सब्चालकीय बदतच्य

कविया करणीदानजी कृत सूरजप्रकासके प्रथम भागका प्रकाशन राजस्थान पुरातन ग्रस्थमालार्मे गत वर्ष हो चुका है ग्रव इस ग्रन्थका द्वितीय भाग भी उक्त ग्रस्थमालाके ग्रस्थाई ४छ्कः रूपमें उत्सुक पाठकोंको प्रस्तुत किया जा रहा

इस भागमें जोघपुरक्के महाराजा गजसिद्ठ, जसबन्तनिद्र, अजीतसिह और शभ्रभयर्सिहके शासनकालका वर्णन हे. मिससे अमेक नवीन ऐतिहासिक तथ्योंका सद्झेत मिलता है। इसी भागमें महा- राजा अभयसिह और सरवुलंदखाँके बीच हुए प्रहममदाबाद-युद्ध गे कारण भी बताए गए हैं। चारणबालोत्पन्न महाकलि करणीदानजी। कविया महाराजा अभयसिहके प्रमुख दरबारी कंबत्रि थे, अतएब प्रस्तुत ग्रन्थमें वणित तथ्य अधिकांशमें विश्वसनीय वक़े जा सकते हैं करणीदानजी अपने युगके विश्येप प्रतिभासम्पन्न, अनुभवी और विद्वान कवि थे, जिनका परिचय पाठकोंकों प्रस्तुत काव्यसे स्वतः ही प्राप्स हो जायगा

सूरजप्रकासका सम्पादन, वृहत्‌ राजस्थानी दशाब्द-कोशके कर्ता राजस्थानके विशिष्ट विद्वान्‌ श्री सीतारामजी लाछसमे नि प्रणालीके अनुसार परिश्रमपूर्वक किया हैं, तदर्श बे धन्यवाद पात्र हैं

महाराजा अभयसिंह और सरवुलंद्खाके बीच हुए अ्रहमदावाद- युद्धका श्ोजस्वी वर्णन और ग्रन्थ-सम्बन्धी विशेष ज्ञातव्य आदि विस्तृत रूपमें यथाशकक्‍य श्षीघ्र ही ग्रन्थके तृतीय भागमें प्रकाशित किये जावेंगे

राजस्थानी भाषाके प्रस्तुत ग्रन्ण्का प्रकाशन भारत सरकारके वैज्ञानिक और सरस्क्ृतिक मन्त्रालयके आथिक सहयोगसे आधुनिक भारतीय भाषा-विकास-योजनाके भअस्तर्गत किया जा रहा है, तदर्थ हम भारत सरकार के प्रति आभारी हैं

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ता० १४-३-६२ मुन्ति जिनचिजय सर्वोद्िय साधना श्राश्वस, सम्मान्य सञ्चांलक _ चन्दे रिया, जित्तौंड, मेवाड़ राजस्थान प्राच्य-विद्या-प्रतिष्ठान

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- भूमिका--प्रस्थ-सार

_ श्रथ-महाराजा गजसिघरो वंणण ...॥# / महाराजा जीगजसिहजीरो दांन-वरणण

राव भ्रमरसिंघजी रौ वरंणण “: महाराजा जसवंर्तासघरी वरणण

उजेगी-जध-वरणण

. महाराजा सत्रीजसवंर्तासघजी रो दानि-वरणण

3 म् महाराजा अंजी्तेसिघजी रो जनंस _ दिली जध-वररणारा 2285 हा .सहाराजकुसार महाराजा ल्लौश्नभेसिघजी री जनमपत्नी . महाराजकुसाररा सामुद्रिक चिह्लांरी वरणण महाराजा भ्रजीतसिघरे स्वायतरो वरणण

