प्रकाशक श्रीलाल न० जोशी मानद म्री राजस्यानी भाषा साहित्य रंगम (भकादमी) रेत्वे क्रािग, कोटगेट वीकातेर (राजस्थान)

भागष्ःमंकर्‌ अपरंल : १६७३

वरस रो मोत १२.०० येक रो मोत ३००

मुदः पारनं द्वन्द, धाम

१९

मूचनिकरा एृष्द्रौगगर्भ प्राम 1 श्री मनोरमा ध्री श्व्रचदनी भरत्या श्री मन्यनागयिच म्दामी वष्नपाठ श्री गप्र नीत "शयो जीद्रय ध्री मेगोलपद्राण श्प्राभो मोटा गवना, लारा भौन शी रण्यदीर शप

श्री श्रमनापायग ॥\

यदाषवो, पनद्र एवाषः

श्री गौण्या कहेनात्रन

१1) भाषणा

शी दादर श्रणाद्‌

शस्यकार। गा ताण १1१ शी रागनाभ श्या न्स

पलो हैक्टर

भ्वी मरष्द भानातिन्‌

प्रकाणक श्रीलाल म० जोशी मनद मघी राजस्थानी भाषा साहित्य संगम (अकादमी) रेल्वे क्रार्षिग, कोटगेद वौकानेर (राजस्थान)

भणि: मकर धपरंस : १६७३

वरम रौ मोतं १२.०० येक मंक रो मोल ३.००

शष्ट: मदने दिग्धे, पररा

पृथ्वीराज नै प्रणाम मनोहर णर्मा-

करिणी दिन

दोकानेरर्ये

मोत से मूर ऊग्यो,

राजमहल मे

सोने रो चाद वान्यो,

पृष्प्रोपर

पृष्वौराज रो अदवरण हयो

भारतमाता रो

धो लाष्लो सपूत

राजदशस्‌ गोरप्रान्दिन नी हयौ, जण मात

भौर घणा ही राजपूत महिमिप्रान हण +

महावीर

अपरे भुञवट्स्‌,

दथ महापस्नि

आप रोग्यान-साधमाम्‌, चण्‌ एश्प्रण्ण

दाद दी कृष्ा-पृरन्‌

१७.

१८.

१६.

२१.

२२.

२३.

२४.

२५.

२६.

२७.

(

ठंसयोड़ो बिन्दु (अनुव्रादित कत्रिता)} श्री पावलौ नरूदा श्री नदलावे गमा भाग मुव्राढी श्रीशित्र पांडे

फागण

श्री साव्ररमल दाधीच धर मुरधर रा धोरिय श्री रामरसिह वजन्नंरोबीर

श्री सब्राई्िह्‌ धमौरा मूमल

श्री दीनदयाल ओ्ना मेक नयो मठ

श्री मनोहर शर्मा हारको मानूर्नी

श्री समेश्वरदयान श्रीमाटी च्यार "मिनी"-वातां श्री भोम यरोड्य सोनघ्तदे सोकी

धी पद्मानाल शत्रल" पारं ब्य उतारषी? धी मनु राजस्पानी

. मापंरोमोत

धी माड राजर्पानी

~ दिनर््य

भी भेशरमाण शुषार श्रम

अनराग्मा री ष्राय

अद्‌ शष्ट मषह्नोस्दीरन्‌ यद सनरद्न ण्डय

~ न्रे

श्रय-नद- चन

पृथ्वीराज नै प्रणाम -मनोहर णर्मा-

किणी दिन

शोकानिरमे

सोनै रो सूरज ऊग्यो, राजमहल मे

सोन से चाद वाज्यो, पृथ्ोषर

पृष्व रो धद्रतरण ट्प

भारतमानारो

धो सादलो पूत

राजदशसु गौरषान्वितर भीषये, जण भाव

भ्रोर यणा ही राजपृन्‌ मटिमाद्रान हदा

ह्म मटादीर

आपरे भुजनवःस्‌,

श्य मह्न

भाप रोम्दानरा्ना म्‌, हश्‌ पएरमडन भारसरेद्रार्ग, श्‌

( ५४}

१७. ठंरघोज्े विन्दु (अनुत्रादित क्त्निता) श्री पावनो न्दा श्री चदलाल शर्मा शट. भाव भुद्षटी श्रौ शित्र षाड १६. फाग्ण श्री सनिरमल दधोच २०. धर मुरवर धोरिय श्री रामरिहं २१. वजात्रेरोवीर श्री सद्राईसिद्‌ धमर रर. भ्रुमल श्रो शोनदयाल बओोक्षा २३. अक नयो मठ श्री मनोहर शर्मा २४. हारको मानू-नी श्री रामेर्ररदयात धीमाढी २५. ष्गर नीः-वाता ध्री भोम अरोध २६. एोनसदे सोदी री प्रापाम पथत' ७. पटं कुण उतारमी ? श्री मनु रागस्पानी २८. शपंशेभोत्‌ धी ष्ये रायप्यानी २९. परिनजर्या यी भंवरनात शुषार मर १०, भक्ष्या दी जडाय पीपोटत बनोद ११. गणष यौ रन्न्ग्डनशरी 3, 031; जरनन्दद्न्य्‌ ष्या ३३ करय कगर-भृर षर

पृथ्वीराज नँ प्रणाम --मनोहर शर्मा--

किणी दिन

वोकानिरमें

सोनै रो मूरज ऊग्यो, राजमहल मे

सोनै रो चाठ वाज्यो,

पृथ्व्रौ पर

पृथ््ोराज रो अवतरण हषो

भारतमाारो

ष्मो लाहलो सपून

रावणम्‌ गौरद्रान्दिव नी हयो, जण भात

धरोर धणाटही राजपूत महिपाघ्नान हषा

दण महावीर

षरे भुजनवटमस्‌,

श्ण महापध्नि

रीग्दान-रताधना स्‌, श्ण परमभन

भाररोसेष्टानूगासू

२|

गौरत्र ग्रहण करथो,

लोक-हिरदे मे प्रतिष्ठा पायो,

गुण-गरिमा रो कौति-मान यापित करथो इण महामनीषी

शरोकृष्ण-चरिप्र पावन प्रकाशमे

भारत री जनतानै

गीता रो अमर सदेश

फेर दियो।

दण दिव्य पुरुप जापरंमत्र-वटम्‌ आारज-भोम मे मापमतं स््रापीनता-गूरज नं मढभद्टाट करतो रास्यो

रष्टररतनि पृष््रौरान री याणी दिमाचछ रो गौखर-गान टै, गगारोपाद्रनगीतरै, रतनाफ्ररो गभीरयपोधषरै, भारतीरीवौतारोदिघ्पगुरदै।

मारती-मत पृथ्योराजनं ध्रमाम! वारदारप्रदाम !

राजस्थानी रा समथं सेवक श्री शिवचंद्रजी भरतिया

-सत्यनारायण स्वामी--

(१) बआपूनिक राजस्थानी साहित्य रं हतिहागमे श्री शिघ्रचद्रजौ भरतिया रो नात्र सोन रे मापखयामे लिसीजसी राजस्थानी रं आज रं ह्ाहित्य नं उणा भेक जवरदस्ते मोद दियो द्दी-साहिव्य रे समुत्थान भौर उण री श्रीवृद्धि मे निको काम मारतेदु हरिश्च करो ठीकवबो हौ काम राजस्वानी साहित्य मे मरत्तियाजी करघो। भेरतिपाजी आघुनिक राजस्थानी साहित्य रा प्रथम महत्तरपूणं साहित्यकार है श्री पित्रचद्रजी भरतिया रो जन्म विक्रमी सवत १६१० री चंत भुदि सातमरं दिन हयो "फाटका-जजा' नाटक मे उणा भाप रो परिचय मात दियो है- हारो जन्म वरिष्ठ वेश्यकु् मे अग्रवशौ तथा} मोघ्री सिंगल, वेक छे भरतिया, 'विद्ानिवाग' प्रपा (विदयानित्रास' जिण की पदत्रये) दादा गमारामओी, जिण को पुष्य अपार जाया सुते बब्देव्रजो, कीनो बृद्ध-विस्तार ॥१३२॥ उण षो मुत शिव्रचद टै, दृढ मे शास्य्रवीन। बृढ बी रीत नूुधारवा, कीनो प्रय नद्रोन ॥१५ भरतियाी च्यार भारा व्यार मायामे वेराग्ामू वहाहा। पिताजी री मृत्यु रे बाद उणा री सणढी सपत्ति दोटिया तीनू भाया ापतमे वाटली भौर उणा रेव वधे नही खायो इण कारणः उणा व्यापार करयो द्योढनं दढनसत करणी सरू करी पण द्ालतमे उणांरोजी नही ष्ताम्पो भौर उणा दौर मे सरकारी मौकरीषःरसो। मरतियाजौ माप रं जीध्रण मे वणा ताता-उना उठार-षटाव्र देष्या। बे मनमोजौ जीन्र हा पराधोन रयन किणरहो षापं दाम कोनी कर स्वरया! श्ण बारणदेनाहो अक जाग्यां पूरी तरं टिवनं काम कर सग्याबौर ना हीउपां कोर भेकहीतरं रो्धोष्रपो। जीद्रगमे उधार मोको प्रद्रा रंयो।

