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काव्यावलीकन

किसी भी देश और समाज की वात्तविक स्थिति वस्तुतः उसके साहित्य- रूपी दर्पण पर प्रतिजिंवित होती हुईं देखी जा सकती है। साथ ही विविध प्रकार्‌ की परिस्थितियों की भी परछाइयाँ उस पर अवलोकित की जा सकती ह#। स्थिति के अन्तगंत बौद्धिक, मानसिक, चारिनिक, आर्थिक, नेतिक और धार्मिक दशायें जाती हैं, इन्हीं से सम्बन्ध रफ़नेवाली भावानुभूतियाँ, विविध सहायें, सागात्मिका दत्तियाँ आदि भी साहित्य-मुकुठ पर आमभासितत होती दू। इन्हीं की काँको को देखकर देश और समाज का उत्कर्पापकर्ष भी देसा जा सकता है, उसकी संस्कृति और सम्यता का मूल्य और महत्व परफा जा सकता है। साहित्य-सिन्धु का सुधासार यदि कहाँ पूर्यतया प्राप्त होता है, तो केवल उसके सत्काब्य में, अतएव कहना चाहिए कि काब्य ही वह दिव्य दप॑य है जिपमें देश-समाज की मुन्दर संस्कृति, सम्यता और उन्नत्यवनति यी प्रतिछाया यथार्थतया आभासित दोकर उसके सच्चे स्वरूप का ययेष्ट अनुगान कराने में ज्षम होता है | केवल देश और समाज का ही दृदय और मन अयेवा शान-विवेक काव्य में निद्तित रहता हे वरन्‌ एक व्यक्ति की भी योधवृत्ति, इच्छादृत्ति तथा भावनाबृत्ति के साथ कल्पता-कुशलता मी काव्य में परिलक्षित होती है यदि काव्य पर इनका यथेष्ठ प्रतिब्रिम्म सके तो, यह वास्तव में सब्चा सत्काब्य कह्य नहीं जा सकता, क्योंकि बिना इस अतिबिम्ब के काव्य की उपयुक्त उपादेयता ही नहीं रह जाती और उसका सम्बन्ध उस द्ित से नहीं रह पाता जिसके ही कारण वह उस साहित्य का मुख्यांग कहा जाता है, जो द्वित शब्द के आगे से उपसग लगाकर फिर भावार्थ में साहित्य के रुप में आ्राता है। यदि प्राचीन काब्य को इस विचार के साथ देपा जाय तो स्पष्ट हो जायगा कि प्राचीन काल में कविजन काव्य-रचना में रमणीयार्थ प्रतिपादक शब्दों के द्वाय आनंदोत्यादन फे साथ ही देश बाल-सम्बन्धी सभ्यता, संस्कृति चीति-रीति के चितित अथवा व्यंच्ित करने की ओर पूर ध्यान दिया करते थे। इसे लिए. श्राचीन काव्य के सार्मिक अध्ययन से तत्कालीन देश-समाज की सम्रस्त प्रमुखावस्थाओं का यय्रेप्ट परिचय ग्राम हो सकता है। और धामिझ, सांस्कृतिक, चारिनिक, नैतिक और भायनात्मक दशात्रों का अतिविम्य देसा जा सजता दै। प्राचीन बाव्य त्ते

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हमारा तात्पय॑ केवल सस्दृत मापा के काव्य से ही है वरन्‌ ब्रज मापा ओर अवबधी मापा तक के उस कान्य से भी है जिसकी रचना लगमग श्ध्यी शताब्दी तक हुई है। इधर वी ओर ग्राकर इस नवीन शताब्दी के इस पूर्वार्ध के प्रारम्मित बाल तक ऐसे काव्य की परम्परा न्यूनाधिक रूप से चलती रही, कन्‍्तु लगमंग १६२५ ई० से इधर की ओर जो काव्य-साहित्य सुजन हुआ श्रौर हा रहा है; विशेषतया सी ग्रोल्ी म, उसम देश-समाज की सस्कृति, सम्यतादि की कोई भी विशेष उपयुक्त छाया नहीं दौसती | यद्ट ठीफऊ है कि उस पर पाश्चात्य नवीनतम प्रभाव अवश्यमेय स्पष्टतया दिखलाई पडता है इधर थी आर मौलिक्ता भर मवीनता के पीछे, बहुत श्रधिक भागने के कारण कविर्या ने नये नये विपय तो अपने बाज्या मे ला उपस्थित किये किन्तु उन विपया पर अपनी नेतिक सस्झृति सम्यता थ्रादि का कोई भी प्रतिब्रिम्य नहीं पवने दिया, बरन्‌ नव्यता के लिए पाश्चात्य, राति नीति सस्कृति-सम्यतादि से सम्पन्ध रसने- वाले भावानुमवा का ही विशेष रूप से समावेश करने का प्रयास किया | इसका परिणाम इस रूप में ठीक हुआ कि देश और समाज को नूतन विचाय-वारा कुछ प्रत्त हुई; किन्तु इस रूप में अवश्यमेर समुपयुद्त फ्ल नहा हुआ रि उससे अपनी यथार्थ सस्दृत्यादि की छाया सर्बथा लुत सी ही हो चली। अन से लगभग ४० वर्षों के उपरान्त आज फे काव्य से भारतीय हिन्दू-सम्यतादि का कोई भी परिचय प्राप्त हो सकेगा साथ ही प्राचान द्विदू जाति के सस्कृति- सूचक ऐतिहासिक, पोराणिक चरित्रो का भी क्दाचित्‌ पूरा विस्मस्ण दो जायेगा और उनका कोई भी परिचय प्राप्त हो सकेगा | इस कथन या यह तात्पर्य नहीं कि इस काल कोई भी काव्य ऐसा लिखा ही नहीं गया जो इस क्यन का अन्यथा रूप होकर अपवाद स्वरूप हो | ट्स काल में भी कतिपय प्रशस्त कविबर ने आचीन परम्पराओं का अनुसरण करते हुए सुन्दर सत्काब्य लिखे हैं जिन पर भारत्रीय प्राचीन समभ्यतादि सूचक पवित्र चारुचरिना के सुन्दर चित्र चिनित हुए हैं। असच्नता का विषय रे ऊ्ि प्रस्तुत काव्य ऐसे ही काब्यों में से एक ऐसा सत्वाब्य है निसम एक पौराणिक कथानऊ के आधार पर प्राचीन समातत का ऐसा चादचित चित्रित क्रिया गया है कि पाठक या श्रोता उससे देश वा प्राचौन रुप पहुत कुछ देख सकता है| काव्य के दो मुख्य मेद वस्तु वर्णन के

