ ? जिसे कभी पूर्ण सुख-समृद्धि प्राप्त थी उसके लिए दोदल उस सुख-दरशा का अभाव ही दुःख स्वरूप होगा उसे सामान्य दशा हो दुःख की दक्षा प्रतोत होगी जो राजा रह चुका है उसकी स्थिति यदि एक सम्पन्न गृहस्थी की सी हो जायगी तो उसे वह दुःख की दशा ही भादेगा सुख की यह सापेक्षता समष्ठि रूप में दुःख की अनुभूति की अधिकता बनाए रहती हैं किसी एक व्यक्ति के जीवन

भी, एक फुल या वंश की परंपरा सें भी ।इसी से यह संसार दुःखसय कहा जाता हैं।

ईसे दुःखसय संसोर में सुख को इच्छा और प्रयत्न प्राणियों को विशेषता है यह दिशेषता मनष्य में सबसे अधिक रूपों में विकसित ६६ ह। भनृष्य को सुखेच्छा कितनी प्रबल, कितनी शक्षितशालिनी निकली ! जाने फद से घह प्रकृति को फाठती-छाँटती, संसार

कलर हक नल

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का कायापलट करती चली रही है बह शायद अनन्त है, अनन्त का प्रतीक है वह इस संसार में समा सकी तब कल्पना को साथ लेकर उसने कहीं बहुत दूर स्वर्ग की रचना कौ--

“अमरत्व की भावना ही मनुष्य के जीवन को सौन्दर्य तथा साधुय से पूर्ण बनाती है। यह भौतिक स्वर्ग या उस पार का वह बहिश्त, एक .ही भावना, चिर सुख की इच्छा ही उनमें पाई जाती हे

इस चिर सुख के लिए मनृष्य जीवन भर रूगातार प्रयत्न करता रहता है; अनेक प्रकार के दुःख, अनेक प्रकार के कष्ट उठाता रहता हैं। इस दुःख और कछष्ठ की परंपरा के बीच में सुख की जो थोड़ी सी भालक सिल जाती हैँ वह उसको ललूचाते रहने भर के लिए होती है, पर उसी को वह सुख सान लेता ह--

“स्वर्ग-सुख, सुख-इच्छा का भावनापूर्ण पुंज, वह तो मनुष्य की कठिनाइयों को, सुख तक पहुँचने के लिए उठाए गए कष्टों को देख कर हँस देता है, और मनुष्य उसी कुटिल हँसी से ही मुग्ध होकर स्वर्ग-प्राप्ति का अनुभव करता हे ।*

उत्तरोत्तर सुख की इच्छा यदि मनुष्य के हृदय में घरन किए हो दो शायद उसे दुःख के इतने अधिक और इतने कड़े धक्के सहने पड़ें जिसे संसार अत्यन्त समुद्धिश्ञाली, अत्यन्त सुखी समभता है उसके हृदय पर कितनी चोटें पड़ी हैं कोई जानता हैँ ? बाहर से देखने वालों को अकबर के जीवन में शान्ति और सफलता ही दिखाई पड़ती है पर हमारे भावुक लेखक की दृष्टि जब फ़्ेहपुर सीकरी के लाल-लाल पत्थरों के भीतर घुसी तब वहाँ अकबर के हृदय के टुकड़े मिले-- |

“अपनी आश्ाओं और कामनाओं को निष्ठुर संसार द्वारा कुचले जाते देख कर अकवर रो पड़ा। उसका सजीव कोमल हृदय फट कर टुकड़े टुकड़े हो गया वे टुकड़े सारे भग्न स्वप्नलोक में बिखर

नल र्‌ रे क्ल्क

गए, निर्जीव होकर पथरा गए। सीकरी के छाल छाल खण्डहर अकबर के उस विशाल हृदय के रक्त से सने हुए टुकड़े हें ।”