६|

कदत दया वृष्योरी ददम कद कप्त दुा जरा दका नाती रटे, प्व कयो मित तस्त्य जे नदी जद" भोर भरनो रद्र्दातो कनन अमति दान्‌ दारं गोाकत पार बम दती ोप्मायरी कदरो जरती तोकषू उल पेक्य ककष श्त शो प्रवाण करथो, परपद द्रपगज्र्पो। (३) भरविपाती रो वित्र पुग्णङौ रीत्या रकग्यती नै ९. दि बै १०, परष्रीम षै भौर गब्दतय गर १८६१ प्रङासिति शुदा की साई मामः रे दषे वृष्ट रं शियनमे उनो पै रविन हिप सो प्रिवरन एत परार £-- " निदेदूवद्ररा (मण्ड, सराडी), भीताम-दपाददी (परारी), कैमर्विवाग (गारह्ारो)- द्ूणरी पार्द रही पति, भनवगुदर (मापा). परप्राणनुगुपमाप्रमी गुष्ट१० (हिष्ट), मुद्राया की गवार नारक (पारव), मोक बटो (मापारी), गुव॑ष्टक (ष्या), राग्वायो त-य (गगल) णोकतानन (ही) तिततकर तैपार-फारफा-जजषद्र नाटक (गार्राटी), मतिरिति नाटक (मरी), शषनुलाप तीयं ततर्‌ (मराद), आर्या तदरी (मरादी), पिततएन पासुपत (द्री) 1 तेपारो रहो घं-मय प्यारा पारिए्‌ ? ददी, माटी, गुजराती, पासी भौर मारत; योपदपंग (मारव्रादी)। भरतिपाजौ री यतसे द्यप्योरो पोयी ूवंयफ्रवेष' मिं है निकी उषां दार आयोजित 'वियार-दशंनः नोर रं मेक परिणा द्यरो भेक मगहै। उय रो विषयं योग-विदपा भौर वेदात सू सयधिततटै। पुस्तक-लेणन कयं रे अतिरिक्त उणां ददी पथ वप्योपकारक' सपादनमेभी घणो सहयोग दियो सामयिक मस्यात्रां प्र उणां रा जिका विचार हा यै मोटी फहाण्या भौर नि्वधारंसूपमे उणमे नियमितल्पसू प्रफ्नशित हया हा + भरतियाओी री सजस्यानी र्वना्नां मे कनक-सुदर' नात्र दी एति राजस्यानी भावा ते पलो उपन्यास है ओर भरतियाजी री प्रतिनिधि राजस्थानी स्वनामानीजा सकरद उणरो पलो भाग हौ छद सवयो, दरूतरो भाग प्रकाश मे नही मायो। भो उपन्यास उण टम प्रकाशित हयो जद हिदी मे चद्रकाता-सतति, भूतनाध जिसा तिलस्मी भीर जासूसी उपन्याला रो बोलबालो हो 1 कनक-सुदर सामाजिके उपन्यास है। दण मे उण टेम मारव्राडी समाज री कथानं जिण सरस ढग सू प्रस्तुत करी है उणनं देखन लोग घणा अ्रमाग्रित हया कनक ओर सुंदर दण उपन्यास रा नायक.नायिका दैनिकारो प्रारभिक जीत्रण ही पैलं भागमे पायो है उपन्यास रो प्रारम इण भात “दोपहर को वसत 1 चारधां कानी दु चाल रही घे। हवा का जोरमसू वाल अडी-क-उठीनि उऽ-उडवर चीका नन्ना-नद्रा दीद हो रधा छै, गौर्‌ भीजण भी रह्चा चे। मुहञचोकर सामने चालणो मुस्कलदये! दरु कपड़ा माहे सारासरीर सिकता कररहीचे। धूप इप्री जोर की पड रही छै के जमी ऊपर पग देण

[७

भूस्वल छे रस्ता महि दुरदूरकठेटी क्षाडकोनाव्र नही वाद्‌ उडकर जगा-जगा म्रा रीष हणे सू रासते दिकाणो नही 1 भादमी तो दूर, रास्ता माहे कोई भौव जिनात्ररको भी दरसण नही ये वयते भेकः जघ्नान आदमी जिणकी उमर सोढा सत्रायेरसकी थी, मापो कपड़ा स्‌ व्यो ह्रो, हुष-हश करतो-करतो अजमेर कानी चत्यो मा रहधो घै रेती यरम होये सूं पगा के घरका लागकर फोडा रहा च, प्तोभीजोरसू घास रहधो छे ।"

उपन्यास मे भाप देश मे व्याप्त पूट रौ जिङी कमजोरी ही उण तरफ भी भरतियाजी शकेत करण मे कोनी पूक्या--जपणा देश माहे भेको नही जरा तो मपिणो राग्य॒सत्ता पराया लोगा के हाय गयी "^" देखकेर धारा शट बोत्माके तो शभुट' चै साहेब हस्रकर बोत्या डे इणो अनोसो फंड धारा देण माहे धिजरा तोम्हांलोगाको राज हवो ; नही तोक का मगदूरथी मू जारा कोष पर अकर थोके ऊपर हृ्रुमते करता ? इण माहे कार ्रट चे इण पट नौ सारादेप्को सत्याना केर दीनो ॥”

"केसर+विलाम" (प्रकाशनकाढ सेदत्‌ १६५७} भरतियाजी री पैती राजस्थानी रचना भौर राजस्यानो रो पेलो नाटके है हण यादशोन्मुती यथायंवादी नाटक री स्रामाव्िक्तता मौर यथाथंवादिता हिदी रं पडित महावीरप्रसाद द्वित्ेदी नै भी पणा भ्रभाव्रिते करप उणा "तरस्मरती' मे तिस्यो--रचना सकी बहत ही स्वाभाविक है 1 बदी-कहौ पदृते समय, स्वामाविकता का इतना भापिर्भावदहो उठता है करि ष्म वात विस्मृति हयो जाती दै किः यदं कल्पित कथा पठ रदे है [सरस््रती, अक्टूवर, १६०४, पृ० ३६८] इण नाटक मै अणमेल व्या्न रौ समस्या उटठायी है। अणमेढ व्याव्र री वराई वतायनै माजन उणसू विमुखं करणौ ही इण रो उदेश्य है।

जौरलगभगञा ही समस्या शुदापा कौ सगाई" नाटक (प्रकाशनकाङ सवतु १६६३) मे उटायी है भरतियाजी री भूमिका मे लिख्यो है-दरण मादे स्विपा की स्वतेव्रताकी हद, बौ का परिणाम, बुदापा माहे व्याद्र की दच्छा,चीको अविचार, सगा, यी षौ धन ओर वौ देधन को परिणाम, त्यादि सरठ मारब्रादी वोषी महे दरगाया घे 1 जर्गा-जगा नीति, उपदेश, बोध, शिक्षा, धर्मं ओर्‌ विचार बो व्यो अढे तार्‌ उष्मेस कीनो मारप्राही ममाजषकी स्थिति, परषी भौर द्ाहर की वाता, विद्र क्षी भित्रता, पचायन गौर्‌ स्प्रौ-पुस्पक्षा वरताघ्र पर सूद विचार रङ़ेभधामाग णौ जमायोदेके जे धा दणी-कौ-दणो कटे हूप्रोदी साचो दातद्धे 1

"पाटवा-जनाद' (रचना सदत्‌ १६६४} भरतियागो ते तवसे नाटक! उवा

पणम मादद्वाद्य समाज पाटका (टरा) भौर श्ण सरीवा दूसरा दुगृणाम्‌ हूवणप्रादटी क्वण से विद्र भक्ति करपो है--*परेम अनुभव दिना जप्यो जत्र नही मधुपान दरा दिनादौ दी माधुरी मालम ह्रे नही ज्यम्‌ अनिदंबनीय भानं हेत, जटीने हदय विचीय, हण दै दास्ते प्रद दृच्दा उल्यपर हदे, भौर ज्िकासाम मृ हदयस्ेटपरणं वे दो हीप्रेम वो भत्र परस्पर दो हदय भेदके दानीेक्‌