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आधार पर यों रखे गये हैं, कि एक में तो किसी कया को चित्रित रिया जाता है और दूसरे में किसी हृदय और प्रकृति को | इस प्रकार एक में तो समाज और देश-काल का प्रतिबिम्ब रहता है और दूसरे म॑ एक वेयफ्रि हृदय की सार्मिकानुभूतियों का आभास मिलता है| प्रथम को तो अयध-झाज्य ओर दूसरे को मुत्तक काब्य रहते हैं यह भो ठीक है कि एक द्ाष्टि से दोनों प्रकार के काच्या मे देश-छमाज और काल का प्रभाव-भाव किती नु झिसी रुप में न्यूनाधिक रगों से रज्ति रहता ही है, रिन्तु फिर मा यह कह सकते हैं कि प्यध करव्य में वह प्रभाव उहुत कुछ स्पष्ट और स॒योचन्सा रहता है; किन्तु दूसरे मे ही ऊुछ यत्ल-साध्य, सुदमालोचक दृष्टिप्रात्त और व्यजित रूप में « रहता है। ग्राचारयों ने इसी लिए; प्रगव-काव्य में एक पूरी कथा के रखने का बिधान॥।रिया था; जैससे उसके द्वारा देशन्‍्काला का एक स्पप्ण' आर धुस्यत्ता चित्र इप्टि के समछझ उपस्थित हो सके | इसी के साथ यह भी नियम रा था फि प्रमध-काव्य की क्रधावस्त पौराणिक योर ऐतिहासिक दी प्रवानतया रहे, यदि काल्‍्यनिक भी रहे तो मी उसे ऐसा रूप दिया जाये कि उससे उक्त उद्देश्य कौ पूर्ति भली भाँति हो सके सस्कृत के प्रायः सभी प्रमुफ प्रबंध-काब्य या महाकाव्य इसके उत्तम उदाहरण हैं| ऐसे प्रधध-काव्यों से रचयिता के विस्तृत समाजातुभव, देशोतति हास शान और सास्कृतिक अचुर परिचय की परीक्षा हो जाती है यह मो कहना यहाँ समोचीन है कि प्रमध-काव्य के इस वर्णवस्तु- नियम का यही तात्यय नहीं कि कवि अपने को केवल फ्िसी निर्श्चित समय- समाज की एक प्तकी्ण सीमा के ही अन्दर रखे, उसे इसफे साथ ही यह भी स्वततता था कि वह अपने समय-समाज ऊे प्रभाव-भाव को मी समीचीनता, उप्युक्तता और चत्रता के साथ श्ात्मानुभूतिया को रखता हुआ, व्यजित करे और अपनी कुशल कल्पना के दारा अपने गस्तुत समय-समाज तथा अग्रिम देश काल के लिए द्तिकार्क उचित उद्देश्य-चिन्ता मी रचिर रोचक रखां से रजित कर रुफे। इन्हीं कारणों से प्रग्ध-काव्य को मक्तक की अपेक्षा अधिक मूल्य और महत्व दिया जाता है | प्ररध-काव्य में मुक्तः की ग्रायः सभी मार्मिऊताएँ और समापेक्षित विशेषत्ाएँ न्यूनाधिक रूप में थ्रा जाती हैं-किन्तु मुक्तब्य में प्ररध-काव्य की विशेषताएँ प्रायः नहीं सकती ह। उत्त दोर्ना अकार के काब्यों से अतिरिक्त सीत काव्य में, जिसे काव्य का

कोई भेद विशेष रूप से नहीं साना गया, किन्तु कवियों ने जिसे रचिरता के

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साथ रा अवश्यमेय है, वह भी क्दाचित्‌ इसी विचार से कि कवि की स्वतंतता और प्रतिभापद्ता आचार्यों के नियमों से नियनित होकर निपट त्वच्छुदता से कार्य करने की छ्मता प्रकट कर सफे और कवि की महत्ता-सत्ता स्वथा स्वतत्र कही और मानी जा सके हृदय की मर्मानुभूतियों श्रीर भावनाओं वा ही पूरा प्रावान्य रहता है, कहना चाहिए कि गीत-काब्य में दृदय पतक्त अधान और प्रयध-काव्य मे बोध वृत्ति प्रधान रहती है, मुक्तक में एक प्रकार से दोनो का समन्वय-सा रद्दता है | इसी लिए प्रबध-काब्य तो विशेषतया अध्ययना ध्यापन के लिए और मुक्तक तथा गीत काव्य प्रायः अनुमव करने के लिए, रहता है। यद्यपि यह्द कोई इृढ नियम नहीं, कुशल कविरया ने कदापि अपने को ऐसे किसी नियम विशेष से बँधने नही दिया, उन्हाने मुक्तक और गीत-काव्य भी ऐसे रे हैं जिनमें अध्ययनाध्यापन की पुष्कल सामग्री है | इसी प्रकार प्रबध- काव्य क्तो भी उन्होंने इस प्रवार लिएा है कि उसमें भावनानुभूति की ही प्रधानता और प्रयलता प्राप्त होती है। पठन-पाठन की गभीर वस्तु उसमें कुछ घिशेष नहीं मिलती अपर तक प्राय, काव्यों के ऐसे दी रूप साहित्य-ज्षेत्र में प्राप्त होते हैँ मनुष्य में अन्य मनोयृत्तियों के साथ समन्वय की भी मनोवृत्ति प्रायः कार्य किया करती है, इसी की प्रेरणा से समन्‍्वय-प्रिय कवियों ने प्रधध- काव्य में भी मुक्तक का मजुल समावेश सफलता के साथ किया और ऐसे काव्य रचे जिनमें प्रबध पढ़ता भी प्रात होती है और साथ जिनके छद स्वतन रूप से मुत्तक छर्दा की भाँति भी प्रथक्‌ लिये जा सकते हैं। इस पर भी अनी तक काव्य के दन रूपों के समन्वय में भी गीत का समावेश प्राय. नही किया गया-- केवल कुछ ही काव्यों से प्रसगवशात यथावसर और यथावश्यकता कहीं कही केवल अत्यक्पाश में ही गीत का सजिवेश किया गया है--यथा फेशव की

रामचद्रिका में राम-विवाह ऊ्रे प्रसग मे प्यौनार के समय गाली गवाई गई है।

प्राय” कविजन ऐसे अवसरों और प्रदगों में जब जहाँ ग्रीतन्याथ की अपेक्षा

होती है, यही कहकर रह जाते हैं कि गायन-बादन हुआ नाठक के न्षेत्र में

प्रथम गीत-बाद समावेश यथावसर किया जाता था, किन्तु यह परिपाटी भी

विशेष रूप से प्रचलित नहीं हो सकी। प्रस्तुत काब्य में यह विशेषता

अबलोकनीय है। यथास्थान और यथावसर इसमें गीत विधान भी किया गया

है ऐसा करने से इसकी रुचिस्ता और रोचकता और भी वढ गई है। हम

इस सम्यन्ध में अधिक कहकर केवल इतना ही यहाँ कहना चाहते हूँ कि

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यथास्थान सन्निविष्ट गीतों में मी स्वयरिता ने सरसता ओर रुचिसा के साथ काब्योवित र्मणीयता भी रफने का सफ्ल प्रयास किया है। एतदय वे साघुवाद के पात्र हैं।

काव्य-परम्परा जो इस समय तक चल रही है, यही प्रस्ट करती है कि काब्य का रूप मले ही कोई रहे, चाहे प्रवध-काव्य का रूप रहे चाहे मुत्तक का, अथवा चाहे गीत-काव्य ही का रूप क्‍यों रहे, काव्य की मापा सर्थन सबंदा एक ई; रूप में रहा करती है, भाषा का पह रूप चाहे काब्योचित समुत्कृष्ठ रूप हो चाहे सामान्य रूप हो, चाटे भामप्रधान गूढ गरभीर और व्यजना-प्रधान रूप हो चाहे कला कौशल-फलित भाषा-भूषण ललित रूप हो, चाई भाषा जटिल), सामासिंक पदावलो-पूर्ण ओर क्लिप्ट द्वोफर श्लिप्ट हो चादई सरल सुब्रोध ओर शिष्य हा | काव्य मे एक बार कवि ने जो रूप उठाया, उसी को बह बयपर सारे काव्य में पूरा निर्वाह करता रहता है। साहित्यिक सौष्ठव से समन्वित स्थायी सत्वाव्यों में भाषा सर्वथा समुन्नत और अध्ययनापेक्षित रहती है, क्रिन्तु सामान्य समय-समाजोपयोगी सापारण वाब्यों में भाषा मुदावरे- दार, स्वधा सरल, सुनोष ओर रपट रक्‍्सी जाती है भाषा के विविध रूपों का सुन्दर समन्वय प्राचीम परिपा्ी के नाटको दी में देसा जाता है--सस्झत के पूर्वकालीन नाटकों में तो पात-भेद से भाषा-भेद रसने की परिपादी प्राप्त होती है, किन्त॒ हिन्दी के नाटकी में नहीं हाँ कुछ हिन्दी-नाटक ऐसे अवश्यमेव हैं जिममें पात्र भेद से भाषा-मेद को परिषाटी की आ्राभास मिलत्ता है | दुप० शी० बदरीनारायण जी चोधरी प्रेमबन! जी के ऊुछ नाटकों में यह बात सुचाए रूप से मिलती है। ऐसे द्वी कुछ अन्य नायकों में भी यद्द भाषा-मेद-प्रणाली न्यूसाधिक रूप में परिलक्तित होती दे, किस्तु इधर की ओर तो यह परिषारी प्रायः छुप्त ही हो गई है इसके कारणों की विवेचना का यहाँ समय ओर स्थान नहीं | श्री० स्व० 'प्रेमघन? जी के इसी विचार को लेकर उनके सच्चे अतिनिधि भ्रात्ृज भ्री० उपाध्याय जी ने अपने इस सराहनीय काव्य में साथक ओर सफल करने का प्रशस्त प्रयास किया है | इस काब्य में पुरुष पात्र तो विशेषतया वर्तमान साहित्यिक सडी बोली का प्रयोग करते हैं. और स्त्री पान आय; साहित्यिक ब्ज-माषा का, अन्य पात्र यथावसर यपनी अपनी योग्यता या ज्ञमता के आधार पर भाषा के उत्कृष्ट और सामान्य रूपों का व्यवहार करते हैं। भाषा-मेद के इस प्रयोग से काव्य में एक नव्य भव्य विशेषता