चतुर्दर्ग सें इसी सुख का नास ही कार्सा हैं। यद्यपि देखने में 'अथे! और कासां अलूग अलूग दिखाई पड़ते हैँ, पर सच पूछिए तो अर्थ! कार्सा का ही एक साधन ठहरता है, साध्य रहता है कार्मा या सुख हो अथैसंचणय, आयोजन और तैयारी की भूमि है; कास भोग-भूमि है। सनुष्य कभी अर्थ-भूसि पर रहता है, कभी काम- भूमि पर अ-साधना और कास-साधना के बीच जीवन बाँटता हुआ वह चला चलता है। दोनों के स्वरूप “दोनों भ्रुवों की नाईं विभिन्न हैं” इन दोनों में अच्छा सामंजस्थ रखता सफलता के सार्ग पर चलरा है। जो अनन्य भाव से अर्थ-साधना में ही लीन रहेगा वह हृदय झो देगा; जो आँख मूँद कर कास-साधना में ही लिप्त रहेगा बह किसी अर्थ का रहेगा ! अकबर ने किस प्रकार दोनों का सेल किया था, देखिए---

“स्वप्वलोक के स्वप्तागार में पड़ा अकबर साम्राज्य-संचालन का स्वप्त देखा करता था राज्य-कार्य करते हुए भी सुख-भोग का मद उतरने देने के लिए अकवर ने इस स्वप्नागार की सृष्टि की थी ।”

अकवर को अपना साम्माज्य दृढ़ करने के लिए बहुत कष्ट उठाने पड़े थे, बड़ी तपस्या करनी पड़ी थी, पर उसके हृदय की वासनाएँ गारो नहीं गईं थीं----

'आरम्भिक दिनों की तपस्या उसकी उमड़ती हुईं उमंगों को नह दवा सकी थी। विलास-वासना की ज्वाला अब भी अकवर के दिल में जछ रही थी, केवल उसवो ऊपरी सतह पर संयम की राख चढ़ गई थी।”

गंनीर छितन से उपलब्ध जीवन के तथ्य सामने रख कर जब 5ल्पना मूत्ते विधान में और हृदय भाद-संचार में प्रदृत्त होते हैं तभी

शापिदः प्रभाव उत्पन्न होता हैं। शेष स्मृतियाँ' इस प्रक्वार के अनेक

“> रश४४ -

साम्तिक तथ्य हमारे सामने लाती हैँ सुमताज़महल बेगम ज्ाहजहाँ को इस संसार में छोड़ कर चली गई उसका भू-विख्यात मक़बरा भी बन गया। शाहजहाँ के सारे जीवन पर उदासी छाई रही पर शोक की छाया मनुष्य की सुख-लिप्सा को सब दिन के लिए दबा दे, ऐसा बहुत कम होता है। कोई प्रिय वस्तु चली जाती है उसके अभाव की अन्धकारमयी अनुभूति सारा अन्तःप्रदेश छेंक लेती हैं और उसमें किसी प्रकार की सुख-कामना के लिए जगह नहीं रह जाती पर धीरे-धीरे बहु भावना सिसटने लगती है और नई कामनाओं के लिए अवकाश होने लगता हैँ मनुष्य अपना मन लगाने के लिए कोई सहारा ढूँढ़ने लगता है क्योंकि मत बिना कहीं लगे रह नहीं सकता शाहजहाँ ने महत्त्व-प्रदशंन और सौंदर्य-दर्शन की कामना को खोद खोद कर जगाया और उसकी तुष्टि की भीख कला से माँगी दिल्‍ली उसके हृदय के समान ही उजड़ी पड़ी थी दिल्‍ली फिर से बसा कर उसने अपना हृदय फिर से बसाया सत-ही-मन दिल्‍ली को शाह- जहाँबाद बना फर वह उसकी रूप-रेखा खींचने लूगा। नर-प्रकृति के एक विशेष स्वरूप को सामने लाने वाली शाहजहाँ की इस सानसिक दशा की ओर महाराजकुमार ने इस प्रकार दृष्टियात किया हे-- “एक बार मुँह से लगी नहीं छूटती। एक वार स्वप्न देखने की सुख-स्वप्न-छोक में विचरने की लत पड़ने पर उसके विना जीवन नीरस हो जाता है। प्रेम-मदिरा को मिट्टी में मिछा कर शाहजहाँ पुनः मस्ती लाने को लालायित हो रहा था; अपने जीवन-सर्वेस्व को खोकर जीवन का कोई दूसरा आसरा ढूंढ़ रहा था।.... . . सुन्दर सकोमल अनारकली को कुचल देने वाली कठोर-हृदया राज्यश्री शाहजहाँ की सहायक हुईं ।. . . . . . राज्यश्री ने सम्राट को प्रेमलोक से भलावा देकर संसार के स्वर्ग की ओर आक्ृष्ट किया। किसी को दुःख से संतप्त देख बहुत-से ज्ञानी बनने वाले जीवन की क्षणभंगरता का, संयोग-वियोग की निःसारता आदि का