२|

गौरन्र ग्रहण करधो,

सोक-हिरदं मे प्रतिष्ठा पायौ,

गुण-गरिमा रो कौति-मान यापित करपो 1 ष्ण महामनीषी

श्रीकरष्ण-चरित्र रं पावन प्रकाणमें

भारत री जनताने

गीता रो अमर सदेश

फेर दियो

दण दिव्य पुरुप

अपर मच्र-वठसू्‌ आरज-भोम मे आथमतं सद्राघीनता-सुरज नं भटठभढाट करतो राद्यो

राष्टरकवि पृश्व्रीराज री वाणी हिमाचढ से गौरम-गान है, गरगारोपाब्रन मीतरहै,

रतनाकर रो मभीरधोपदहै, भारती री वीणा रो दिव्य सुर है।

भारती-भक्त पृच्वीराज श्रणाम ! वारवार प्रणाम

राजस्थानी रा समर्थं सेवक श्री शिवचंद्रजी भरतिया

सत्यनारायण स्वामी-

(१) आधुनिक राजस्थानी साहित्य ₹ं पतिदासमे श्री शित्रचद्रजी भरतिया रो नात्र सोने रे भाखरा मे सिसीजसी 1 राजस्यानी रं माज साहित्य नँ उणा अक जवरदस्त मोड दियो हिदौ-सारित्य समृत्थान मौर उण री श्रीवृद्धि मे जिको काम भारतेदु हरिण्वद करो ठीक बो ही काम राजस्थानी साहित्य मे भरतियाजौ करधो भरतियाजी आधुनिक राजस्थानी साहित्य रा प्रथम महततरपूणं सादित्यकार है शरी शिप्रचदरभी भरतिया रो जन्म विक्रमो सवत १६१० री चैत शुदि सातमरं दिन हयो ! "फाटका-जजाद' नाटक मे उणा आप रो परिचय शण भात दियो है-- दारो जन्म वरिष्ठ वेष्यकरुल मे हु अप्रव्ती तधा। गोघ्री सिगल, वेक भरतिया, विद्यानिवास प्रया (विचानिश्रास' जिणकी पदत्रीखे) दादा गगारामजी, जिण को पुण्य यपार। जाया सुत दढ्दव्ररी, कोनो दुदढट-विस्तार ॥१३॥ उष को सृत िद्रचद्र है, दुद मे शास्वप्रवौन। कुट की रीत मुपारदा, कीनो प्रय नेरीनं ॥१४॥ भरतियाजी च्यारभारईहहटा 1 च्यारमायामेवेरागद्यमू वहाहा। पितानीरी मृत्यु रं बाद उणा रौ सगौ सपत्ति टिया तीनू भाया आपश्रमे धाटसौी भौर षणां र्टापष्ठी नही ञायो श्य कारण उपया व्यापार करणो दोडने वातत करणी सरू करी पण वकालतमे उणांरोजी नही साग्यो ौरउणा दौर मे सरकारी नौदरीषरती। भर्तियाजीमाप रं जी्रण मे धणाही ताता-उना उतार-षटाव्र देष्पा वै मनमोजी जीघ्र हा पराधीन रयन किणिरंद्ौ सायं कामकोनो कर सव्या दभ भाप्णवैनाहो सेकं जाम्या पूरी तरं टिक काम बरमबदाधोर ना हौउणाकरोर भेष होप्तरं रोघधोदरो जीद्रणमे उप्र मोश्ो दरषरात रेयो।

४।

पसह पात, विङीरं काया ददो ईशा दहा ही दनदादद ईन, एसौरे जीद (िष्वश्यग्‌ देल सौल पददचननोष ही आह शौवसीवी प्रिदारसिवातिता 1 प्य दौद्नगे प्रदानै मोरसो गोतो षद्‌ द्री, पर, णत भौर ररष्यामी--प्तार हो भावाद रा भता दादरा मौर दम सास" ही भाषा ठौ ग्तिनप्यता श्रो ( वप्त रा शाचहाप्भीदह) कका जनाद" भादरं एव एणा उण) भत्तो ~

पाषा मोटी, दि परददौ, द्द पदापुतरम मणी 1 रस्या पाद, निदप चद, दिदि पुरि. पत द्द गर्फाा देया पा दु.त पमो द्राप, शनो गदा वु्कक-गद्रि्ाग। गध्या परभा पिति णपु मोष, भोष्या पि सत्-नापनमोत

दिपाद्तिफितिारोष्छहौ ममयो पेभाररं वीदं भष तषमे कर्ेट पाद्रपङार रे न्यद्र गादि्व-जदत्‌ मर प्रतिषि ष्या उणा रे मामन षी उणो री स्याति री पेत गगोगेन पुत्वितिवस्पिव पपी ही ममीम्ड रे पण प्मादैष्यरीण मनुगार सरत रा भपप दरेष्ान, मराठी राक्रदरि, हवी सार्हिष्वरा शेप्रष, माहूमापा मारी रा बद्ि.धप्राद्‌, उरन्यार-सेगङ, नाटष-प्रमेता, पिदा निप्रात [दि्रषदर सरिया याप रं रमं सा सहानि दिदूदान धोर् सेक हूः

षण यटृपुसो प्रतिभा रं पमी री सोशृप्रिपता राजरपान रे प्रतिभागापी स्रत भौर हिद रे गुद्रतिद सेपरु मुगी भजमेरी रेष पत्रपं माठ तसियां जानी जारकं है

धन्य पन्य शिद्रपद्र शद्वि, धन्य भरतिया ्तभरूपय। मप्मष्ल के घाप षर हो नि.षदेद्‌ं रदति दूषण अति मञ्ञान तिमिर मवेच्टित पना जानं समाज भेष 1 द्र | धापने काव्प-किरण ते पता दिया प्रका विकतेप। भाद्रपूणे मापुस्यं सरण भौ अति नसगिकः एतषफारी भरी देणहित कौ बातें जिसमे अनुपम उपकारी हि सामाजिक चरित चिव्रषर ! रत्रिवर्मा के गुद-भाई। हि कप्नि्रर समाज-स 'गोधक ! करे कौन तप्र समता? सरतियाजी री जीत्रण-सीला उणा री ६१ वरस री अमर मे सत्रद्‌ १६७१मे दौर समाप्त हयी 1 (२)

मररततियाजी जीद्रण री सय सूं घडो उपलभ्ि ही उणां दारा करी शयी राजस्थानी भाषा मौर साहित्य री सेब्रा उणां साहित्य नं रामान सू रत्ती भर ही जुदो कोनी राख्यो 1 राजस्यानी जन-जीव्रण स्तर नं उणां आर्यां खोलनं दस्यो, जर रेख्यो स्यान री जन-सं्छृति, सादित्य, भाया बौर प्रतिप्डा--सणव्यां ने सोग्रहीणषष्टि

कं राजस्थाः खोलण सारू उणां कलम उडायी नौर सोमा

श्र देसै है 1 राजस्थानी जन री भ्य

दरसायो षै मापा सो शमाज्‌ राढ ने जाय रयो है, 'मारतादी' नांबर री मदता धटरपीहै मौर पणी मापारोतोसुधियादी दूवरंपी है!