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गई है। इस प्रफार यह कौशल सर्वथा सराहनोय है, इसमें कवि को यथेष्ट सफलता मिली है और एतदर्थ भी यह बधाई के पात्र हैं। इसके कारण काब्प में रोचकता और रुचिखा भी बढ़ गई है। एक ही काव्य में ब्रज-पापा-माधुरी और साड़ी बोली की लुनाई क्रमशः यधास्थान प्राप्त द्ोती जाती है, जिससे पाठक या श्रोता की आस्वादामिरुचि उमंग्रित होवी रहती है इस मभाषा-मेद-अयोग में एक भय यह कहा जाता है कि इससे प्रबध-काब्य की प्रबंध»ःखला और रसन-प्रवाइ-प्रगति को कुछ आघात सा प्राप्त होता है, ऊिन्दु यदि कवि काव्य-स्वना-कला में कुशल है तो इससे काव्य में बह और भी अ्रधिक सरम्यता तथा भावगम्यता के साथ कला- घाम्यता उपस्थित कर देता है | इससे कुछ वास्तविकता ओर स्वाभाविकता में मी विशेषता सी जाती है। इसमे कविता भाषा-पढ़ल तो प्रकद होता ही है, साथ ही उसकी भाषा प्रयोग-कला को कुशलता ओर मापा के मिक्न- भिन्न रुपो में भावानुभूति अ्रमिव्यज्जनन्ज्ञमता का पूरा परिचय प्राप्त होता है। भाषा-मेद करता हुआ भी कवि यदि रस-भाव प्रवाह का यथेप्ट निर्वाह कर सकता है तो यह उसकी एक विशेष सराहनीय सफलता है, ओर वह इसके लिए सद्ददय जनों से साधुवाद का अधिकारी है।

आज़ तक सी अबंध-काव्य-परम्परा में केवल कुछ ही उदाहरण ऐसे प्राप्त दवोते जिनमें छन्दान्तर करते हुए प्रबंध-प्रवाद का उचित निर्वाह किया गया हो और बिविध छद्दात्मक शैली से रसमाव-ग्रगति को अविकृत रपते हुए एक प्रबंध-४पला अथेष्ट रूप में चलाई गई द्ो। आचार्य केशवदासकृत राम- चंद्िका ऐसे काब्यों में सर्वधा सराइनीय और समुर्कृष्ट रचना है, यह सहृदय सुयोग्य समाज में निर्विवाद रूप से सबंमान्य है। उस रसाद-सम्य रचना-रल में श्रति शीम्रता के साथ छुंदान्तर करते हुए भी रस-प्रबंधअवाह का पूरा निर्याह् हुआ हे--जिससे केशव के काव्य-कोशल और पांडित्य प्रतिभा-पढुत्व का पूरा परिचय प्रात्त द्वोता है| श्राधनिक कालीन सडी बोली काव्यन्तेत्र में छुंदास्तर-रीली का सफ्ल सदुपयोग सर्वोत्कृष्ट और प्रशस्त प्रिय-प्रवास नाम अमर काब्य में प्रात्त द्ोता है। तसश्चात्‌ दितीय रुचि स्वना का में भी छंदान्तर शैली का उपयोग हुआ, दाँ तनिक एक दूसरे साथ यह कार्य भी कवि के छुंदाम्यास और रस-परियाक प्रयास- दुल्न का परिचायक है | यह ठीक है कि प्रत्येक प्रफार का छंद प्रत्येक प्रकार

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के रस-प्रवाह में सबंधा सहायक ओर सफ्ल नहीं होता, भिन्न-भिन्न ससो ओर भाव-भावनायं के लिए भिन्न-मिन प्रकार के छद समपेक्तित होते हैं | रस- आवानुकूल छदचयन ही कि के काव्य-कौशल को उत्तपदायक है।यह भी ठौर है कि सभी प्रकार रे सरसों का सफ्लतापूबक यघेष्टरत्कर्प एक द्दी अथवा केयल बठ निश्चित छ॒द तया छुदों के द्वारा उपस्यित कर सकना भी कवि-कला फौराल का रलाघ्य उत्कप परिचायक है | इस “अवीशित उपाख्यान! नामक प्रस्तुत काब्य में विविध छद्यात्मक शेली का उपयोग किया गया और इस चतुरता ये साथ कि उसके कारण त। रस प्रवाह में ही कहीं कुछ युटि सकी है और प्रपधप्रगति 'पर द्वी कुछ अन्यथा प्रभाव पड़ सका है-- दोनों का घाराएँ अविकल रूप में परायर चलती रहती है--हाँ रसेद्रेक में इससे कुछ विशेष सहायता श्रवश्य मिलती है, क्योंकि ययेप्ट रद के लिए, सबुपयुक्त छुद का प्रयोग किया गया है। छदान्तर शेली के प्रयोग से आचाय केशव पर कुछ छुशल आलोचकां ने प्रभ्रध-रस-प्रयाह में बिकार आरा जाने का दोपारोप "किया है बथ्रपि बह वस्तुत समुप्युक्त और युक्ति न्यायसगत नहीं। इस काव्य पर भी इसी प्रकार किया जा सकता हे--फिन्तु हम उसे भी समीचीन मानने में सद्मत नहीं। यद्द बस्तुत कवि-कोशल-परिचायक एक प्रशस्त विशेषता है जिसके लिए कुशल कवि की सराहना करते हुए इस शेली के अचार प्रयधनार्थ प्रोल्ताइन देना ही उचित है | उत्त विशेषताओं के ग्रतिरिक्त इस काव्य में और भी कतिपय मव्य-भव्य विशेषताएँ भी अवलोकगीय ओर प्रशसनीय दे काब्य में बर्णन-शैली भी झबिर ग्रौर रुचिकर है | वर्शन की सार्थकता उसकी चित्रात्मगता और सजीयता पर पहुत अधिक आधारित रद्दती है | वर्णन दृश्य चित्रात्मक॥्त और मानसिक दशा अनुभूति कलात्मक रहता है | बह वस्त्वात्मक और भावात्मक होता है--- काल्यनिक वस्तुओं का भी चित्रण उसमें ग्रा जाता है। अस्तुत काब्य में बणुन प्राय सभी प्रकार का यथास्‍ध्यान और यथावश्यझता शत्त होता है। दृश्य और अदृश्य दोनों जगत्‌ इस काब्य मे चित्रित हुए हैं | दृश्य-जगत्‌ के नेप्रर्गिक और कृत्रिम-फलाइत दृश्य अपने अपने सुन्दर रूपों मे चित्रित हुए हैं। राजदरपार और स्वाभाविक वनोदेशादि के चारुचित्र प्रत्यक्ष से हो जाते हैं। दरग्र के चित्रण में प्रतगानुकूल इृत्य गायनादि का भी वर्णन भारतीय परम्परा का ग्रच्छा परिचायक है! ऐसे प्रतयों से कबि के सगीत-