सवाई राजा जयसिहसूं बादसाहरी श्रांबेर छीनणी श्रर महाराजा ' ्रजीर्तासहरी सदंद करणी

' भहारांणा श्रमर्रासह दुतीयस्‌ दोनां राजाश्रांरो सिछरा सारू . -उदपुर जाणो

: 'सहाराजारों जोधपुर पर श्रमल करणो

: विषय - सूची

| लन-कऑ---+ चोथो प्रकरण 82०

पांचमों प्रकररा

छूठो प्रकरण

हाराजा अ्जीतसिंहरी सवाई 'राजा जर्यासहरी मदद करणी

» ' महाराजा श्रजी्तासहरी सांभरपुररे वास्ते तेयारी करणी, जोधारांरौ चरणण .. : ११. बादसाह बहादुरसाहरों महाराजा श्रजीतसहसं कुपित होणी भ्र€ . ».. » :महाराजरो दिलीरी संलतनतमें उथल-पुथल-करणो १२: सहाराजा अ्रजीतं॑सिहरी दूजा राजाबांरे साथ जोधपुर श्रायमन १३: “' छोडावरप सारू दछ बढ सहित भेजरसों ' 'भहाराजां अजोर्तासहजी रो महाराजकुमार श्रभर्यासहजीनूं मुदफरंस्‌ » मुकाबली करण सारूं तैयार कर सांसो भेजणौ 38] 3६.

वादसाहरों मुदफरखांचन महाराज! श्रजीततसिह पर अ्रजसेर

'महाराजकुमारनं जोसमें करणो

महाराजकुंमार श्रभर्यास॒हजी री तेयारीरो वरणर सुदफरखांत रो भांग जाणों

महा राजकुमाररो सेरप्ें झाग लगाणो तथा माल लठ॒णों

बादसाहरों भयभीत होणोौ साहज्यांपुर. लूटणी.

महाराजा प्जोरतासहजीसूं महाराजकुमार श्रभ्यासहजी रो मिछणो

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दिलीमें महाराजा क्रभयमिहर राजतिलकरी घरणप महाराजा प्रगपत्िहरी जोधपुर दिस घागमन महाराजा अमयपिहुजीरे स्वागतरी घरणण महाराजा ध्रभयसिहर सलवाजमारों चरणण लवाजमारा हाविपारों वरणण लवाजमारा घोड़ाँरों घरणप्र ऊटठांरी बरणण बाघांरो वरणण दरसणारथी प्रजाईं समूहरो परणण

महा राजा श्रभयशिहनी रो घधावों बाजाररो घरणण

प्रजारा महाराजारा दरसण करणा ग्राभूलरणां रो चरणण

महाराजा भ्रभयसिहुजीर दरबाररों वरणण अंतहपुररो वरणण

जोधपुरमें महाराजा प्रभवशिहजीरों राज्यालिन्तेष सहाराजारी श्रंत्तहपुरमें पधारणों

श्रय संगीत नित भेद चरणण

प्रातक्ालीन नगररों चरणण

स्त्री बरणण

घोड़ांरी घरणण

हाथियांरों घरणण

प्रथम बगीचांरों बरणण

तब्ाबांरो चरणण

महाराजा श्रभेसिघजी रो बरणण

श्रयथ खटभाता चरणण

श्रथ प्रथम भातला संसक्रत चरणण

इति खद भाजा लक्षण

श्रथ नाग भाखा

नाग भाखा टिप्पर्ण

अथ भाषा श्रपन्नंस

श्रय श्रपश्न ठिप्पर्ण

झ्रथ सगघ देसी भाखा

श्रथ सगधघ देस भाजा टिप्पर्ण

प्रथ सुरसेनी

श्रथ प्राकत भाखा वरणण

श्रयथ प्रजभाखा चरणण

श्रय मुरधर भाषा

उत्तरकी भाखा पंजाबी

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सुरांरी सिकाररों घरणंण हे खरगोस हिरणादिरी प्ििकाररो वरणण

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सफलरों वरणण

भोजनांरो वरणण'

भांसांरी वरणण | सहाराजारों नागौर पर हमलों करणरो तैयारी नागौर पर हल्‍्लो 2 | जंसतब्ठमेररा विवाहरों चरणण .