गराई षू सोचणं पर उणां नै राजस्थानी समाज री अपमानजनक अब्रस्पा रो भरढ कारण अंत-पत जो लाग्यो कै समाज मे अजं तई अरिक्षारो घोर प्रसारदै} हणनै भिदाया विना समाज सुषरण दो कोनी, मारद्राह्ये "मारथाडी' ही रं्ी। शिक्षा रं प्रचार-प्रसार सारू उणा जनतारीचोनी नै ही माघ्यम वणात्रणो ठीक समयो मातृभाषा मू माष्ठो दूज मापा किणतरं हूय हकं है? उणा री भीटमे वात आयी कँ 'मारन्राडोी' रो उद्धार माप्राडी भाषा ही कर सकं दै-

“प्रार्ादी भाष! सापणो मातृभाषा दे \ मार्ादी मापा आपी बोधदा्री छे भोर मारद्राड़ो माषा मापणी स्त्रियां की सुधारकष्रीि) म्हासे ती सिद्धातघेके आपां स्ोगां को लक्ष्य आपणी मातृभाषा मारब्राडी कानी नही रणे सू आपणो समाज हाल ताईं णो हीन दणा मोहे प्य हयो छे। मारद्रादी भापा विश््रविद्यानयतो दूर प्षषापि द्ोदी-मोटी षाटश्चाढा तार्‌ भी पूग जाती तो घणाखरा मार्राष़्ी सरदार विदूद्रान वण जाता आपणी मातृभाषा ने हण समन्षणे सू आपणो उद्धार करिण तरे हो सके?" (वनक-सुदर' रो प्रूमिका)

कसर-दिास' नाटक री भरूमिकामे उणा री मावृभापारं प्रति हम दण ्पमे प्रगट टपौ है--

"महारा दिल माहे मेणा वि्रार आाद्रताके मापा वाप्या के बु माहे जनम लीनो, रुजगार-धधो मोकढो क्रीनो, दो-चार भापा को अभ्यास करने संकडो पूस्तका वाघी सौर सस्टृत, म्रेटी, ईदी मादे रचना मो करी, कत्निता मोकढी कीनी, पण आपणौ जनम-भाषा मारध्राड़ी तिका कानी तो नजर भी कीनी नही घोटी-मोदी फो पुस्तक वणाय ने स्षरदासा फे सामने रापणौ तो खरी देवा भता, आदर दोप के घनादर द्रे

मालूभापामे रना कएण रो उणा सो ष्टा दण कारण भो ही कं अरित मरशराो मौर उणा रोलुगायांतौषण रं अलाब्रा भारत रौ दरूजी मापाव्रं नै जादकनद्षो जाणे टो नी, फेर उण भापाघ्रा मे निखण मू मारद्राडी रमाज नै कारू फायदो ? मेक भौर भौ सवद कारण राजस्थानी मे लिवण रो उर्णा भो वतायो षौ उण समे भाषा रो सादित्य दूज भापाद्रां सादित्य मू जाबफ़ हौ षोद्रो तिष्यो जारेयो हो राजस्थानी रे गौरब्र मै भो दुनिया पामन ताद्रो हो बैसरद्रिसाप' री भूमिका मे उणा लिच्यो दै--

“मापणो नोबोटी मारब्राह भोर मारद्राही बोली क्टीदषपेरा मादैषड़ीचे, मू काप जाणो नहोक्६्?ख्दरेजी तो रवा दधो परथ दंगामी, गुजराती, मरेटी, द्टिदी भानौ तो चरा नजरष्रो, विदारणः प्रव प्ण भाषा महेतंयारट्व्रा द्धे भौर स्पाष्धिनिषां री णिणती मरी {मारणौ माररा ओतो प्रा दभा गुषार

६।

पृद्धास ऊपर वूर्पोदढी पुनिया माहे पण धरी युष्या कैः अंदर गोगा गानी रषे, एन फो अभित्रन माप सरदार्याने नही फां?

भौर भरतियाजी राजस्यानो रामाय नै भयेरी गुप्राभूं थरं सात्रण साठ कमर फली भौर आप री कनप री जागती जोत सूं रो मामं प्ररम्त करण रो प्रयाम फरपो, धरषटट प्रयास करप 1

(३) भरतियाजी रौ लिष्ोडी पुस्तं री रस्या राजव्यानी मे €, दि मं १५, मराीमे १३ गौर संस्टतमे२टै। सं० १६६३ में प्रकायित ्युढापा की शगार माटफ रं छेडतं पृष्ठ रं विश्नापनमे उणां री रचित तिया से वित्ररण दण प्रकार ै- “तिदधेदुचद्विका (संरकृत, मराठी), गीतार्थं-पदधावदी (मराठी), केसर्वितास (मासपराड़ी)- दूमरौ वार छप रही घे, कनक्मुदर (मार््राढी), प्रवाप-वुगुमात्रतौ गच्छ १० (हिद), बुदढापा की सगाई नाठक (मारघ्राडी), मोल्या की कटी (मारतरादी), गुकेष्टक (सस्त), राज्यातो ृण-प्रगस्ति (सस्छृत) शोरकानन {द्दी) लिखकर तंयार--फाटका-जजाठ नाटक (मारब्रादी), मतिविलाम नाटक (मदी), बनता तवं शतक (मराठी), भार्या वहरी (मराठी), वियात पाशुपत (हवी) ! तैयार हो रही छँ --अव क्या करना चाहिए ? ही, मराठी, गुजराती, वगराली भौर मारत्राढ़ी; वोधदपंण (मारव्राड़ी) 1 भरतिपाजी री मसरी दछप्योड़ी पोयी 'सूयेचक्रवेध' मिले है निकी उणा द्राया आयोजित 'विचार-दशंन" नाव मेक विशाल प्रथ रो येक भशटहै। उण रो विषय योगविदा ओर वेदात सू सथधितरै। पुस्तक-लेखन काये रं अतिरिक्त उणा ददी पत्र धवेश्योपकारक' सपादन मेँ भी घणो सहयोग दियो सामयिक समस्यावां पर उणा रा जिका विचार हा वै मोकढी कटाण्या भौर निवंधा रखूपमे उण मे नियमित सूपसू प्रकाशित हया हा। भरतियाजी री राजस्थानी रचनावां मे कनक-सुंदर' नात्र री कृति राजस्थानी भाषा रो पैलो उपन्यास है भौर भरतियानी री प्रतिनिधि राजस्थानी रचनामानीजा सक्कं है। उणरो पैलो भाग दही छप सवयो, दूसरो माग प्रकाश मे नदी भायो। मो उपन्यास उण टम प्रकाशित हयो जद हिदी मे चदकाता-सतति, भूतनाथ निसा त्िलस्मी भौर जामी उपन्यास रो वोलबालो हो। सामाजिक उपन्यारा है इण मे उण टैम मारवादी समान री क्या नै जिणसरतद्ग सू प्रस्तुत करी है उगनं देवनं लोग पणा प्रभायित हया 1 कनक ओर सुंदर इण उपन्यास रा नायक-नापिका दैजिका तो प्ारभिक जीग्रण ही पैलं भागमेमापायो है उपन्यास सो प्रारम इण भात -“दो पहर को वपत ) चारं कावीनरूचालरहीचे।हत्राका नौर मू वाद्‌ अटी-की-उरीने उड-उडकर वी-का नव्रा-नत्राटीवाहोरघादचै, मीजण चे मुह ऊचे कर पामरे चालणो मुस्कलघे। भिकतात्र कर रही दे 1 घरूप इती जोर की पड रही मर्म

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भुष्वल घे 1 रस्ता मादे दूर-दूर केटी क्षाड फो नाद्र नही 1 बादू उडकर जगामा नषा दीवा हणे सू रासते कौ दिकाषो नरी 1 आदमी तो दूर, रास्ता महि कोई जद्र- जिनाघ्नरको भी दरण नही 1 इशे वपत मेक जश्रान आदमी जिणक्ौ उमर सोढा- सत्रावरमष्ठीषो, माधो कषद भू वंच्यो हप, हृश-हृश करतो-करतो अजमेर कानी चत्यो बा रहो छे रेती गरम होषे मू पगां के चरका लागकर फोडा जा द्हधा चे, तोभीजोर सू चात रहघो चे" उपन्यास मे आपण देश मे व्याप्त पूट री जिष्णो कमजोरी दौ उण तरफ भी भरतिपाजौ सकत करण मे कोनो बूक्या-भपणा देश माहे येको नही जरां तो खापणी राज्यसत्ता पराया सोया के हाय भयी “~ देखकर सारा क्ट बोत्था के भा तो पद \ सेव हसक चोत्या देः भो इणो भनोखो पठ धार देष परि धेजयं तोम्हालोगाफो राज टवो ; नही तो म्हाकौ कारईमगदूरयी सू हजारा कोष षर आकर घाम उपर हवूमत करता ? एण माहे काह द्रुट धि द्रण पट तो सारादेशको सत्पानाण कर्‌ दीनो +" कसर.विलास' {प्रवापनकाढ सदत्‌ १६५७) भरतिपाजी री पैली रजर्यानी रथना भौर राजस्थानी रो पेलो नाटक दै। षण बादर्थोन्पूसी यपापेदादौ मारक री स्त्राभाप्निकता मौर यथा्ेवादिता टिदी रं पडित मटादीरप्रताद द्रिदी नं भी चणा भरभाष्ठिते रपा 1 उणा (सरस्व्रती' ते लिस्यो--रचना दरकौ हूत ही स्वामिक दै दो-क पदते समय, स्वामाविकता षा इतना मादिर्भाव दहो उल्ता दहै दि कमि यतक विम्पृ्िहो जानीष विः पट्‌ बल्पित कपापदृ रटे है (षरष््रती, मदूवर, १६०४८, ¶० ३६८] एण नाटक मे अणमेल ष्या रो समस्या उटापी टै। भणण पप्र शीबृराई वताम पपाजनेउणमू दिमृखवरणोहोध्यरो ररेष्ण्टै) अर लगभग था ष्टौ सपस्या दाप कमाई" नटः (द्रदातनदाट सवत्‌ १६६६) मे उटायी टै भरतियाजो षण रौ भूमिषापमे निचयो “ह्ण माहे त्रिप बी श्वनव्रताकी हद, दी षा प्रिषाम, बृटापा माटेव्याव्रकोट्ल्ठा, बौको घविचार, ममाद, दीषो दधतलौर यो वपने गो परिणाम, प्वादि सष्डमारद्राीोतोमाटे दरगार छि अगा-जरगा नीति, उपदेश, योध, सिषा, धम आर त्वार को द्यो जट ताद उस्नेष कीनो सारद्रारी समाज को स्पित्रि, परक भौर ड्रम घाता), विवार की मप्तता, एषायने भोर प्परी-पृष्यङशा दरनाद्र वर दृढ विचार बरड्श्पामन् धरणो जमायोषठिदे जणे मार्रो-कोद्णी षडे दृते रारो बान दि" "कारषा-अजाद्ट' (रचना सदन १६६४) भरविदाडोरोरोसगोरन्ट्है। ठगो णमे मा्राहीकमाजनं परवा (रट्‌) भोरह्मस्रागपदृम्रादुर्णाम्‌ हूतो णाः पे {कक बकन दष्टा देम मनुर्न जणो गह न्ट} स्पुरत्‌ कर्पा विता दो भाधूरोमासम हाद महा1 म्द भननदच्नर अनर भ. अटी हदय रीदे, शिथि बे शास्त पद> शष्ट! उन्द्‌, रर विणि षान दैप स्नेध्पृगे हदे दोतादेम मो पर्दर बो टूटदगरदद-नथष