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कल्ता-पस्थिय का पता चलता है। इसी प्रकार वनन्वाटिदा के बर्णनसे विधिध प्रसार के तसलतागुल्मों, प्रयून-पादर्पा, क्लखकारी विविध विषचियों आदि का परिचय प्राप्त द्ोता है। दृश्यादि वर्सन का महत्त्व काब्य में उद्दीपन विभाव के रूप में द्वी यद्यपि विशेषतया माना जाता है तथापि इसके कारण रसोद्दीति के साथ ही विचाराद्यीत्ति भी होती है और इस प्रशार इनकी महत्ता और मी अ्रधिक दो जाती दै। दृश्य और तदन्तर्मत चस्तुएँ. मन में विशेष विचारों की भी जागत कराने में क्षम हैं। यह प्रत्येक कवि का अनुभव है, विचारों के कारण काब्य में भावानुभूति के साथ ही योचबूत्ति को भी चैतन्या- नंद की अनुभूति भी होती है श्रौर ज्ञानतृपा भी शांत होती है। इस प्रकार काब्य में भावना और शान का समवय द्वो जाता है। अस्तुत काव्य कपई वर्णना इसके सुन्दर उदाहरण प्राप्त होते हैं। इन्हीं दृश्यों के नेसर्गिक रूप- चित्रणों में मानव-प्रझृति के साथ ही बाह्य प्रश्ोति का भी मनोरम याँका कॉफी देखने को मिलती है|

भाव भावनात्यर रमणायता के साथ ही भाषा की सुरूप-शालिमा और अलकृताकृति भी काव्याकर्पण और हृदय हपंण म॑ अत्युपयुक्त सिद्ध होती है। इसी ल्षिए काब्य-भापा को विपिधालकारों से शलकृत और शब्दावली के सुघणालफऊारों से फकृत करने वी आवश्यकता को तल दिया गया है ! प्रस्तुत काव्य-भापा म॒ यद्यपि अलमार-योजना की अधिकता विशेष नहीं तथापि कोई विशेष ऊनता भी नहीं, वरन्‌ कद्दा जाना चाहिए. कि भाषा सुवर्णाभूपणों से समलइत होती हई अथार्लकार चमत्कार से भी चारुचचित है। भाषा में कहीं कहीं कुछ विशेष शब्द और प्रयोग ऐसे भी थ्राये हूँ जिनका प्रयोग प्रचार प्राय साहित्य-माषा में यहुत ही सामित और नन्‍्यून है। किन्तु ऐसे शब्दों और प्रयोगों का प्रयोग उनकी विशिष्ट भाव-व्यजञ्ञना के कारण आवश्यक सा प्रतात द्ोता है | भापा सबंधा सयत और सरस मुयोध है। सवादों में भाषा का स्वरूप विशेषतया व्यावहारिक है, किन्तु अन्यत वह स्वंधा साहित्यिक सौष्ठब सयुक्त है। छदान्तर होते हुए भी तथा भाषान्तर होते हुए भी भाषा और शैली दोनई सें दी मजुल प्रवाह है, सर प्रगति है, और घारावाहिक्ता है, जिससे कथा गति और रस प्रगति को प्रयांत्त सहायता प्राप्त दोती है। भाषा खाधारणतथा सबेन नियम नियनित और सुब्यवस्थित है। यहीं यह भी लिखना अप्रांसमिक नहों कि काब्य मे कतिपय ऐसे छदों का भी प्रयोग किया

आओ

शया है जिनका प्रयोग साधारणतया काब्यों में बहुत ही कम किया गया है-- यह एक कठिनाई और कवि के मार्ग में रही है। क्‍योंकि सप्रयुक्त तथा सुपरिचित छुंदों की रचना में कवि को कुछ भ्रधिक सुविधा रहती है, और उसके अनुकूल शब्दावली प्रायः अधिक कवियों के पास रहती तथा सरलता से रचना फे समय में सुलम होऊर आ्रात्त हो जाया करती है और कबि को तद्थ शब्दन्संचरसन और शब्द-संगुंफन में अधिक कठिनाई नही पड़ती इसी लिए प्रायः अति प्रचलित छुंदों में काव्य लिसने को अपेक्षा, अल्प प्रयुक्त छंदी में रचना करना कवि के लिए. विशेष उत्कर्पदायक और प्रतिभा परिचायक द्वोता है। छेंद-चयन में प्रायः कविजन इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि छंद सर्वथा सुत्ञेय और सुप्राव्य रहें, उनका प्रगति-प्रवाह लयमय द्ोकर स्वभावतः प्रिय और सुखद हो | इसी लिए. काव्य में सुनेय छंंदों को ही विशेष स्थान दिया जाता रहा है | कवि तथा पाठक दोनों ही इसके कारण केवल कुछ ही छूंदों के अ्रभ्यस्त हो जाते हैं, ओर छुंद-शाख्र से अन्य छंद शरनें+शनेः मिस्मृति के गते में लीन बिलीन हो जाते हैं। कवियों का एक कत्तेन्य यह भो है ऊ्रि वे अपने काब्यों के द्वारा छुंद-शाखत्र की भी रच्या करें थौर उसे समाज और माहित्य के ज्षेत्र से परे नहीं जाने दें इस विचार से ऐसे अल्प- प्रयुक्त छुँदों के उपयोग के लिए, भी हम प्रस्तुत काव्यकार को बधाई देते हैँ सम्मव है कि कुछ पाठकों फो ऐसे अल्प-प्रयुक्त छंदों फे पढ़ने में कुछ अतुविधा ओर -तत्कारण कुछ अरुचि-सी प्रतीत हो, किन्तु उन्हें उक्त विशेष बिचार को ध्यान में रखते हुए इनका स्वागत करना चाहिए।

श्ंगार तथा बीर रस अपान प्रस्तुत काव्य के कथानक की झोर संकेत कर देना भी यहाँ समीचीम जान पड़ता है। कहा गया है कि यह एक पौराणिक चरित्र हे और सूथवंश से सम्बन्ध रखता है। प्रायः मद्यकाव्यों में कृष्ण और राम-सम्बन्बी कथानक लिये गये हैं। नेपध और किरात तथा माघ काब्य का सम्बन्ध महामारत और कृष्ण से है। रघुवंश सूंवंश-काब्य है। यद्यपि इस काव्य में घार्मिक या साम्पदायिक तत्त्वाघार नही, तथापि कृह सकते हैं कि यह राम-बंश या सूर्यवंश-सस्बन्धी होफर एक प्रकार से राम-काव्य-परम्परा में आता है। साथ ही यह साहित्य-नियमानुकूल महाकाव्य की श्रेणी में नहीं, हाँ, प्रबन्ध-काव्य की कच्षा में जाता है| वास्तव में इसे चरित या कया- काव्य ही कहना अधिक युक्ति-संगत है ) ऐसे काब्यों का प्रमुख उद्देश्य चरित्र-

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मित्रण और सदाचरण-शिक्षण ही हुआ करता है। इस प्रस्तुत काव्य से भी सच्चरितता तथा सदाचार की व्यञ्ञना प्रात्त दोती है। अवीक्षित'के चरित्र मे अपनी महत्तपूर्ण तिशेषताएँ हैँ, इसी प्रकार मामिनी के मी चारचरित में अपनी विशेष महत्ता है। विश्व पाठऊ स्तयमेव चरित्र-चित्रण वी चादता देस परस लैंगे हमारा काम यहाँ इसकी विवेचना करना नहीं।

वास्तव में यहाँ इमने केवल प्राऊ़्‌ प्रवचन के ही रूप मे इस काव्य पर कुछ विदगम इणि डालते हुए सामेतिक ढग से इसकी विशेषताओ पर सूक्रम कथन किया है। हमारा उद्ृश्य दस काव्य की मामिक और सवाद्भीण आलोचना का करना नहीं, वस्ठुत यह कांय ता सहृदय, सुयाग्य पाठकों और समालोचतों के है। लिए रदता है। हमारे इस लेस से सम्मबत सद्ददय काब्यानुयायिया को कुछ विशेपतासूचत सफेत मिल छकेंगे। यही हमाश इसके लिखने में मुख्य विचार भी रहा है | हम यहाँ सक्तमालोचक के रूप म॑ तो नद्दी, वरन्‌ एक साधा- रण वस्तु-परिचायक के रूप मे ही हैं। एक पाठक और काव्य प्रेमी के रूप में हम अपनी ओर से यदद भले दी कह सबते हैं. कि इस काव्य वी उत्त विशेष- ताएँ हमें आ्राकपंक और हृदयबर्दक हुई हैं। ग्राशा है अन्य रहदयणना के लिए भी वे विशेषचरएँ तथा उनसे श्रतिरित्त श्रन्यान्य विशेषताएँ भी चाहने और सगहने के योग्य हागी।