ब्नऊ।

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उपदेश देते लग जाते हैं। इस प्रकार के उपदेश शुप्कर प्रयादुसरण था अभिनय के अतिरिक्त और कुछ नही जान पड़ते दुःखी मनुष्य के हृदय पर इनका कोई प्रभाव नहीं; कभी-कभी तो ये उसे आर भी शुब्ध कर देते हैं--

'दशैनिक कहते हैं, जीवन एक बुदबुदा हैँ, श्रम करती हुई आत्मा के ठहरने की एक धर्मशाला मात्र है वे यह भी दतात हू कि इस जीवन का संग तथा वियोग क्या है--एक प्रवाह में संग्रोग से साथ बहते हुए छकड़ी के दुकड़ों के साथ तथा विलग होने की

ए्‌ कषा है। परल्तु क्‍या यें विचार एक संतप्त हृदय को ज्ञान्त कर सकते हैं ! ............- सांसारिक जीवन की व्यथाओं से

दूर बैठा हुआ जीवन-संग्राम का एक तटस्थ दर्शक चाहे कुछ भी कहे, किन्तु जीवन के इस भीषण संग्राम में युद्ध करते हुए घटनाओं के घोर थपेड़े खाते हुए हृदयों की क्या दशा होती हे, यह एक भुवत- भोगी ही वता सकता हैं।”

इसी प्रकार जीवन के और तथ्य भी हमारे सामने आते हूँ अपने प्राण या प्रभुत्व-ऐड्वये की रक्षा की बुद्धि या सामरथ्ये रख कर भी किसी के प्रेम के सहारे सनुष्य किस प्रकार अपना जीवन पार करता जाता हैं इसका एक सच्चा उदाहरण जहाँगीर और नूरजहाँ के प्रसंग में सिलता है। जहाँगीर तो त्रजहाँ को पाकर 'मोहमयी भसाद-सदिरा' पीकर पड़ गया, नूरजहाँ हो उसके साम्राज्य को और 30005 पर उसको भी सेंभालती रही-- हु हल पल आँखें बन्द किए पड़ा पड़ा सुरा, सुन्दरी तथा संगीत कल में विचर रहा था। किन्तु जव एक भोंका आया और कु दृकफ़ान का अन्त होने लगा, तव जहाँगीर ने आँखें कुछ खोलीं, ऐला कि उसको लिये न्रजहाँ रावरूपिंडी के पास भागी चली जा

रही थी रे है कप | पा खुरंम और महावत खाँ भेलम के इस पार डेरा डाले पड़े

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जीवन के एक तथ्य का मूत्ते और सजीव चित्र खड़ा करने के लिए सहृदय लेखक ने कैसा सटीक और स्वाभाविक व्यापार चुना है। “जहाँगीर ने आँखें कुछ खोलीं, देखा कि उसको लिये नूरजहाँ भागी चली जा रही थी ।” लेकर भागने का व्यापार संभालने और बचाने का प्राकृतिक और सनातन रूप सामने खड़ा कर देता है।