हमीदंखां रो गुजरात में श्राजाद होणो पातिसीहरो सर ुलंदेन गुजरातरो सुधादारं वणाणो

- सर बुलंदरों अश्रहमदादाद पर श्रमंल फरणो 'सर बुलंदखांरों श्रहमदांबाद पर सुतंतर बांदंसाह वणणो

महाराजा श्रभसींघजीर प्रभावरो बरणण . महाराजा अ्रभेसींघरी दिलीमें सुररी सिकार करणी तथा बादसाह-

सूं श्रांसमबासमें नाराज होणो श्रर पातसाहजी रो श्रभेसींघजीनूं सनाधणो "

बादसाह सुहन्मदसाह खच गुजरातसू खबर आावणी

सर बुलंदसूं जुध करण सारू बादसाह मुहम्मदसाहरो बीड़ी फेरणी. "*'

फच्ित्त पांचका वर्णाव

महाराजा श्रभसींघजी रो दरवारमें सर चुलंदर्स जुध करण साझ पांचरों बीडो उठाणोौं

बादसाह मुंहमस्मदसाहरों महाराजा श्रभेसींघजीनूं ज्ञोस देराण्ौ

बादसाह सुहम्मदसाहरी रसूं महाराजा श्रभ्ेसींघजीनूं जुधारथ < सहायता सारू धन श्रर श्रस्त्र सस्त्र देणा

' भहांराजा श्रभर्यासहजीरो डेरां श्राणो प्र जुधरी खबर चारों ओर *** फंलंणी . ४... ५, «#«

7राजारो दिलोसूं विदा होय जयपुर शआ्लावणों

जयपुरमें महाराजा अभेसींघजीरे स्वागतरी तैयारी वरणण ._.. दोनों राजाबांरो सिछ॒णो पु ७३ |

दोनां राजावांरों जयनिवास बाममें पंधारंणों

. दोनूं राजाधांरी श्रपणा सुभटांरे साथ भोजन करणों

है : सहाराजा शअ्रभसींघजी श्रर जेसींघनीरी श्रापंसरी सलाह * 30 ६+

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'ऊंदांरी घरणण

' सहाराजा अ्रभ्सोंधजी श्रर बखतसींधजी रो माहोमाह मिछणौ रा | हनन

पसहाराजा अ्रभ्नेसींघजी रो जोधप्र दिस श्रागमन

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७९ महाराजा श्रभ॑त्तीघजीरों श्रहमदावादरे जुध सारू श्रापरा सांमंतांने. ***

फुरमांण भेजणो *०« २६० ८० ठांम ठांससूं मारवाड़रा तांमंतांरो जोधपुरमें एकठी होवणो ०४... २६१ ८१ फीजरा सांमांन ले जांण बाबा ऊंटांरी घरणण २६२ ८२ ऊंटाने वंठा कर सांमांन उत्तारणो श्र तंद्‌ तांणणा * श्द्ड घरे डेरारोी वरणण +०० २६५ जुधरा सांमानरों चरणण *०० २६६ ८५ तोपांरी पूजा श्रर तोपांरो चरणण . बह २६६ ८६ हथियारों गरणण *«० २६७ ८घप७ भहावतारों चरणण 2६ २६६ ८८ घोड़ांरो वरणण ५४ २७३ ८६ वाहणणारा नाम ५35 २७५ 8० महाराजा श्रभ्नेसीघजीरो वरणण *** २७ ६१ महाराजा शअरभेसिहक्ता सिरोही पर श्राक्षमण «००० २७७ ६२ सर बुलंदखाँन महाराजरो पत्र लिखणो हु डेप २७६ 8६३ महाराजा अ्रभयसिहने सरदारांर साथ वडो दरवार करणों श्रौर ००० सरदाररो जोसपुरण उत्तर देणो ०3 श्पर ६४ महाराजा श्रभयसिहजीरा बखतसिहजीनूं बुलाणो कह ३०४ ६५ बखर्तासघजीरों वरणण ३०७५ ३०६::. ६६ महाराजा शअ्रभेत्तीघजी रो वरणण ध्ज़ ३३५ . ६७ महाराजा श्रर्सीघजी रो .जोस स्ज ३३६ ६८. महाराजा श्रभ्नसीघजीरो सेनामें भासण तथा सुरवीरांरो घरम समझ्ावणों | ** इ३८ ६९ जोघांरी तेयारीरो घरणण जे इषद १०० सेर बविलंदरी तयारी ल्‍र ३५० १०१ महाराजा श्रनप्तिघजीरों सर दुलंदर प्रत संदेस | **« ३५६ १०२ सर दुलंदरो जवाब ; कई ३४६ १०३ महाराजा पझरभसिधरी बखांण +० . ३४७ १०४ महाराजा शअ्रभसिघजीरी सेनारो चरणण (०५४) नजर ३६० १०५ सेचारों घण-घटासूं रूपक बाधिणों “+ .. ३६१ १०६ फेर दूसरों रूपक हे ३६२ परिशिष्ट . १. नाम्ानुक़्मणिका बने २. संगीत एवं नृत्य सम्बन्धी शब्द तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके......... वाद्योंक्ती नामानक्रमणिका 8 5 डे न्‍ “२३ ३. चिशेष प्रकार के श्रस्त्र-शस्त्रों की नाानुछमणिकां श्८ ४. वस्त्र तथा बस्तों सस्बन्धी शब्दों की सोमानुक्मणिका * | ३०. ५. झाभूषणों की नासानुक्रमणिका -: डे: ६. छंदानुऋमणिका बी की