अन्त में हम इस श्लाध्य काव्य की सफ्लता पर इसके रचयिता श्री० प० नमंदेश्वर जी उपाध्याय, एडवोकेट को हार्दिक बधाई ओर साधुयाद देते हैं। उन्होंने अपने दिवृब्य श्री० स्व॒० प० यदरीनाणयण जी चौधरी 'प्रेमदन! का इसके द्वास पूरा प्रतिनिधित्त जिया है। प्रेमघन जी हिन्दी साहित्य-सदन के एक जगमगाते हुए. अनुपम रत थे। काव्य नाठ्क, मियन्‍्ध और आलो- चनादि कतिपय साहित्य विभागों उनको स्मरणीय और अनुक्रणीय सुक्ृतियाँ हैं | भाषा ओर शैली के ज्ञेत्ां भी उनकी मश्चामयी देन है | उनके सुयोग्य उत्तराधिकारी और प्रतिनिधि होते हुए श्री पडित नर्मदेश्वर जी उपाध्याय ने इस इति के द्वारा जो सरस्वती सपया की है, उसकी सहृदय सुयोग्य सल्हाव्या- नुणगी और साहित्यसेवी सखार सराइना करेगा। और इस रुचिर रचना का समादर करेगा, यही हमारी आशा और मगल कामना है।

१२ बी वेलीरोड, प्रयाग ) बुधबृन्दानुरागाका ली ब्लड पा रामशेद्डर शुक्ल “रसाल” एम० ए० डिलिंद

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श्री नमैदेश्चर उपाध्याय एम० ए०, एल-एल० बी० एडवोकेट हार्टकोर्ट, उत्तर अदेश

उपस्कार

काना सानस नौमि तर्रान्त प्रतिभाम्भसि थन हंस वयांसीव, झुवनानि चतुर्दश | आत्मानदाप्ति के अ्रभिषाय से, इस चांद चरित्र पर इस वाब्य का लिखना कई वर्ष पूर्व मैंने आरम्म किया, और शने>शने इसे पूर्ति क्री ओर ले चला। चयन जय अवकाश मिला और उर में उमग-रग आया, इस रचना का कार्य करता रहा | मगवक्त्पा से यह पूर्स हो गया | इस काव्य के विषय में कुछ विशेष विचेचनालोचना फे करने कान तो मुके चल्छुत कुछ अधिकार दी है ओर में ऐसी) अधिवार चेश करना समीचीन हा समझता हूँ हाँ, इतना ही कहना चाहता हूँ कि इस काव्य की रचना में एफ नवान साग॑ का अवलग्यन किया गया है, इससे यहाँ उस सार्ग पर कुछ प्रकाश टाल देना आवश्यक अतीत द्वोता है। यद्यपि इस काव्य का समग्र कथा प्रयन्ध मूलत द्रतत भाषा मे है, तथापि एक विशेषता यह अनश्यमेव रक़्सी शाई है क्लि इसके पुरुष-्पान यदि खरा बोली में--मेरे पितृष्य श्रेमघनजी का यह मत था कि सता योची आ्रम्य भाषा- भिव्यञ्ञन विधि है अत वस्तुत इसके लिये सरी गोली ही उपयुक्त शब्द है--- हो ख्री-पाय बच भाषा यीलते है क्यांस्ि ब्रज माया में स्वाभाविक मसणता, मृदुता, मधुरता और मब्नुलता है जो विशषतया ख्रियोचित है | इस बात्य में यथए स्वाभाविक्ता के साथ ही क्‍या या विकसित और प्रवाहित करना ही मरा मुख्य उद्दश्य रहा है ओर मेरी यह धारण) है कि प्बध-काव्य का यही एक परम लक्ष्य दे कि उसमे कथा च्तु का निदशन, भाव विकास और कथा का क्रम स्वाभाविक हो कथा निरूपण मे, बथान स्थान पर यथावसर सगीत का भी समावेश किया गया है दससे कि मास्तीयां में बिशेष अवसरा पर सगात-समारोह, पूर्व काल से द्वी चला रहा है। रही गत, ब्रज भाषा ओर सरी उोली, दोनों के प्रयोग से युक्त काव्य-रचना को प्रणाली की उसे मेंने अपने पूज्य पितृय भ्ेमपनजी के एकाफी नाटक, ग्रयागसमागसन! से लिया है | उक्त नाक में रामादि पुरुपनयात् तो सरी बोली मे बोलते हैं और सांताता जसे स्लरी-पात्र ब्रज भापा | उस मद्दान्‌ कवि की गोद में दो बप की अवस्था से नी दघ तऊ पुय-स्नेद मातचन होकर लालित- पलित होने और तदुपरान्त मीउनसे जीवन पिदेव पुतयत्‌ व्यवहार के पत्ते ड्पु

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प्रकृति के निर्माताशों ने उठे, कविदा में कोमलतां के लामे का गुण लाने के लिए मुहर कर दिया, क्योंकि “कोमल कान्‍्त पदावली” कविता में श्रलल अझनिवार गुर है, यद कद्दना श्रनावश्यक है।

इ--्रज-मापा फी बनावट कविता के विश्ञेप उपयुक्त है और यह मे फदिए कि यह रिंग फे ललित छन्दों के विशेष अनुकूल हो गई है श्रका हम्मब है। उठका ही घ्यान रखते हुए कुछ छन्दों की गति निश्चित्‌ कोर्ण हो। यह मेरा अत॒मान-मात हं।

५--बोलचाल फी माषा और कविता की मापा में सदा अन्तर सा है। और रहेगा मी यथा अगरेजी में-- दी

६--पनि-शास्त्रजों का मत है कि जिस भाषा में स्वस-प्रघान श्दोंग दापिरस और ब्यञ्ञन-्प्रपान शब्दों की अल्पता होगी, वढ विशेष कण इाव्पोंसित होगी। इसी कारण से शैटिन, श्रंगरेजी की अपेक्षा विशेष कगार

हनी मोती है।

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चाल की भाषा का पद्म में ज्यवहार फरते हैं, तब उन्हें भी उसे काब्योपयुक्त आप समसना ही चाहिये | पर तय कया था, 'सडी बोल! सदी हो गई। शी मंथिलीशसूण ऐसे सुपूर्तों ने उसे श्रपना लिया और खडी बोली का बोलबाला दो चला | काव्य-भाषा की समस्या भय या हल हो गईं। साधारण बोलचाल की भाषा प्चों में चलने लगी | एक नया युय आरम्म हो गया बज भाषा के ज्ञानाम्यासत से भी पिड छटठा | अ्रव॒ क्‍या था जेसे मोरजापर के खजडीवाले

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के कारण उनके भावों और रचनाओं से पूर्णतया प्रभावित होना मी मेरे लिये स्वाभाविक ही है! भाषा

मुममें श्रज-मापा से कुलागत पक्षुतात का होना भी यद्यपि अवश्यमायी है, किन्तु स्वतन रूप से भी विचार करने पर मुझे भी अन्य सदृदय काव्य-रतिकों के समान खरी योली की अपेत्ञा ब्रज-भाषा में ह्वी विशेष माधुर्य-मारदव प्रतीत द्वोता हैं जिस ब्रज-भाषा का प्रयोग इस काब्य में हुआ है, उसे प्रेमयनी बजन्भाषा! कहना ही अ्रधिक उपयुक्त होगा | वह ब्रज-भापा रूप यह है, जिसमे ब्रज-भाषा के प्रयोग-प्राचुर्य से विगलित तथा दुर्वोध भूत शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता, यथा ;--भमन (मवन) ग्राम (गाब) कुमरि (कुमारी) अ्रप (श्रपना) भामतों (भावना) विंजन व्यजञ्ञग) केग्राई (कमरी) आदि | संस्कृत के उन्ही शब्दों का उसी सीमा तऊ प्रयोग क्रिया जाता है जहाँ तक जो शब्द ब्रज-भाषा की प्रकृति के अनकूल हों। सम्मवतः भविष्य मे प्रयोगोपयोगी होने के लिये प्रेमघनजी ने अपनी इन विशेषताओं के साथ इस नवीन शैली का प्रयोग किया था, किन्तु उनकी कविताशरों के प्रकाशन में इतना विलम्ब हुआ फ्ि यह प्रेमघन- शैली आगे के कवियों के समक्ष सब प्रकार नहीं सको मेरे विचार में यह शैली काव्य-रचना के लिये परम उपयुक्त है|