यह बात नहीं है कि सहाराजकुमार की दृष्टि अपने समकक्ष जीवन पर ही, शक्तिशाली सम्नाटों के ऐश्वर्य, विभूति, उत्थान-पतन आदि पर हो पड़ी हो, सामान्य जनता के सुख-दुःख की ओर सुड़ी हो आपके भीतर जो शुद्ध मनुष्यता की निर्मल ज्योति हैं उसी के उजाले में आपने सम्ग्राटों के जीवन को भी देखा है यद्यपि जिन पाँचों स्थानों को आपने सासने रखा हैँ उतका सम्बन्ध इतिहास-प्रसिद्ध शासकों से है, फिर भी उनके अतीत ऐश्वर्य-सद का स्मरण करते समय आपने उन बेचारों का भी स्मरण किया हैं जिनके जीवन का सारा रस निचोड़ कर वह सद का प्याला भरा गया था--

“वैभव से विहीन सीकरी के वे खँडहर मनुष्य की विलास- वासना और वेभव-लिप्सा को देख कर आज भी वीभत्स अट्टहास करते हैँ अपनी दशा को देख कर सुध आती है उन्हें उन करोड़ों मनुष्यों की, जिनका हृदय, जिनकी भावनाएँ, शासकों, धनिकों तथा विलासियों की कामनाएँ पूर्ण करने के लिए निर्देयता के साथ क्चली गई थीं। आज भी उन भव्य खँडहरों में उन पीड़ितों का रुदन सुनाई देता है ।”

स्मृति-स्वरूपा कल्पना कवियों और लेखकों को या तो मुख्यतः अतीत के रूप-चित्रण में प्रवृत्त करती है अथवा कुछ मार्मिक रूपों को ले कर भावों की प्रचुर और प्रगल्भ व्यंजना में दोनों का अपना अलग अलग मूल्य है। मेरी समभ में महाराजकुमार को प्रतिभा दूसरे ढरें की हैं। आपके प्रबन्धों में सानसिक दक्षाओं का भावों के उद्गार का ही मुख्य स्थान है, वस्तु-चित्रण का गोण या अल्प

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भावक लेखक की दृष्टि किसी अतीत काल-खंड की संस्क्षृति के स्वरूप क्षी ओर नहीं है; सानव-जीवन के नित्य और सामान्य स्वरूप को ओर है। इसका आभास मोती ससजिद के इस उल्लेख सें कुछ सिलता है+नल

“उस निजन स्थान में एकाघ व्यक्ति को देख कर ऐसा अनुमान होता है कि उन दिलों यहाँ आने वाले व्यक्तियों में से किसी की आत्मा अपनी पुरानी स्मृतियों के बच्धत में पड़ कर खिंची चली आई है ।”

यह भावना अत्यन्त स्वाभाविक हैँ। पर संस्कृति के स्वरूप पर विशेष दृष्टि रखने वाला भावुक उपर्युक्त वाक्य में आए हुए “एकाध व्यक्ति” के पहुले पुरानी चाल-ढाल-बाला' विशेषण अवइय जोड़ता

वत्तु-चित्रण की ओर यदि महाराजकुमार का ध्यान होता तो दरदार की सजावट, दरबारियों की पोशाक, उन्तके खंभे ठेक कर जड़े होने, उचकी ताज़ीम आदि का, इसी प्रकार विरास-भवत्त में देगमों, दांदियों और खोजों की वेशभूषा, ईरान और दसिदक के रेंगविरंगे कालोनों और बड़े बड़े फ़ानूसों और शमःदानों का दृश्य अवश्य खड़ा करते। पर दृश्य-विधान उनका उद्देश्य नहीं जान 'डता इसका अभिन्नाय यह नहीं कि विस्तृत वस्तु-चित्रण है ही नहों। यह दाहा जा चुका है कि सुख-ढुःख का बैघम्ध दिखाने के लिए नहाराजछुमार ने भोग-पक्ष ही अधिकतर लिया हैं। अतः जहाँ एंमय आखशोद-प्रसोद, शोभा, सौन्दर्य, सजावट आदि के प्राच्ये की भावना उत्पन्न करना इष्ट हुआ हैं वहाँ विस्तत चित्रण भी अनूठेपन * साथ मिलता है, जैसे दिल्‍ली की क्लिलेवाली नहर की जल-चीड़ा पे, दणून छें-...