६|

शृ ऊपर पूष्योषटी दुनिया मदि वय अधरौ युदा मदर्‌ मोना साती रषः द्रण फो भभिमान भष सरदारंमे नही कई?" भौर भरतियाजौ राजश्यानी रमाज धपेरी युम्‌ यारं साद्रण माह फएमर फी भौरभाप दी पतम री जागती जोन शं उण रौ मायं प्रशस्त करण रो प्रयाप्र करप, धरषटट प्रपाण करपो (३) भरतियाजी रौ तिटयोी पुस्तक री स्या राजस्यानी मे £, ह्िदी मँ १७, मरी मे रे भौर सस्छतमे १६1 तंर १६६३ मे प्रफारिव वुढापा की सगाई मादक रं चेत पृष्ठ रं विसापन मे उणा री रवित (तिया सो पिव्ररण द्रण प्रकार ै-- “तिदधदुचद्विका (संसृत, मराढी), गौता्थं-पदपायेद्धी (मराठी), केशर-बिलास (माखराडी)-- दुगरी वार छव रही छे, कनकसुदर (मारब्राड), प्रभ्रास-ुयुमात्रती गुच्छ १० (हिदी), वुढापा की सगाई नाटक (मारत्राडी), मोत्यां की कटी (भारतादौ), गुव॑ष्टक (सस्त), राज्पारोदरण-प्रणस्ति (सस्छृत) णोफ़कानन (हिरी) 1 लिलकर लंयार--फाटका-जजाढ नाटक (मारत्राडी), मतिवितास नाटक (मराद), यनुताप तीयं शतक (मराठी), मार्या लहदै (मराठी), विजान प्रुत (हिंदी) ? तेयार हो रही घ--मव क्या करना चारिए्‌ ? हिदी, मराठी, गुजरातो, वगाली ओर मारत्राड़ी; वोधदपंण (मारत्राडो) भरतिषाजी री अखरी दछप्योडी पोथी 'सुयंचक्रवैध' मिले है निकी उणा द्वारा आयौजित 'विचार-दशंन' नात्र रं मेक विशाल ग्रयरौ मेक अध उण रो विषय योगविदा ओर वेदात सू सवधितहै। पस्तक-लेखन कायं रे अतिरिक्तं उणा हिदी पत्र धवप्योपकारक' रे सपादन मे भी घणो सहयोग दिथो सामयिक समस्यात्रा पर उणा रा जिका विचार हा मोकढी कहाण्या ओर निवधा रूपमे उण में नियमितसूपमू प्रकाशित हा हा। भेरतियाजी री राजस्थानी रतचेनावा मे कनक-सुदर' नात्र री कृति राजस्यानी भाषा रो पलो उपन्यास है ओर भरतियाजी री प्रतितिधि राजस्थानी रचनामानीजा सकंहै!उणरोपैलो माग दही छप सव्यो, दरूसरो भाग प्रकाश में नही आयो! मो उपभ्यारा उण दम प्रकाशित हयो जद हदो मे चद्रकांता-सरतति, भरतनाय जिस तिलस्मी मौर जासूसी उप्मासा रो वोलवासो हो कनक-सुदर सामाजिक उषन्यात् है दण मे घण टम मारवाड़ ्षमाज रौ कयां निण सरस ढय सु प्रस्तुत करी है उथनं देखन लोप घणा अभात्रित हया कनक ओर सुंदर इण उपन्यास रा चायक-नाविका है जिका रो प्रारभिक जीवण हौ पैल मागमे भा पायो है! उपन्यास रो प्रारभ दण भति ह्रे --“दो पहर को वपत चारघा कानी त्र चाल रही ये। हषा काजोरसू बद्ध मरी-की-उदीने उडउडकर चीका नषा-नन्रा दीवा हो रथा यौर भीजण भौ रदा चालो मुस्कलघे। सु कषहा मदि बड्कर खारा सयीर्‌ चै 1 भहुस्योकर क्वामने चालणो मुः शे छे के जमो कपर पय देणो सिर्न कर री चे इती बोर पट

वंदनमाल -रामसिह-

(१) मेम रो दृष्टिकोण

म्हारो हृदय थार आग सोलन रापतां इर ह-कठेई पे आनीकंवेठोकं षण तोरम करदैई्देवपूकोह्‌।

म्टारं माद्रे मे मुरमग षयो ह्रे इण रो कारण धारौ मासियां री कोर सू बसो!

हि चाने म्दासे बाव्य नही सुणाऊ ह; मनं लानं हैकं कटे ये प्रशसा पुढ्र बाघणनौ ताग जाप्रो 1

ये मनै प्तसारभरमे सण्ढासू सुदर समक्षो दण खातर थारं मागे मूढो लुकाय लेऊंहै पणष्णनै ये कदास लज्जा रो परिणाम नी सम्ञलेघ्नो ष्ण वास्तं यार मये निष्क यन भा 1

निशौय सी निस्तन्धतामे जदये बेकाठमेम्हारंसू मिलणने भद्रो तोग्हारी

दष्टा माग जाब्रणरो ष्ट्रं ।येहसनैकंत्रो--आष्टो, जव्रो। जणं म्हारे मूदैषू मीवधे-नां ! कफोजाऊनी

जेह्‌ मामूखण सजायनं माङतोये बृषो-अआज भं मआभूखण इत्ता पूत्राब्रणा ष्योखातेदटै?

भौरजेह सादा यस्नामेभाञ्घोयेकधो-ओदो ! बजि भो नि्टक षट्रमा धरती माधंषटेसू उगषायो। फेरथेीदताब्रो, चारे कने श्रिया याड? 1 सौ (२) त्रेमरोध्यदहार जदि जाचवानकोदेद्रणने जञ तो वं भी उणां रीपगनमे्ारनं।

नै सीने वौनक्रीषातार का ठोकाकेष्यूं मेक का हृदय ऊपर मैक का हृदय कौ आघात करे। प्रेम को भत्रःप्रेमकफो भद्रक ओौरप्रेमकीभाव्रना दणा महिसू मेकफोभीलौपहौजत्े तो फिर दनो रदे नही ~ ॥”

भरत्तियाजी री सराहित्य-व्रा री मरय प्रेरणा समाज-सुधार भौर देण रो उत्थान है विदेशी शोपण कानी भी उणां यो ध्यान हो--“भगरेज लोमा कानी तो जरा नजर करो, अठेसू मादी के नाई पात्रा सूं रपया सौचकर आपका देस मेते जाकर दपुर वणा दीनो छि आपणा देशने भिखारी कर दीनो दे।''

समाज-सेवा री भरतियाजी री किन्त हंस ही, कनक सुदर' रौ प्रुभिका रं षण उद्धरणसू भाभाद्धी तरं जाणी जा सकं है--