जिस समय स्व० श्री पं० महावीरप्रसादजी द्विवेदी ने सरी बोली की कवि- ताश्रों का प्रकाशन सरस्वती! में आरम्भ किया, उस समय कविता-रसिक इस नये श्रायोजन से परम अधन्तु्ट और सिन्न हुए, किन्तु प्रणाली को रोकने में समर्थ हो सके। यह भी ठीऊ है कि उन्होने इसके विरोध में कुछ विशेष प्रवत्न भी नहीं किया | हिन्दी-संसार में उस समय, 'सरस्पती पत्रिका? अयनी सचिनता और सुचारुता में अद्वितीय थी उसमें नया रंग-ढंग लाकर, उसे (कमतः परम? करने की, दिवेदीजी में उत्तद अ्रमिलापा थी | री वोली फे साथ ही, संस्कृत के भी वे पंडित थे, अतएव कालिदास की निरंकुशता? नाम की एक लेस- माला, सरस्वती-पत्रिका में प्रशाशित करके हिन्दी-संसार मे सलबली सी मचा दी। व्याकरण का भी प्रपंच उठा दिया और “भारत मित्र! के/सम्पादक स्व॒० श्री चालमुकुन्द गुत से, संस्कृत और हिन्दी के व्याकरण-नियमो पर घोर समर हुआ। बस, हिन्दी-सेवियों को ऑसें द्विवेदीजीकी ओर धूम गई ओऔर उनके पद्षी-पिषक्षी दोनों ने ही अब यह देखा ऊक्रि द्विवेदीजी सरैखे विद्वात्‌ जब बोल-

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चाल की मापा का पद्म में व्यवहार करते हैं, तत्र उन्हें भा उसे काव्योपथुक्त आपा समसता ही चादिये | यस तर क्या था, “सर पोर्लाः सदी हो गई | श्री मेथिलीशरण ऐसे सुपूर्तों ने उसे अपना लिया और सडी बोली का जोलबाला हो चला काव्य-भापा की समस्या अप या हल हो गई। साधारण बोलचाल की भाषा पयों में चलने लगी एक नया युग थआारम्स हो गया ब्रज भाषा के जनास्यास से मी पिंड छूटा ! थरय क्‍या था जैसे मीरजापुर के खजडीबाले अपड होते हुए भी, यडी मार्मिक और आलोचक कजरी पना लेते हैं, वैसे ही सामान्य व्यावद्ारिक सरी योली में मी सभी नवतिस्सिये कविता बना चले। यों खड़ी पोली चली तो चल ही पडी और चलती ही गई और ग्राज भी चल रही, है

रिन्‍्तु पिंगल का श्राधिपत्य, कविता में पिर भी बना ही रहा ओर खरी बोली की भी कवितायें प्राय रिगलानुसार होती रहीं किन्तु अनम्यस्त नव- 'सिियों के लिये छुद॒-प्रयन्ध कष्ट-साध्य और य्रसाध्य सा लगा। अस्याधुन्द मपमानी पद्च-रचना के मारग में पिंगल भी एक बडा भारी रोड़ा था जो शीघ्र दी दूर कर दिया गया। इसके प्रधान कारण यों ये :--

(९) दिवेदीमी ने अन्त्यानुप्ास-हीन सस्कृत के वर्णिक वृत्तों की रचनाश्ों की ओोर ध्यानाकर्पषण किया

(३) अ्रंगरेजी-शिक्षा प्रचार उक्तप प्राप्त कर रह्य था और शेक्सपियर आदि के ब्लेन्क बस की नकल की ओर कालिज के विद्यार्थी-कवियों का ध्यान आइए हो रहा था। ब्रीसवीं शताब्दा के श्रंगरेजी काव्य-रचना की रूप-रेसा वहाँ के मासिक पत्रों के द्वारा, अगरेजी शिक्षा दीज्ञावाले भारतीय के दृष्टियय पर आई |

हम भारतीयों में चाहे और कोई विशेपता मल्ते द्वी हो, किन्तु यह विशेषता तो अवश्यमेय है फ्रि हम नक़्काल ऊँचे दर्जे के हैँ। मुसलमानों फा राज्य आया तो उनरी वेप-भूषा, और रून सहन नकनकर हमने उनको मात बर दिया शोर जय थ्रेंगरेव श्ाये दर उनके हम मुरीद बनकर, उनका सा नाच नाचने लगे | इसी प्रवृत्ति ने दमारी कविता की परिषर्टी और परम्परा की रूपरेज़ा का भी पलट दिया। क्रमश ंगरेजी सविता की भी नकल द्िन्दी में दाने लगी श्रौर लगती हिप्लीफाई या मिन्‍न के सह्श नये विद्यार्थियों की आधुनिक सरा गेली की कविता ने सुचित काज्य सोमनाथ को विष्यस कर दिया | यह भी कहा जाने लगा कि कविता बास्तव में लयाधान ग्र इन लेंगडी ठिंप्नाशाइ खूपचारी रदिताओं में उत्दृूश् रूप से ्य-लालित्य है।

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प्राकृति के निर्माताशों ने उसे, कबिता में कोमलता के लाने का शुण लाने फे लिए सुकर कर दिया, क्योंकि “कोमल कानत पदावली” कविता में अ्रत्यन्त अनिवाये गुण है, यह कहना अनावश्यक है )

४--अ्रज-मापा की बनावट कविता के विशेष उपयुक्त है और यद भी किए कि वह प्रिंगल फे ललित छन्दों के विशेष अनुकूल हो गई है अथवा उम्मव है, उसका ही ध्यान रसते हुए कुछ छन्दों की गति निश्चित्‌ की गई हो | यह मेरा अनुमान-माजर है ;

पर--बोलचाल की मापा और कविता को भाषा में सदा अन्तर रहा है ओर रहेगा भी यथा ंगरेजी में---

६--ध्वनि-शास्रज्ञों का मत है कि जिस भाषा मे स्व॒र-प्रधान शब्दों का आधिक्य और व्यञ्ञन-प्रधान शब्दों की अल्पता होगी, वद् विशेष करणप्रिय दी काव्योचित होगी। इसी कारण से लेटिन, छगरेजी की श्रपेत्ञा विशेष कर्णप्रिय मानी जाती है।

इस विशिष्ट गुण से ब्रज-मापा ही अधिक सम्पत्त हे और यही कारण उसके भ्रति-माधुरय के होने का है। यथा--

कहाँ लौं (क्दाँ तक) कीबो (करना) चहूघा, विसारी, इते, चवैया, श्राँजे, निद्वारी, भावते, सरसे | ऐसे अनेक उदाहरण संकलित किये जा सकते हैं, जिनसे यह सिद्ध, द्ोगा कि ब्रज-मांपा में स्व॒र-प्रधान अक्षुर-सम्पन्न शब्दों का आधिक्य है|

जिस प्रफार हम रोटी, दाल, चावल ही सामान्यतः खाते हैं, किन्तु त्तीज, स्पोह्वर, मेहमानदारी और चाडकारिता में पूर्ग कचौरी, बड़ा फुलौरी और उनके ब्यंजन युक्त भोजन करते और कराते हैं, उसी प्रकार का अंतर बोलचाल की भाषा की कविता में और सबंगुण आगरी ब्रज-भाषा की कविता में है।

यह ग़ुण-गान केवल ब्ज-भाषा से स्नेह और कृतज्ञता-मान प्रदर्शन के लिए ही नहीं है, वरन्‌ सत्य कथन है और कविता में उसकी विशिष्टता के प्रकट करने के ध्येय से हे | हिन्दी को गौरवान्वित करनेवाली, परीयूप प्राशन सी अमर- रतप प्रदान करनेवाली, रस-र्नामरण देनेवाली ब्ज-माषा के प्रति अक्ृतशता- * ज्नित निरादर की अकारणुता का प्रदर्शन के विचार से है जिसमें ब्रज मापा