७- कलाशओ्रोंकी नामावली | सम मा मा मम

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हे डे “चतुथ प्रकरण है हो हे हक टी कि

/ - सहाराजा गर्जासह+- हा गे कम पल 0 के 5] हांराजकुमार - गंजसिहको .जोधपुरमें यह संदेश प्राप्त हुआ कि उनके ... “पिता संबाई राजा सूरसिह दक्षिंणमें रोग-प्रसितः हो गये हैं तो वे जोधपुरंकी'

... शासंत्र-व्यवस्थाकाभारः अपने: विश्वासप्रात्र: मंत्रियोंकोः सौंप.:कर तुरन्त ही. :.. दक्षिणकी ओर रंव्राना:हो गये: उनके -वहां 5 पहुँचनेके पूर्व: ही सवाई राजा: _- सूरतिहका-देंहाबसान हो.गंया थाई 7-० , के हे इसःघटनांके पंइंचातें वांदशांहंकी: श्रांजासे दंक्षिणमें ही बुरहानपुरमें महा राज-'*

:. कुमार गर्जेसिहके राज्याभिषेकेका दंस्तुर खाँनेखाँताके- पुत्र. दौरावखांने किया

“इसे अवसरं पर दौराबंखाँने इंनंकीः-कंमरमें: तंलवार-बांधीः और बादशाहकी

जी श्रोर से- भेजे.:हुए. उपहार'भेंट | किये। « बादंशाहकी ओर. से इस प्रकार _

हैः - सम्मानित-होने पर: दक्षिणमें -बादंशांहके सभी . विपेक्षी “महाराज -गजंसिंहके

हा रा शौये और पराकरमसे भ्रातंकित हो गये

7,» राज्याभिंषेकके:कुछ-ही दिन .परंचातूं. महाराजा गंजसिहने: दक्षिणंमें महकर

हा नोमक:स्थांनःपर:श्रमरचंपूंकी : बहुत:.बड़ी सेनोॉका' मुके।बिला: किया |: भयंकर: “युद्ध हुआ:। महाराजा गजसिहने : बड़ी-वी रता-दिखाई अ्रमरचंप्‌ : पराजित हो : : “गया महारोॉजाने बादशाही राज्यको खूबःविस्तार किया .। -दक्षिणंके खिड़की-.. :

- “गढ़, गोलकूंडा,: आसेर, सितारा. अंदिको विजय-कर बादशाहीं राज्यमें मिला .... - दिया:॥ बांदशाह इन पर बहुत प्रसन्न हुआ-और इन्हें 'दछथंभण (से) की. उपाधिसे

.... विभूषित: किया: इसके: अतिरिक्त कई-छोटे- बड़े -प्रान्त- दे कर - इनके राज्यकीः ... . ' . वृद्धि की... इसके परंच्रोत्‌ महाराजा गजंसिंह कुछ :समेयके- लिये-अपने. राज्य से प्‌