हाय पसो ! हाय पसो !* करवा म्हारा खारा सरदार नै राजा-भहाराजा भर श्रीमंत वणाकर, हका चन-चिद्र फा वेषारसू छडाकर लरा-खरा वैश्य वणा दपु, उण की सारी कुरौतां मेद दध्‌., उणका घर को सुधार कर दध्‌, उणकी पिञूल-खरची भिदा दषः, उणकी राहुरीत सुधार दच्‌ः, उणका बाठविब्राह रोक दध्‌, उण का वेज व्यार नही होवा दधु, मोटधारां ने विदघा ्िखाकर स्वरया मे णाणी कर दध्‌, भौर वेष्या भी नही बोल सके उशा फीटा बोलां का गीत गात्रणा घडा दपु. 1“

स्वी-शिक्षा रा व॑ म॑स हिमायती हा। नारी री हीण मन्रस्था देख-देणन उणां रो काछनौ कटीज्या करतो ! नारी नँ उण री महानता मौर उण री भिम्मद्नारी जतात्रण रो उणा जवरदस्त प्रपास करथो हो उणा कनेक-सुदर' री मुभिका भे इण चावत आप रा विचार प्रकट करचाहै।

भाषारं सवधम मौ उणा रा विचार स्यष्ट ने महत्तरं हा कोई भी राद जद ही सबल हूय सकं हैजद उण रौ भाषा वेक द्रे कनक-सुदर मे उणा लिस्यो है- #

नहरमेक देश री सवर्र येक भाषा होणी अत्यते मवश्यङ्‌ चे प्रर, मरेरिका, विगेरा माहे मेक भाषा होणे सूं उथ लों की दद मेकता होकर वे जज सास दुनियां मादे घेष्ठ हो रधा चे यापणा हिंदुस्तान की मेक मापा होती तो मार भाषणा देश

की दशी बन्रनति होनौ नदौ ।“

अपणं राष्ट रं दण मात रं पषंन्य विचारक भीर समाजमेच्री 1 राजस्यान भारती सपू पूत रो से्रत्रा रे ग्रति छदी-ण्टी मार्‌ तौजददही मान्यो जाग्रता दकः उपरी नै उण > समं रादूजाप्रप्रा्ी राजस्यानी, साटित्यदारां री सारी रवना्रौ गदिलैव याद्ध-सू-माद्े स्प मे धरगरागितं कराय उर्णा प्रचारकर्यता।

राजस्यानौ रं दण समं सेवरह री यमर स्मृवि नं पुन.पुनः प्रणाम

चंदनमाल --रमसिह-

(१) मेम रो हष्टिकोण महारो हृदय धारं मानं खोलनै रादता दरू हृ-कठद ये भानीकंवेरोकं णन तोर षद्देखसूकोहु। म्हारं गाप्रणे मे सुरभग बयो हूत इण रो कारण धांरी आलिया रौ कोर सूं परत्नो

हं याने म्दासे वाच्य नहीं मुणाऊह ; मनं दरलानेरहैकंकटे् ये प्रणसारा पृद्ट दाघण नी साय जापो

ये भरन समारभरमे षग मू सुदर समघ्ो दण खातर हू चारं मागं मुदो सुका तऊ पण णन ये ष्दास लज्जा रो परिणाम नीं तमगतेष्रो षण षास्तं दं पारं धा निक ट्म भाऊ

निषणौय री निरस्तम्धतामे जदये भेवांतमेम्हारंसू मिलने थाद्रो तोम्हारी ष्ठा भाग जष्रणरी ट्र ।पेष्टणनैकेत्रो-आ्टो, जप्रो। मं ब्टारं मूरैमू मीमद्धै-ना! ट्श जाऊमी।

जेष भाभूण ताय भाङतो पृ्ो-अजमभं थाभूतण हणा मूब्राद्रगा बयोलापै टै?

भौरजदू रादा वस्ताम षाड तोयव्ो-धोटो बाजलो निष्कटश्षदमा धरती मापे दैष्‌ उपभादो।

फेरय्ी वतष्रो, थारे कनं विदां बाड) (र) द्रिपरोष्टबहार

जदह जारा मे का टेव्रनने गाङ ले दं भने खशा सोरग्नयेजाैनं।

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गै सौभे यीज्छीकफातार फा टोका के ण्पूं भेष फा हदय ऊपर बेए़का हदय को आपात करे। प्रेम को भद्र, प्ेषो भाग्रक आर प्रेम फी गाव्रना दा मादे यू भेकफोभीतौषषएौजप्ते पो पिरि दनो रहै नहीं 1“

मरतियानी री रारिव्व-तेव्रा री मुम्य प्रया रभाजननुपार भौर देश रो उत्थान £ 1 पिदेशौ णोप कनी भी उणां यो ध्यान टौ-“अगरेन सोगा कानी तौ जरा नजर फरो, षटेषूमादी बाई पाडा पू एवया पी पकर भापकादेत नेते जार ष्द्रषुरी वणा दोनोधे 1 भाषणा देशने भिपारी कर दीनौ चे।''

रमाज-रेतरा री भरतियाजौ री गित्ती हष ही, कनक सुदर' री प्ुमिका उद्धरण यूंमाभाष्धी तरं जाणी जा सकं है--

हाय पभो! हाय पतौ }' फरवाद्रा म्हारा सारा पर्दारा मे राजा-महाराजा भर धीमत वणाकर, हवटक्न घटर-यिद्र का वेपार रूं षछटुटाफर सरा-पय वैश्य वणा दष, उण की गारी पुरीत मेट दधु, उणका घर को गुपार कर दषुः, उथकी फिनूल-खरवी भिटा दश, उणक्तौ राद्चेत मुपार दध्‌, उण वाढ्विग्राह्‌ रोक दधः, शा वेगोद्‌ व्यार नही होवा दपु, मोटधारां ने विदपा तिसाकर स्सियां ने शाणी कर दपू. भीर वेष्या भी नही बोल सके उशां फीटा गोला का गीत गाद्रणा ढा दध्‌ 1"

स्यी.-थिक्षा रा वै मंरारहिमायती हा! नारो रौ हीण भ्रस्या देलदेखने उणा रो का्टजो कटीज्या करतो नारी नँ उण री महानता भौर उण रो भिम्मेत्रारी जतात्रण रो उणा जवरदस्त प्रयास करो हो उणा कनक-सुदर' री श्चुमिका मे ईइण वावत आपि रा तिचार प्रकटकरधाटै)

भापा स्वधमं भी उणा सा विचार स्पष्ट नं महत्ते हा कोद भी रष जद ही सव हम सकं है जद उण रो भाषा भेक हते कनकनतुदर' मे उणा लिख्यो है-- #

शहुर-मेक देण रो सतत्र भेक भाषा दोणी अत्यत मावश्यक छे प्रर, भमररिका, विगेय माहे मेक भाषा होणे सू उण सोया की मेकता होकर ये आज परारी दुनिया माहे ष्ठ हौ रथा चै यापणा हदुस्तान कौ अक भाषा होती तौ भाज भपणा देश

की दशी भत्रनति होती नही ॥" सपण राष्ट्र रे भात रं पूरघेनय विचारक भौर समाजदेश्री भौर राभस्थान-

भरती सपूत पूत सै सेब्रात्रा रं प्रति सदी-सही भाभार्‌ तौजददही मान्यो जात्र॑ला जद उण रीन खण रँ समे रा दूजा श्रव्रासी राजस्थानी साहित्यकार री सारी रचनाम्रां नै भविस भाच॑-वू-माध रूप मे भरदायित करायनं उणा रो प्रकारका

राजस्थानी इण समर्थं सेद्रक री भमर स्यति नै पुनःपुन. प्रणाम 1

1 ९१ (४) दरिद्िरोदान

जेजाब्रणोहीष्टोतोभावाषयोहा? जद-कदेद्ये आद्रो तो विदा मांगतादहौ अत्रो)

याचक! ओतो धारी दान-परीस्ता री घणी प्रशंसा सुण रापी दौ, फेर मा उडद रीतबयो?

जेजाप्रणोहीहोतोञायाग्योहा?

म्हारो मौरयारो कोर पेना रो संवधहै कार? मौरजेनही, तो वसम्दार॑दौ कनं मागणर्मै क्यो आन्नोहो?