उस स्वगंगंगा में, उस नहर-इ-वहिर्त में, खेल करती थीं उस स्वरग की अत्यनुपम सुन्दरियाँ। उन ड्वेत पत्थरों पर अपनी रे अडाता हुआ वह जरू अठखेलियाँ करता, करूकलू ध्वनि + पर सात सुताता चछा जाता था, और वें अप्सराएँ अपने

हे;

इवेतांगों पर रंगबिरंगे वस्त्र लपेटे, नूपुर पहने, अपने ही ध्यान में मस्त भुनत-भुन की आवाज़ करती हुईं जल-क्रीडा करती थीं। और जब वह हम्माम बसता था, स्वरगं-निवासी जब उस स्वरगंगंगा में नहाने के लिए आते थे, और अनेकानेक प्रकार के स्नेह से पूर्ण चिराग़ उस हम्माम को उज्ज्वल्ति करते थे, रंगविरंगे सुगन्धित जलों के फ़व्वारे जब छूटते थे, तव वहाँ उस स्वर्ग में सौन्दर्य बिखरा पड़ता था, सुख छलकता था, उल्लास की बाढ़ जाती थी, मस्ती का एकछत्र शासन होता था और मादकता का उलंग नत्तंन ।” यह कह आए हैं कि सानसिक दक्षाओं के चित्रण और उमड़ते भावों की अनूठी व्यंजना ही इस पुस्तक की मुख्य विश्येषता हैं। सानसिक दशाएँ हूँ अकबर, शाहजहाँ ऐसे ऐतिहासिक पात्रों की; उसड़ते हुए भाव हैं लेखक के अपने सीकरी के प्रसिद्ध फ़क्नोर सलीम- शाह से सिलने पर अकबर का राज-तेज तप के तेज के सामने किस प्रकार फीका पड़ा और उसकी बृत्ति किस प्रकार बहुत दिनों तक कुछ और ही रही, पर फिर ऐश्वर्य-विभूति में लीन हुईं इसका बड़े सुन्दर ढंग से निरूपण है--

“अकबर ने तप और संयम की अद्वितीय चमक देखी, किच्तु अनुकलरू वातावरण पाकर बह ज्योति अन्तहित हो गई पुनः सवंत्र भोतिकता का अन्धकार छा गया, किन्तु इस बार उसम आशा की चाँदनी फंली ।”

इसी प्रकार मुमताज़महल के देहावसान पर शाहजहाँ की मनो- वृत्ति का भी मामिक चित्रण हूँ

अब थोड़ा महाराजकुमार के वाग्वेशिष्टथ को भी समभना चाहिए। उनके निबन्ध भावात्मक ओर कल्पनात्मक हूं। कल्पना से मरा अभिप्राय वस्तु की कल्पना या प्रस्तुत की कल्पना नहीं; भ्स्तुत के वर्णन में अत्यन्त उदबोधक और व्यंजक अप्रस्तुतों की कल्पना हैं इसमें सन्देह नहीं कि अप्रस्तुत विधान अत्यन्त कलापूण, आकर्षक

और सर्मस्पर्शी हूँ दाह्म परिस्थितियों या वस्तुओं का संहिलष्ट चित्रण तो इच भावप्रधान निबत्धों का लक्ष्य नहीं है, पर उन मूत्ते वस्तुओं के सौन्दर्य, साधुये, दीप्ति इत्यादि की भावना जगाना उनके भाव-विघान के अन्तर्गत हैं। अतः इस प्रकार की भावना जगाने के लिए अप्रस्तुतों के आरोप और अध्यवसान का, सास्यमूलक अलंकार- पद्धति का सहारा लिया गया है। जैसे सगरी को कई जगह प्रेयसी सुन्दरी का रूपक दिया गया हैं। शाहजहाँ की बसाई दिल्‍ली “बढ़ते हुए प्रौढ़ साम्राज्य की तवीन प्रेयसी” और अन्यत्र “बहुभतुंका पांचाली” कही गई है लाल क़िले का संकेत बड़े ही अनूठे ढंग से इस प्रकार किया गया है--