भारवाड़में लौट आंये:। 2 का पा 7 कल

तत्पंंचात्‌ शाहजादों. खुरेंम.-किसी- घरेलू - घटनोके +कांरण॑: अपने भावी / भाग्यके विषयंमें- संदेह करने लगा-। उसे यह भय हो. गया. कि बादशाह . - है

; - जहांगीर न्रजहांकेंहाथकी.-: कठपुतली . है. और वह : परवेजको हीं जहांगीरके .. बाद “बादंशाहके ; रूपमें दिल्‍ली : के सिहासत्त 'पेरआरूढ़ करना-चाहती है।.

. - इसके अतिरिक्त महाराजा:-गजसिहकी असीम -शंक्तिके- कारण -दक्षिणमें भोरः

[३०३ | हि वादशाही आतंक पूर्ण रूपसे फैला हुआा है ।4 अतः वह अपने भाग्य-निर्माणके- हेतु कोई उपाय सोचने लगा हि |

खुरंमने अपती कार्य-सिद्धिके लिए दक्षिणमें बहुत बड़ी सेना तेयार की।

उसने वादशाहकोी सिहासनसे च्युत करनेकी ठान ली और स्वयमेव बादशाह बननेकी प्रवल आकांक्षाके साथ दक्षिणसे दिल्‍लीकी ओर कूच किया

कुछ समय पश्चात मेवाइका भीम शिक्षोदिया भी जो अपने संमयका महान .

वक्तिशाली वीर-था, खुरंमकी सहायताके लिये अपनी २५ हजार सेना सहित. आमिला।

:* जब बादशाह. जहांगीरको . खुर॑मके इस कुंकृत्यका यत्ता चला तो वह बहुत :

दुखी, हुआ उसने अपने मानकी रक्षार्थ भर इस विषम संकटको टालनेके लिए:.. ..

राजपूत राजाओंको वुलाया। इस अवसर पर महाराजा गजर्सिह भी अपनी सेना: - ले कर दिल्‍ली पहुँचे वादबाहने आये हुए समस्त राजपुतः राजाझ्रोंकोी शाहजादे परवेजुके साथ एक बहुत बड़ी सेना दे. कर खुरेमका: सामना करने भेजा ।- इस समय अमेरके मिर्जा. राजा जयसिहके पास बहुत बड़ी सेना थी अतः . -.

वादशाहने उन्हींकों सेनापतिका पद 'सौंपा। वीरवर महाराजा-गजसिहकों 5 यह बात कुछ कट्ठु लगी, अ्रत: वे अपनी सेनाको शाही फौजके दाहिनी ओर. ..

लेजा कर दूर से ही युद्धका परिणाम देखने लगे

खुरंमकी सेंताके अग्रणी भीम शिश्षोदियाने अपने योद्धाओं सहित शांहजादे परवेज़ और सेनापति मिर्जा राजा जयसिंहकी सेना पर: बड़ी तेजीसे आक्रमण

किया.।. इसका आक्रमण इतना- भयंकर हुआ कि. वह चालीस' हजारकी श्ञाही

फौज़को: विदीर्ण- करता हुआ झाहजादे परवेजु तक .पहुँच गया: मिर्जा राजा.

जयसिंहकी उसेनामें. भगदड़ पड़ .गई। शाही फौज़को इस प्रकार भागतें देख | हा

कर भीम-शिशोदियाको वड़ा गवे हुआ और उसने टूर खड़े महाराजा गजसिहकी

ललकार कर . उनपर: आक्रमण कर- दिया। 'वीरंशिरोमणि: महाराजा. गजर्सिहने, जिनके . पास केवल तीन हजार राजपूत थे, भीम शिशोदियाकां:डंटें:”...

कर मुकाविला किया। भयंकर युद्ध हुआ ।: भीम शिक्षोदिया वीर गतिको प्राप्त:

स्थलसे भाग गयी .।

हुआ और शांहजादे खुरमकी विजय:पराजयमें परिणत-हो गई और वह युद्ध 77.