बाद में नाट गो बाई डिफ्तल्ट (]४४ए 7०: 8० ७ए १८६णो/) अ्रप्नतिवादित रद जाय |

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कथा-वस्तु

काव्य-शाब्रानुसार, भद्याकाव्य की कथा पौयणिक अथवा ऐेतिहासिक हो सकती है| यद्यपि वेद और पुराण भी हम आयों के इतिदास-अन्य ही हैं, किन्तु आजकल्त इतिहास का तात्पर्य इधर के दो हजार वर्षों के इतिहास से है। इघर का भारतीय इतिहाठ विदेशीय आक्रमण, श्रत्याचार श्रोर वैमनस्थ से इतना श्रकीर्ण है कि अपने परामव, अपनी चुटियों और न्यूनवाओं का चिन्रण करना, अझुचिकर ही प्रतीत हुआ मद्यामारत की मूल कया, एवं रामायण की कथा पर ऐसे दिग्गज कंबियों ने अपनी लेखनी चलाई है कि उनसे भी अलग रना ही सम्रीचीन समझ पड़ा।

कुछ पुणाणों में कया-आखेट आरम्म किया तो मार्कडेय पुराण में अवीक्षित चरित्र मिला, जिसफे आख्यान को पद्कर चित सन्तुट्ठ और गदूगदू हो गया। अ्रत्येक भारतीय इस कथा को पढ़कर गौरवान्वित हो जायगा और अपने पूवजों के प्रति भ्रद्धा और भक्ति के रखने में उपादेयता है इसमें सत्यता देखने लगेगा इसके चरित्र-नायक धीरोदात, उनको स्त्री आादश भारतीय महिला है | इनके पिता आदश्श पिता और चरित्र नायक का पुत्र भी आदर्श राजनीति निपुण है | इन सबका यहाँ विशेष गुणगान निर्थक ही सा है, क्योंकि पाठक काव्य पढ़कर स्वयं उसकी विवेचना कर सकेंगे

अबोक्षित

यह सर्यवंशों राजा थे। इससे कि पुराण के १३६ वें श्रध्याय में कहते हैं : "एवं विधाहि राजानो वमूथुः सूर्यवंशजा!

अब, यह विचारणीय है कि अवीछित, भरी शमचन्द्रादि के पूबज ये कि उनके उत्तराषिदाएरियों में से थे |

साडेय पुराण निःतन्‍्देह भारत” के पश्चात्‌ लिया गया, क्‍योंकि जैमिनि ऋपे इसके प्रथम अध्याय में प्रश्न करते हैं।

भगवन्‌ भरताख्यानं व्यासे नोक्तम्‌ महात्मना

तदिंद मरताख्याने बढ़थ भ्रति विस्तरम्‌ | तत्वांशाठ॒कामो5हं मगवस्त्वाम॒पस्थितः इस प्रश्न के उत्तर में, द्रौपदी का क्‍यों पाँच पाएडवों से विवाद हुआ और

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छन्दों के बाहुल्य पर क्या प्रयोजन, क्‍या उद्देश्य और क्‍या उपादेयता थी, इसमें इस पर विचार करते करते मैं इस निष्कर्प पर पहुँचा कि इनकी उपा- देयता विविध प्रकार के भावों के प्रदर्शन में क्षमता आने में है। जैसे बर्णनात्मक अंशों में श्रधिक माताओं के छुन्दों की उपयोगित ऐोगी और भावात्मक प्रसंगों पर भावानुसार छोटे और बड़े छन्दों कौ। इस निष्कर्पानुसार इस काब्य में भावानुसार छन्दों का प्रयोग झिया गया है और आशा है इस योजना से रसिक पाठफ़गण सतुष्ट भी द्ोगे | उदाइरण के लिये, दूत राजाओं को स्वयंवर की सूचना देने जा रहा है यहाँ पदरी छन्द का प्रयोग हुआ है जो बिना कवि के कद्दे स्वय छन्द ही प्रक८ कर रहा है कि दूतगण वेग से सूचना छैकर जा रहे है

तब चले दूत सब दिसिन चार। साडिन बाजी गज पै सवार॥ . पृ० १० पुन+ भामिनि अपने मनोनीत पति श्रवीक्षित की कारा स्थिति पर दुःखी मन हो विचार कर रही है। ऐसी परिस्थिति में भाव स्वभावतः थोड़े शब्दों में निसत द्वोते हैं इससे चन्द्र छन्द विशेष उपयुक्त प्रतीत होता है कौन रही जल्दी मेरेन मलक एकही मैं भई सनाथ |॥ भाग्य को रुराहइत रही दासी। है हो, सीता सी पद--उपासी॥ . पृ० ३७ ईसका अब विशेष रूप से यहाँ विवरण बढाकर पाठकों की विशता, रसिकता और कुशाग्रता ही पर इसे छोड देना समीचीन प्रतीत होता है | अधिकाश मद्दाकाब्यो में एक ही छन्द का प्रयोग हुआ है अथवा कम से कम एक-दो सर्ग में तो हुआ ही है, किन्तु इस काव्य के एक ही सर में अनेक छुन्दों का प्रयोग हुआ है। काव्य-शास्त्र में महकाब्य के एक दो सं में ऐसा हो सकता है यथा साहित्य दर्पणे पठ परिच्छेदे :--- नाना बृत्तमय+ छापि सा कश्चन हष्यते ! स्गान्ति भाविसगंस्थ कथायाः सूचन भवेत || इसमें सन्देद नहीं कि अन्तिम अनुशासन का पालन इस काव्य में नहीं किया गया, केवल इस धारणा से कि कथा के जानने की उत्कंठा उत्तेजित हो,

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इसी से कथा का अकथन भी नाटकोपसुक्त किया गया | इस निरकुशता के अथ्थ छ्मा प्राथना है संस्कृत वाक्यावल्ी

₹--सस्कृत वाक्‍यों का प्रयोग कभी मी इसके पूर्व कार्यों में न्ीं हुआ है इस प्रयोग का कारण यदद है कि कथा प्राचीन समय की है, जय उस्कृत ही सुपठितों में व्यवद्धव होतो थो और याव-चीव में जैसे हम राब्र कहीं कहावत; कहीं ठुलसी शोर कहीं सूर के पद्याशों का व्यवहार करते हैं, उसी प्रकार स्वामा- बिकता के प्रदशनाथ, सस्क्ृत पद्माशों ग्थवा वाक्‍्याशों का प्रयोग हुआ है।

यया--सहसा विदघीत क्रियामू पृ० ६१

दैवो धावति पचमः पृ० ४७

चर्मत्य सूछुमाग तिः पृ०१३३ इत्यादि

सर्ग २१वें में जहाँ १२ करन्धम और अवीक्षित के वाणप्रस्प श्रौर गह- स्थाश्रम पर वाद-विवाद के अवसर आये हैं वहाँ पर गीता, मनु.स्मृति से अविकलल वाक्प उद्धुत किये गये हैं| यह भी स्पाभाविकता के प्रदर्शनार्थ ही है।

३--स्वामाविंकता की ही धारणा से नाच-रग को भी ययास्थान स्थान दिया गया, क्‍योंकि श्रतीत काल से ही उत्सवों में इसे प्रधान श्रंग सममा जाता रहा है। मगल-कार्ये श्रीर अन्त्येष्टि में यही उपक्रम भेद कराता है। भारतीमों में अन्त्येष्टि में मी सान-पान बडे समारोह से होता है, किन्तु शत्यादि मगल अवसरों पर ही उपयुक्त सममा जाता है, जिसका अवाय रूप से झाज तक प्रचार है यह कहना कि यह यवन-काल का दूपण है, श्रनगल है। कविकुल श्रेष्ठ, कुलपति भरद्वाज ऋषि ने तो भरत के श्रातियेय मे सामान्याश्रीं को मावातीत समादर क्या था और अ्रयोध्यावासी कहने लगे थे;

अप्सरों गण सयुक्ताः सैन्य वाचमुदैरयन।

नैबायोध्या ग्रमिष्यामो गमिष्यास दडकान

कुशल भरतस्यास्त समस्यारतु त्या सुबम॥

«»« » «« “««« ६३६ बे सग अयोध्या काड | यदि उत्ससों में गान-वाद्यददि आवश्यक है तो पश्चिमीय प्रथा से हमारी प्राचीन व्यवस्था कहीं अच्छी थी | श्राजकल जो स्कूल-कालिजों मे एक नूतन पश्चिमीय उपकम का व्यवह्यर किया जा रहा है, उसके विरुद्ध कुछ कइना