हदि, दखिदरिसूं भी दर्दर, हभौरयेहोम्हास र्ग लो, देखो इण वार धानं दौ त्पागनै त्याग रो यादं देखाऊ ह्‌

जेजद्रणोदहौदहोसोघापाष्पोहार

१० | वहाय आनं करं भौर उणां रे कानीदेषू मीनहीहूं।

सगा जणा दान लेयने जत्रे परा जद हूं उणा नँ कं ह--ये माप देसकोह उणने मागणने भ्रोहो। हं चानं जुं हू

वै चोला-चोला उपहार लेयनं आत्रे मौर म्हारे भ्म हाय जोडियां ऊमा र्हं ग्येगपूणं हसी हसने कंऊ--हू भापदे सक्‌ हूं उण नै ये मनैदेव्रण नै आषो हौ यानै जाण्‌ं ह|

दकरोड़ रात भे सू भीजियोडे धिरीष रै पलां रौ सुग यन समीर हारं घर आात्रतोहो म्हारी मां लागमी भौर मै सपन मे उणा नकंत्रता सुणिया--काद तू मनैप्यारकरंदहै?

ये दसो प्रश्न पृदयो हौ जिण रो उत्तरे हौ जाणो हो-्मै शरुकायने उनो दियो

फेर भी पार देवण-तद्रण मे योर मेव्रणसुणण मे मेक पूवं भानंद दै--यां कंथ नेवैम्हारो नीद रं सामै-सागे कुण जाणे कटठीने रम जात्रै

(३) तं लर थारी वेना

तू चिणा चूर जद थारी घोटी-छोटो वैनां नीव री नाच्ही-नान्दौ डाटा मां चैटी.वंटी गीत ग्नं उणा ये गीत वंद हसी जद ही धारो काम समाप्त हषी भौरतू उणा रं सागै-सानं गवां रं कज कानी उड जासी

वेलाम दायोढी पारी धषद़ी रे हार माथे गाय दीक है मौर घारी वाची उप्र सटकततं पूल जीम सू. पकड्णो चात्र !

घान मायं पडती यक गूरन रौ यादे स्प्रणे-ररिमया यार केषा मोर पोना मां, मौर्यारी वैनां रेकठं मोर पायां मापे, पदे 1

राते ्रषति या गमा रौ मात्मा विध्राम कर्‌ मौदवा द्र दर्मा रा सपना भर। साकास यारं सिमार नै, योर तिणि पादी निमीलित सानिका भूमण नै

धात्र 1 तारा चारं अद्रिर पुपरादा बेम मे लालमीवशो रम

दी पारे दिमागमे

यारो रोया नम्ये करे, जदत्‌ मरी [न> वि अदनं थार दोमन क्तेता ९9 नारे मायं ष््रउया नारा, ` ~ मलेन मर। #।

[११ (४) दछ्िरोदन

वेबा्रमोदहौहोतोबावाक्योदा? जदनरैद्ये बघ्नोतोविदार्मागताही प्रो हो।

माचङ्क1 तो धारौ दान-ग्रोरतारीघणीप्र्ेना नृण रामी दही, देर बा ण्ट्टी रीत द्यो?

जेजप्रणोदौषोतोनाया्योषहा?

ग्टाये ओौरयारोकोरपेतारो सवपा? योरजेनही, तो वबष्दारहो कमं मागन कपो मब्रोहो?

हैट, दद्दिसू मी दष, हंमोरयेहोम्हारा प्रस सो, देषो ! एण वार पानं टी त्वागतं त्याग रो यादं देसाम हं 1

बेषाद्रणोहीदोतोषायाष्यो हा?

मौत : नयो जीवण

-नरोक्तमदाग र्वामी-

पाद भा॑पत्र पण दूज दिन मै ऊगिषात्रं

याद वरस जत्र पण भकं भरी पृषती नै हरो-मरी वणाप्रण नँ भा पूवं

ड्ध रापूढ युःमद्टायीज नात्र प्रणवा भढ पूला सू सदी जत्र!

दियो दिनूगै बु जात्र

पण रात हृतां ही भं प्रकाश देत्रेण लानं 1 मौत जोत्रण रो मेत नही,

वा हीजतो जीद्रण नं नयो जीश्रण देते

--~-----~----

भरीजण नै वरं है मेव पूलल कुमान विगसण नै जगायीजण नँ दीपक बुद्ौ आंयत्रे चांदोऊगणने मौत नहि जीत्रण रो यच्पषन करवाही नत्र-जीवण दनि

१२

मीठा सपना, खारा गीत

-उदयवीर शर्मा--

(१)

यदकै द्ग्यारद्वो कक्षा पर्वं मे नूर रली रा निबंध आया पांच शीप॑का मायसू भेक मार्थं निवध लिखणो हो मेक णीपंक हो “मीठा सपना, वारा भीत)" लेकः विदपार्था च्या निका तै छोटने दण नँ दी भोत्त ल्ििपो--

(२)

भटा सपनारविनाजीद्रणदूलोहै। स्प वारं सू हरियान्यो लागत यकाौभी मायम्‌ धोयोहु ज्या जिया ही मीटा गपनाौ दिना भिनव बारे सू सजीप्रतो सागता दक्ाभीभौतरमू भिद्धिणेदो रंघरे। मीटा सपना री रस-गगामे मिनपन्हाद्रतो रत्र णादो सुरण चरा मायै उतेसियोषटो लगे, नदी तो नरकोही टी रमो ।मीटा एपना देवणा जीव्रण रो आनद है,सारदै घर धाशाद्रादी मारण टै पण मोटा पपन भेजे दिपक पट ण्याप्रतोजोद्रणबोपोहै। धृष्टे विरिरमा ज्यप्रे हो मगोहौ जातो शद्रे जियाही जीव्रणमेखारा गीत गापीजण घाप ग्यां त्तो उपारो गपो। मीठा पना जिदगी हितो खारा रीत मोन टै। पणप्रषगमे भेक क्या याद घायगी निकी धट वाचो--

भेष शेल्ित्ीप्ते। आप्र गाद्रर पारगश्मदल्ो। दानडा-बन्तरा पष्प रोप्यापारीघापरं बधि माध पीप विदा उशन मिलितो) स्वापी पृ दे-व्सदातंपहतेस्योप्ते! बेर मङ्ूरिदं ्रादमी नं टःनोङग्गे देल ध्यारास दनय भाया जत्‌ म्हारे दरे चैने मागन गदन्निबयलोञेहभनगा पर्मामङ्रीरादू 1 तेसरिष्तोसुणनाहाताभष्स्यी 1 पते स्दरनीरे शम्‌ उन शितरस्ती रं सिर मां मारम्दो दोन्‌ जान्रा भाद्रं

११

१४ |

भेतमिल्ती कोषय पाणियो ~य मन मक गुर सरना पृण मा देतो यो गुरिया ज्यास 1 योदा देती योदा वेष बो पमा मासी पूर््ना जोढ़न पद विणारूं येटफ, पौवारा, वोप, घौपरा सं देती हसी फेर याप रो स्यात्न फरमूं टावर हती देर मदधुरी करयो धोर देवं मे वैढो-्वंडो हौको टरङ़ासू दादरियां रौ मा म्हारं सातर तीब्रण तीष.वत्तीत मापी म्हारलो छोरो रूष्टिपो मनं जीमण नं बुलाद्रण यासी 1 होकं री मौजमेधूमतोहं ती जामू वौ फेर" यायी फँ ेमू--त्‌ चाल, हं मारं हूं चो देर दलीप छोर रीमा भाष बुलाद्रण धारी जगां हं योषटो-सी दिवाब्रदी रीष करन नाड री टको करतो करसू-अबार फोनी बाज, होकं मे पान भा रयोः; तू वातह भाकंहं।

शेषचिल्ती रो सदटको करणो हो के धीरो घो घट धरती पर यायो मौर पुटो) घौ धरती भां फौलग्यो

व्यापारी देखतो-रो-देलतो र्यो योढो सा्रचेत ह्यन शरिगो--मरे ! कई करयो ? घटी फोड दियो घौ रा परमा कुण देसी ? ेखवित्ली बोनिो--- ारं रार लाय स्यौ है म्दारो तौ निठ वभियोः धर दहीजग्यो वं महारो धर कुण बांधसी ? दौनू ओक-दूसरं सू लड़ता-कगडता आप-अाप रं मारग लाया

श्याल पेलचित्सी रा मीठा सपना लारा गीत मे बद श्या मीठा सपं देती उण रो मनडो कठं भीर-ही जागा प्रुमतौ हो मां पर रालियोदं बोक् चेज्णन भानहीकोहोनी) नाड कद हाली, कदके टयो, उण नं काई ठा? मीम सपनो रौ वाडीर्भेवोतो ष्ठ तोडंहो भर खत्हो) दात ही भारत री आजादी रं पैली लोग राम-राज सा सपना लयन मोद मनाया करता परण वं सं हरा हुमा