बादंशाहने महाराजा गंज॑सिहका 'वहुत सम्मान:किया-। उनके: राज्यकी- वद्धि

. की. उपंयु कत घटना वि०:सं० १६८६: की है। इसके पश्चात भी महाराजा - गजंसिंहने: चौवह. वर्ष तक राज्य करते हुए :वबांदशाहकी बहुत सेवाएँ कीं-।

. बे: जैसे: वीर शिरोमणि ये वैसे ही दानवीर भी थे.।.: उन्होंने अपने राज्यमें कई * हि : कवियोंको बड़ी-बड़ी जागीरें देकर सम्मानित किया-। कह

पच्रस प्रकरण

जाए 4

5 बे महाराज़ो गजसिहके ज्येष्ठ पुत्र थे। बादशाहने ईनंकी.वीरता पर प्रसन्न ..... “होकर इन्हें नांगौर राज्यके साथ रावकी उपाधिसे संम्मानित किया -

5 2. < एक समयकीं घटना हें-+बादशाह. शाहजहाँका दरबार लगा «हुआ था. :: / सामन्तगण औरं अमीर वारी-बारीसे मुजरा.करने और भेंट नजर करनेके लिए. : -. '»/ अच्दर जा रहे थें।। बादशाहंका साला सलांवतखां सामंतों भ्रमीरोंकी अन्दर :..

लेजा कर बांदशाहके सामने परिचय करवाता था... 8 कि 5० मी

८5० ५7 “दीक़ >इंसी. समय राव, अमेरसिह भी. वहां: पहुँचे और : सलांवेतेसाॉकों 7 मुजरा...करतेके लिये कहा :/ इसपर सलावतख्खाने इन्हें जुराः ठहरो' कह कर.

सेकी और: स्वयं. अन्दर चलो - गंया:।:-कुछ - समय : प्रतीक्षा, करनेके -

पहन्‍्चातू -अमरसिह्‌. स्वयं. ही...बिना:' किसी हिचकिचाहटके भीतर चले: गये. : : और ब्वोदंशाहको,मुज॒रा करने लगे। सलावतखाँको यह-बुरा लगा और वह. उन्हें...

. गँव्रार कहनेके हेतु..मुंहसें .केवल “गँ” अक्षर का ही... उंचचारण कर पाया-थाः

हे कि: स्वाभिमाती...राठौड़: अर्म रसिहने उसके: हृदयकी बाते जांन कर उसेके मेँहसे. - ८... पूरा गँवार': शब्द निकलनेके पहले ही. अपनी कंटार उसके शरी रमें.भोंक दी.

उस समय जो भी उसके सामने आया उसे तलवारके घाट उतारे दिया.) “इस. प्रकार: रावजी. शाही दरबारके . पांच उच्चाधिकारियोंका,. जो पंचहजारी . »कहलति-थे, काम: तंमांम करके बाहर निकले। पीछेसे अर्जन- गौडने, जो 5 हींका आदमी होनेकां दंस भरता था,. बादध्ाहकों खुश करनेके लिए इनकी... 5 पीठमें करारा वार कर दिया -वीरवर ग्रंमरसिहने' मरते-मरते ही वापिस, _: “वार किया जिससे अर्जुन गौड़का कान कटःगया और ऐसें-वीरके धोखेसे प्राण >हेने वाला वह कुंलं- केलंकी सदाके लिएं वूर्चा हो गंया

रा राव अमरसिहंके स्वामि-भवतें सामंत वीर: राठौड़-वलू:चांपावत और भाऊ + क्लंपावत-तथा उनके कुछ: साथियोंने वादंशाहके अनेकों आदमियोंकी आगरेके- -

[ .]