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तो मानो, विरोध का ही सटा करना है “कालो ही दुरातक्रम '--यद्दी कहना पर्यात है।

अस्त, स्वयम्पर, भामिनि विवाह, पुप्रोलव में भारतीय सस्दृति के अनुसार जत्यगानादि का सक्निवेश किया गया, और इस विचार से और मी कि जिस प्रफार कालिदास ने तापस जीवन को विरोद्धित छोते हुए देस “श्रमिजान शाउन्तल? से उस्ते ग्रमर कर दिया, उत्ता प्रवार सुप्रथा श्रथवा वुष्रथा का बर्णुन कर, इसे ऐतिहासिक मदृत्त्त दे दिया गया।

४--क्था वर्णन म॑ स्वाभाविकता वा तथ्यता के कारण जय सृत्यगान का समावेश किया गया तो गीत काय का जो उसया अग अथवा रूप ही है, आना भा अनिवायय हुआ

यह गीत मेरे यों ही अनियमित मनगढन्त नहीं हैं. किन्तु प्रसिद्ध शरर स्वीकृत ताललयों पर आधारित हैं | माहफ्लि फे अतिरिक्त श्रोर स्थानों में भी सगीत का सजिनेश शेता है जिसको उपयोगिता का सह्दय पाठक स्वयं विचार कर लेंगे।

गान्धवे उत्प के वर्णन में थ्य्गार का बीमत्म रूप सा चित्रित जिया गया है, तिसजों रीति कालीन कि उपयुक्त ही कहते, किन्तु यहाँ गान्वर्वे जीवन की समालोचना के रूप मे उसका चित्रण क्या गया हे

यह अत्यन्त आश्चयतनक दै फक्रि समीत शास्त्र को जा भारत में उच्च शिखर पर आमीन है, यथोचित स्थान मद्माकाब्यों में कथिया ने नद्दा दिया | मद्ाकाव्य जन जीयन और जन का तथा तत्‌ सामयिक समाज ससार का सूक्म प्रदशन है | इस पर फेबल दतना ओर कद्दना है कि काव्य में नारद की बीणा मोहक थी ओर श्रनुत नाथ्याचार्य थे इतना ही कहना पर्यात्ष कभी नहां कहा जा समता विशेषत॒या उस देश के कवियों के काव्या के लिए, लिसके परम प्रतिष्ठित और मान्य सामवेंद गायन कला की महत्ता सत्ता प्रतिष्ठित है। या तो समग्र वेद ही स्वर भूपित है |

५--आ्रमीण शब्दों का प्रयोग। विद्वान एवं सुकवि रसाल जी से मेरा इसम वैमत्य रह है। वह गेंवारू भाषा का प्रयोग आम्य प्रयोग सममते हैं ओर इसे काव्य साहित्य की प्रकृति के विरुद्ध मानते हैं यद्पि मैं उनके काज्य सशोषन परिश्रम का परम आभारी हूँ, तद्यपि इसमें 'तरह देना? अपने सिद्धान्त

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के अनुकूल था | इसी से उन प्रयोगों के ज्यों के त्यों सपने का श्राम्रह मैंने किया | हु भेरी धारणा है कि जिस प्रकार आम्य गीतों के संकलन से साहित्य-भडार को सम्पूर्ति वाछनीय ऐ, उसी प्रकार उन गेंचारू शब्दों को भी जो विशिष्ट भाववाचक है, साहित्यिक अमरत्व प्रदान करना विधेय है | इस धारणा से इस काब्य में श्रनेक स्थलों पर गेंवारू भापा का प्रयोग हुआ दै। यथा वनचरों' और 'दनुसुत दुदुरूटः की, बोलचाल में तथा, /भहरावैं, हे “मकुनी, 'हरकाये! 'हरवराय” 'अकसन्मकस? 'सनाका! सिंदता अनेक इस प्रकार के असाहित्यिक शब्दों को भी साहित्यिक बाना दिया गया है। ६--अक्ृति वर्णन में विश्व पाठक यहाँ यह विशेषता देखेंगे कि जिस यूत्त का आख्यान उस सर्ग सें वर्णित है, उसके हू, समतुझूल घरकृति-चित्रण भी किया गया है, तथवा यह भी कह सक्‍्ते हैं कि यथास्थान प्रकृति वर्णन से ही पाठक अनुमान कर सकते हैं कि किस प्रकार की कथा का सन्निविश उस स्यान पर है। ७--प्रह काब्य सुप्रठित व्यक्तियों फे मनोरजन के लिये ही लिसा गया है गैसे श्रेंगरेजी में 'लेडी आफ दी लेक, 'सले आफ दि लास्द सिल्स्ट्रल! लिखे गये हैँ अस्घ॒ केवल कथा का विकास ही प्रवाट रोचकता के साथ हो यही मुख्य ध्येय रहा है, अलकारादि इतस्ततः जो स्वतः सके वे आा गये हैं | इसी दृष्टिकोण से इस काव्य का अवलोकन सहछृदय जन यदि करें तो उपयुक्त होगा | ८--मेरी धारणा में केवल एक ही रत है ओर वह शखद्भार-रस दे जिसके अग्राप्ति श्रथवा व्याधात में इतर रामात्मिक वृत्तियों की उत्पत्ति होती है। इसकी विशेष विवेचना 'अमघन कला समीक्षा? में किया है किन्तु यहाँ पर सक्षेप में एक उदाहरण से स्पष्ट किये देते हैं, क्योंकि इस काव्य में 'विरह शत्बार! “विक्लेप श्क्गाएं 'दास्य आद्भार' आदि विश पाठकों को मिले | यथा स्वय्य प्राप्ति : इसके उपायों में व्याघातसे नेताओं में क्रोष होता, कोई कोई छाघक गण रौद्, भयानरु और विभत्तोत्पादऊ-बृत्ति प्रिना किये सन्तुष्ट नहीं होने, गोली गोले सहन में बीर रागात्मक कार्य करते हैं, उसके प्राप्ति-विलम्व में करण रस का आविर्भाव और महात्मा गांधी ऐसों में शान्ति का | कहना अनावर्यक है कि स्वयाज्यावस्था में शानित रत नहीं वरन्‌ श्ज्ञार का प्रादुर्भाव होगा

( र८ ) पौराणिक कथा में परिवर्तन

कथा में परिवर्तन करना सिद्धान्त के विरुद्ध है, किन्तु निम्न स्थलों में अत्यन्त सामान्य परिवर्तन करना आवश्यक समझ पढ़ा क्‍योंकि उससे फ्िसी प्रकार की कोई विशेष श्रापत्ति नहीं उत्तन्न होती १--पुराण में तो राजा विशाल का करन्‍धम के द्वारा पपनित द्वोना वर्णित है, इस वाव्य में बिना युद्ध फे सन्धि करा दी गई है। २--मामिनि! जो काव्य की नायिका है, वन में तपत्या से ऊबकर आत्महत्या करने को उद्यत होती है; उस समय देवदूत प्रगट होकर उसे वारित करते हैं। इस काव्य में एक भगवद्भक्त यद्दी कार्य करते हैं, क्योंकि यह विशेष स्वामाबिक और लोकोचित प्रतीत हुआ , ३--मदत्त फे संवत मुनि की सोज की कथा, भागवत से लेकर इसमें रोचकता के परिवर्धनाथं सम्मिलित कर दी गई कृतज्ञता प्रकाशन “कहहुँ कियो, कैसे ररहूँ, पिय “रसाल” करवूत भाषा में शुचिता भरी, दचिता करी अकूत भावनि मांहि सुबोधता, सुठिता दई उमाहि। यढ़े भाव अर चावसों, करि भ्रम श्रमह्दि सराहि अति कूतश्ञ हीं पवरो, प्रिययर सुकवि 'रसाल! | होदिं मनोरथ सफल तब, बाढ़े सुजस त्रिसाल [|

श्रीमान्‌ हरिकेशव घोष, अध्यक्ष इंडियन प्रेस, प्रयाग का भी मैं अत्यन्त आभारी हूँ जिन्दोंने २४ घण्टे के मोतर काव्य को प्रकाशन योग्य सममककर सुचारू रूप से प्रकाशित क्रिया। उनको ग़ुण-आ्