८३)

द्य मसग मे ओक कथा गौर लिखनं विपय की गभीरता सू सुलात्ा करणो चाज हं ब्‌

वेक गाव्रमे दो भा रेता हा वदोद्यो व्यायोरे हो, चयोटकरियो कत्रारो 1 वेडोहैरंगततेद्धोयष्ट पणसंकश्रारा भाईंभो मयस कारणम्‌ व्रारो संयग्यो।

चाणचकी वद्यो माई कै अनाय वणायने वालतो रं 2 नि रयो ! अवं घरमे रधग्यो दोयं रो कद्रारो काको, मा, यर वं सातू माईं। घो

देकः दिनद्योयरोमा वोवी-वेटं!पे तो यवं वावा

टाव नै “वडा द्वग्या, चद्ररी को चड्सको नी पल द्दोष्धियं मानं बरणप्य सो को चरम नूरहरोषणी या घा, रदी चान जपं; श्ाष् दिनारी 7 चाने मी रोध्यं रो मारय हु जाद, मीष्टमू बोत-दतृटा'र स्र क्ट गदर; वट्‌ भायीहो टर्म प्रादे चीज

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मारं परणीजमं माणं रे वाद याज नलङ यद्य पर रीदे नै तोच को भायीनी ; म्री मनम्धाहै कै टोट नै स्यावो; ययाच हूमो , मगद्धा मजन-गनेटी मद्-मिवापी, पादाय घरे मामी; संगद्रगान ह्मी , धररी दट-हट शुनि मनामी, हे मी स्वात्र कमोध-कसेव्ा नं दे-वेयन भन रो कादमू ; भवार तातं रो ले-लेयनं ही पाक्त रैयाहा, षदे मो यप्राप्रणो भो नायोज , दण वासन स्टोदिषे रो स्यति षरदो; ठेतमें वद्रदी-मनीर, पिष्टक हूतं पण करुण साते > पदिपा ही र, वैचणा परै, टावर्हप्रेतोपायतेप्रे ; यहूतोडोनतीषही चोखी लागे,ये तो म्टारो कमो मानोबर पारं स्दो्ियै माई नै तपैटदो

पैनौतोते भायां दण वात रो विरोष षरिपो पणमा रौ जिद भी मानणी पडं। छोरी दून स्याद्र र्व दियो काको हण यात मू रूगग्पो कं मनं पृद्धियो षो कोनौ पणो मनायो पण काको मानियो नदौ बरमा जिद कर लीकंव्यात्न सू पैमोमने परमेपानीदो। मावरव्यात्र भोकरणोदहीहो। पाती भी करणी पडी। घररा दौ दका दूयप्या 1 काको न्पारो दयम्यो व्यार मे वरात कोनी गयो 1 च्या हुयम्यो धे पर्‌ सापशी।

षह नूद्रोस्णीरीही\ आता ही धर मे चानणो हय्यो ; चहल^पहल-सी पणी भाती-नातौ तै पायल छम-छम वाज लागी सातृू माया नँ घणी खुसौ हयी जेट वहू रालाद सडाग्रण घोखी-चोखी चीजा लानं लाया उण री मुत-सुत्निधा शोसैष्यान राणता1मारमोदरोतोव्किणोही कनी रयो, नित उठ भंगढ- वारणा सेष्रतो वास-्ठीराभो ष्ण वातमू धणा राजी हया सुणता जिका ही श्ण वात मै बा्टौ अर टैम-सारू वतात्रता नूई चीज सं तै चोती लागे।

धीरं धीरं भग्न दटिवा सातू माई लड मरिया बौलपो वद कर दिपो चात के? मेक वव्रे व्याद्रवेसिपो दूगो कंबे--म्दारी दिम्मतविना ध्यत्र दृत ही षन सातारा सात मता। माता रो सात पारटिय वणगी गात्र रा लोग भी कानी-कानौ सातारा सीरी हृवभ्या राड वधगी षण व्रई? भा वैटी-वंढीते वाताँ देषै धर सो्च॑ष्तंजेवहनहीलश्रतीतोष्ोठीकही। श्रयो तो तानी न्पात हता, क्यौ सातू भाई आपसपरी मे स्वा, क्यो न्यारा हृता, कों सात रो सात फरटिया वणती, बयो गाद्र मे भाता घसता ? पण धं पष्टताया कई ह्रं? मवै त्तो महा सपना ष्टग्या 1 घर पे रा गी पायीजण लाग्या युद मा दरी दिन्हिनि पिताद्रे

ह्णक्णीरे लवणं रोषार भीभोटही टै कं मोटारपनासाराभीतामे ददा देषो सला्रंनी।

भज नभारतनमारोहतनीभोहौज है जार्व बायारीनं पमड केरी टुकढा ह्या कदा दरदास्‌ बाप्ाहो चर्दरपे पार्ट शरो दैर दवग्या। प्रावधान

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भवं शेपयिल्वी शोण सामियो-- भेक आनं रौ भेकः मुरगी घरीदनं ४. # ईडा देसी ढी मुरवियां ज्यास 1 वोद्या टा देसी योद्धा देचू बीरा आसी परमा जोढनं चर विणारूं वंटफ, घौवारा, चौक, चोधरा हसो फेर भाप सो व्याग करतू टावर दमी पैर हं मजरी करणो दयोड मरे वैडो-वंडो ह्येको टर्ढामू दाबरिया री भर म्हारं खातर तीत्रण सीस-व्तीष वण महारो छोरो रूडियो मनं जीमण नँ बुलात्रेण यसी हकं री मौज मेधो नट जापू वो केर यासी फरक देषू-तू चाल, हं मठं हे योद देर चोररी मा भाप बुलाद्रण मासी जणां योद्री-सी दिसाप्रटी दीक ना लटको करतो कंमू-अवार कोनी बाञ, हकत मे पान भा रयो है; तू चाल, हं माठ |

शेखचिल्सी रो लदटको करणो हो के धी रो धटो लट धरती पर भयो भौर पू धी धरती माधे फलग्यो

व्यापारी देसतो-से-देतो रम्यो योड़ो सात्रचेत्त यनं प्दियो--मरे फाई करथो ? घडो फोड़ दियो घी रा परमा कुण देी ? णेलचित्लौ थारे पर्डसारोलागरेयीहै) म्दायो तौ निठ वभियौ घर ठहीजग्यो भर्व म्हार कुण वांधसी ? दोनू भेकदरूसरं सू लड़ता-सगडता आप-माप रं मारण लागा 1

याल शेलचिल्ती रा भीढा सपना खारा गीता मे बद्ध ग्या | मढा सपना उण रो मनडो कठं मौर-ही जागा घूमत्तो हो मां पर रावियोडं बो रो उण मानदहीकोहौ मी + नाड कद हाली, कद के हयो, उण काई ठा ? मीरा सपना, वष्ठीमेयोतो तोदो थरलात्रंहो। याल ही भारत री भानादी रप सौग राम-राज रा सपना लेयनं मोद मनाया करता पण वतं हव्रा ह्या

(८३)

प्रसगमे ओक षया अर लिसन विपय की गभीरं सासा फर चाज हं--

सेकः मात्रमे दो भारईरंव्ताह्टा। वटोष्टे स्यायोडो हो. घछोटकियो कत्रा वगो रेसातद्टोाहा। पणते क्रा ) माई भी मत्वं कर्य मू कव्रासो रंपम्य चायो वाटर माई नै बनाय यणायने कालको रेयो भरव परमे रदपग्योष्टी दोक्धारो दारो, माः, भरव सातु माई।

यड दिनद्ोसंरीमायोकी-व्या सो सवं वटा-वदा पण्या, चदररी वईगशोनीपस्टो्विं भाने परथायलो तो चरर्मेनूईरोरणी भा ज्रं, फी: खाप प्रं; पितर दिनारी हि वान मी रोटिपा गो माराम 4

जनि, ब्द ती वमू बोप-वतटानरमप्रढटश्ट यव; वट्‌ भाषोवोचरर मोदेन

साग पीत भर्ग

योगानदजी

--प्रजनाययण पुरोहित--

(१)

कषे मे भगबो भलफी पेरियोदरा मेक महाराज साया करता हा 1 रष भूतकौ, भूष गोट, नाक सावो, चेतो चमकनो, मंखिया बमकदार मौर शरैर मथियोो \ भमत्र री मर्भे ठै रोग व्यार-पाच भील रो पो करता 1 केदो सादण रो शौ

एव वास्तं पणी वार्‌