किलेमें मार कर रावजीका वदला लिया और रावजीकी रानियोंकी सती. -. -

होनेमें सहायता देते हुए वीरवर वलूजी भी वीरगति को प्राप्त हुए सहाराजा जसवंतरसिह (प्रथम )--

महाराजा गजर्सिहके पदचात्‌ जोधपुरके राज्य-सिंहासन पर महाराजा . जसवंतर्सिह श्रासीन हुए। जसबंतर्सिह अपने समयके राजाश्रोंमं सर्वश्रेष्ठ' नीतिज्न थे। इन्होंने कई ग्रन्थोंकी रचना की श्र हिन्दू धर्मकी. रक्षा की .।

उस समय वद्ध वादशाह ज्ाहजहां भयंकर रोगसे पोड़ित हों गया था। उसके पुत्र दिल्‍्लीके सिंहासनको प्राप्त करनेके लिए भिन्न-भिन्न प्रकारसे पड़यंत्र / रचने लंग गये थे। वादशाह ओऔरंगजेवने दक्षिणसे एक बहत बड़ी सेनाके साथ राज्य पानेकी प्रवल आकांक्षासे कूच कर दिया उस समय वादशाहके.. चारों श्रोर विपत्ति के वादल मडरां रहे थे। इस विपम संकटको टालनेके लिये बादज्ाहको केवल राजपूत राजा दिखाई दे रहे थे, अतः उसने समस्त राजपूत राजाओंको बुलायां | सभी राजपूत नरेश अ्रपनी सेनाओं सहित दिल्‍ली पहुँचे

_ आये हुए राजपूत राजाश्रोंमें भ्रामेर-नरेश जयसिंह शाहंजादे गूजाकी रोकने वंगांलंकी ओर वंढ़ें और जोधपुरके महाराजा जसंवंतर्सिह शांहजादे .:. - - औरंगंजेंबका दमन करने दक्षिणकी श्र शाही फौज़के साथ बढ़े और उज्जैन पंहुँच गये जहाँ दोनों दलोंका कड़ा मुकाबला हुआ ओऔ्रंगंजेवने शाहजंदे

मुरादको प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला . लिया जिससे उसकी शॉंक्ति दुगुनी हो गई थी

महाराजा जसवेतंसिह तंनिक भी नहीं घबराये और अपने घोड़े महबूंब पर सवार होकर विशाल यवन दल पर टूट पंड़े। उन्होंने भयंकर मारकाटके साथ... यवनोंका संहार किया और अपने घोड़े सहित पूर्ण रूपसे क्षत-विक्षत हए इस समय उनके कुंछ सरदोरों और रतलामके राजा राठौड़ रतनसिहने युद्धका भार अपने ऊपर लेकर इन्हें मारवाड़ लौट जानेके लिए बाध्य कर दिया। -. . ऑऔर्ंगजेव विजयी हुआ और कई योद्धाओंके साथ रतनसिह वीर-गतिको : ध्राप्त हुआ |

औरंगजेब दिल्‍ली पहुँचा. और बादशाह बन- गया कुछ समय - पश्चात

सने महाराजा जसवंतर्सिहकों बुलाया और उनका बहुत झादर-सत्कार -. रे हा . किया ।* यद्यपि उसके :हृदेयमें महाराजांके प्रति पूर्ण रूपसे कपट था, फिर भी. ....

उसने उनको प्रसन्न करनेके निंमिततते कीमती उपहार भेंठ किये

“महारानी जसवंतर्सिहजी कवियों और विद्वानोंका:- बहुत अदंर करते थे... .

उन्होंने: अपने, राज्यमें कई कवियोंकी जागीरें देकर सम्मानित किया | इसके

हे अतिरिक्त उंन्होंने-कई युद्ध: किये और अंतर्में काबुलमें इंनका देहावंसान हो. 3 गया | कक 220 277 0 हे 2 ५0 हे

डर हद $%

6 की) षंष्ठम प्रकरंरा .: महांराजों अ्रेजीतसिह+- रा आम

जिद कप 7

कप महाराजा जसवेतसहके काबुलमें देहावसानके समय उनकी दो रानियी. . हा - गंभवती थीं, जिनेसे क्रमशः दो पुत्रे ग्रजीतर्सिह और -देछथंभंण लांहोरमें 3 « हुएं ।., जम्मसे: कुछ समय +पश्चातूं>दंछथंभणका देहान्त हो .गया। महाराजा #

. जसंवंतर्सिहके -विश्वार्सपांत्रे:राठौड़ .सामंत-बादशाहकी -आ्राज्ञाचुसार राजकुमार...