“अपने वये प्रेमी को स्थान देने के लिए उसने एक नवीन हृदय की रचना की ।*

कहीं कहीं प्रस्तुत और अप्रस्तुत का एक साथ बहुत ही सुन्दर समनन्‍्दय है, जैसे--

“बह लाल दीवार और उस पर वे इवेत स्फटिक महल--उस लाल लाल सेज पर लछंटी हुई वह बस्वेतांगी ।”

जिन दुश्यों फी ओर संकेत किया गया है वे भावना से पूर्णतया रंजित होने पर भी लेखक के सूक्ष्म निरीक्षण का पता देते हैँ, यह बताते हूँ कि उदसें परिस्थिति के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अंगों के साक्षात्कार फी पूर्ण प्रतिश हैं। शाहजहाँ की नई दिल्‍ली प्री सजधज से उसके प्रथम स्दागत के लिए खड़ी है दह जमुना के उस पार से रहा हैं। छाल दीदार क्षे ऊपर इदेत प्रासाद उठे दिखाई पड़ रहे हैं। वाद धौरे-धीरे निदट पहुँचती है अब इदेत प्रासाद दृष्टि से ओकल हो जाते हैं; छाल दीवार हो सासने दिखाई पड़ रही है यह दृध्य भाददा से रंजिद होकर इस रूप में सामने आता हैं--

“इवेतांगी--अपने प्रियदम को जाते देख सकचा गई, उसने

रूजा दत्त हल हसन पता शख पझपन किक च््सका $: आय छिपा लया रे एज्जादइश जपनदा मज घझपने मंचल में छिपा लिया ।* >>

रे 06

दिल्‍ली के सहलों में यसुना का जल लाकर नहरें क्या निकाली गईं सानो यमुना ने अपना दिल चीर कर उस स्वर्ग को सींचा: उस कृष्णवर्णा ने अपने हादिक भावों तथा शुद्ध प्रेम का मीठा चम- चमाता जीवन उस स्वर्ग में बहाया ।”

प्रस्तुत पुस्तक में अध्यचसान-पद्धति पर बहुत जगह घटनाओं की ओर भी संकेत हैं, जिन्हें इतिहास के ब्योरों से अपरिचित जल्दी नहीं समझ सकते मुग्रल बादशाहों के इतिवृत्त से परि- चित पाठक ही महाराजकुमार के निबत्धों का प्रा आनन्द उठा सकते हेँ। जो जहाँगीर और अनारकली के दुःखपर्ण प्रेम- प्रसंग को नहीं जानते वे तीन क़्नें' के बहुत से अंश की भावात्म- कता हृदयंगस नहीं कर सकते “उजड़ा स्वर्ग” में, जो महाराज- कुमार की सबसे प्रोढ़, सासिक और कलापूर्ण रचना है, ऐसे कई स्थल हैं जहाँ घटनाओं का उल्लेख साम्यमूलक गृढ़ संकेतों द्वारा ही है, जैसे--

“आलम का शाह पालम तक शासन करता था ।. . . . . - जब इस लोक में देखने योग्य कछ रहा तब वह प्रज्ञाचक्षु हो गया परंत वारांगनाओं को दिव्य दृष्टि से क्‍या काम ? उन्होंने अन्धों का कब साथ दिया हैं ? अन्धे कब तक अन्धी पर शासन कर सके हैं ? दुर्भाग्य रूपी दुदिन के उस अँधियारे में, नितान्त अन्धेपन की उस अनन्त रात्रि में, रात्रि का राजा उस अंधी को ले उड़ा और वह पहुँची वहाँ जहाँ समुद्र के बीच शेषशायी सुखपूर्ण विश्वाम कर रहे थे

अन्धा शाहआलम किस प्रकार बिल्ली की सल्तनत संभाल सका और बहुत दिनों तक मराठों की देख-रेख में रह कर अंत में सात समद्र पार के अँगरेज़ों की शरण में गया जिससे उसकी राजशक्ति उससे विमख होकर वस्तुतः अंगरेज़ों के हाथ में चली गईं इसी का

संकत ऊपर के उद्धरण मं हू।

क् रे कनन

भावुक लेखक से हुमायूँ के सक़बरे को स्वर्ग की बगल का वरक कहा है, जिसने एक दूसरे से दिल का दर्द सुनाने के लिए--

“न जाने कितने दुःखी मुग़ल शासकों को अपनी ओर आकर्षित किया दुःख का वह अपार सागर, निराशा की आहों का वह॒तपा- तपाया हुआ कुंड, आँसुओं का वह भीषण प्रवाह, टूटे हुए दिलों की वह दर्दभरी चीख ! .. .वे टूटे दिल एक साथ बेठ कर रोते हें, रो रो कर उन्होंने कई बार उन रक्‍तरंजित पत्थरों को धो डाला जा पर हृदय का वह रुधिर वहुत गहरा रंग लाया हे, उनके धोये नहीं घुलता ।”

जो दारा की गति से परिचित हूँ, जो जानते हें कि सन्‌ १८५७ के बलदे सें शाही खानदान के लोगों से उच्छिन्न होने के पहले उसी सक़बरे में पताह ली थी, वे ही ऊपर की पंक्तियों का प्रा प्रभाव प्रहण कर सकते हूँ

दिल्ली का क्विला हमारे भावुक सहाराजकुमार को 'उजड़ा स्व) दिखाई पड़ा हैं उसने उनके हृदय सें जानें कितनी करुण स्पृतियाँ जयाई हैं दिल्‍ली के राम-मात्र के अन्तिम बादशाह वहादुर- शाह ने अपना क्षोभपूर्ण दीन जीवन उसी किले में रोते रोते बिताया था। इस भोतिक जगत्‌ में सुख का कहीं ठिकाना पाकर वे अपना नास 'कफ़र' रख कर कविता के कल्पनालोक में भागा करते थे। पर वहाँ भी उनका रोना छूठा; वहाँ भी बुरों की जान को वे रोते थे--ऐसे रोए दुरों की जाँ को हम, रोते रोतें उलट गईं आँखें! उनके सासने ज्लोक्त और ग़ालिब ऐसे उस्ताद अपने कलाम सुनाते थे। शाहजादे की शादी क्षे सौक्े पर शालरिव ने एक सेहरा' लिखा था जिसके किसी दादय में ज्ौक ने अपने ऊपर आक्षेप समझ कर जदाद दिया था। पर शायरी छी इस चहलू-पहल से वहादुरशाह के आंसू रुकने दाले नहीं थे बहाडुरशाह के जीवन के अन्तिम दिनों को ओर लेखवा मे इस प्रदार गढ़ संकेत किया है--

लत | कत

“वह उजड़ा स्वर्ग भी काँप उठा अपने उस शूल से निरन्तर रक्‍त के आँसू बहाने वाले उस नासूर को निकाल बाहर करने की उस स्वर्ग ने सोची। परन्तु. .... . उफ़ ! वह नासूर स्वर्ग के दिल में ही तो था; उसको निकाल बाहर करने में स्वर्ग ने अपने हृदय को फेंक दिया और अपनी मूर्खता पर क्षुब्ध स्वर्ग जब दर्द के मारे तड़प उठा, तब भूडोल हुआ, अन्घड़ उठा, प्र॒य का दृश्य प्रत्यक्ष देख पड़ा पुरानी सत्ता का भवन ढह गया, समय-रूपी पृथ्वी फट गई और मध्ययुग उसके अनन्त गर्भ में सर्वदा के लिए विलीन हो गया ।/

इस हृदयद्रावक रूपजाल के भीतर