मो और £ रानियों : सहित: दिल्ली पंहुंचे ॥. औरंगजेब, .पहलेसे - ही: मारवाड़:पर : अधिकार -करतेके::लिए अपनी: फौज--भेज चुको था. -उंसने राठौड़ोंको : दिल्लीमें बहुत, लालच दिए और. राजकुमारको अपने हवाले करनेका हुक्म दे

दिया। स्वार्मिभवत राठौड़ -औरंगंजेबके . किसी लॉलंचमें. नहीं आए और . रा हे रॉजकुमारंकी गुप्त रूपसे मारवांड भेज, दिया जब - वे चारों ओरसे मुगल : /' सेनासे ,घिर गंये तो उन्होंने. महांराजों जसवंतसिहुकी ' रानियोंकी इज्जत

“प्बंचानें हेतु : उन्हें -तंलवारके घाट उतार कर: यंमुंनामें बहा दिया और' रवय॑

के 7; विशाल :यवन दलंका सहार. करते -हुएं वीरगेतिको . प्राप्त हुए . जिनमें -रुघौ-: - ५: भाटी; सूरजमलं-सोदू, (चारण ), चन्द्रभांण, अचलंसिह,-रणछोड़दांस आादिः्मुख्य .: थे. वीर राठौड़ दुर्गादासके साथ कुछ सरदार श्रपनी तलवारका जौहर दिखाते 5 हुएं-मारवाड़ आा गये? के 23: 2

पर बादेशोह रॉटठौड़ोंके इस व्यंवहों रेस बहुत कुपित हुआ. और उसने नागोरकें 5, है - . राव इन्द्रसिहसे, जो. राठौड़ :अमरसिहका पौनत्र था, कहा कि. मेरी आज्ञाका

पालन-करे तो जोधपुर तुभको दे दिया जाय : ईन्द्रसिंह इंसेके लिए. राजी हो... :... 5 गया:और' बादशाहने -जोघंपुरका प्रट्टा लिखे कर दें दिया। वह एक बहुत बड़ी.

- «४... सेनाके साथ जोंधपुर झ्रायां। सभी रोठौड़ोंने एक होकेर उसका मुकाबिलां किया हा

: “भयंकर युद्ध हुआ जिसमें इन्द्रसिह पराजित होकर भांग गया। 407 आओ हर मारवाड़ परं अधिकार करनेके निर्मित्त मुगल दलने बार-बार प्राक्रमरा। किया

-. राठौड़ डट कर उनका मुकाबिला करते थे. किन्तु अ्रन्तमें जोधंपुर पंर शाही

अधिकार हो गंया इस समय मारवाड़में बहुतसे राठौड़ोंने यवनोंका प्रंतिकार - . . - -करनेके लिए विद्रोह करना शुरू कर दिया वे पृथक-पृथके दलों में विभक्त होकंर .. -

हर

चारों ओर मारकाट और लुट-खस्तोट करने लगे। वे अ्रवसर मिलते ही मुगलोंकी चोकियों पर टूट पड़ते और ध्वस्त कर देते यही नहीं मुगलोंकी रसद लूट लेते थे और उन्हें हर प्रकारसे तंग करने लगे उन्होंने ऐसी विकट परिस्थिति उत्पन्न कर दी कि मुगलोंको हर समय चौकन्ना रहना पडता था।

महाराजा अ्रजीतरसिहका गुप्त रूपसे लालन-पालन होता रहा और जब कुछ योग्य हुए तो राठौड़ोंने उन्हें अपना अग्रणी बनाया इनका बल दिन- प्रतिदिन बढ़ता जाता था और इन्होंने मारवाड़में- यत्र-तत्र मुगलोंको दवा कर उनसे कर वसूल करना शुरू कर दिया।

: उस समय जोधपुरका सूदेदार शुजाअतखां था। वह लश्करिखाँको जोधपुरक अवन्धच सांप कर गुजरात गया। इधर महाराजा अ्रजीतर्सिहजी अपने दलवल सहित आडावलाकी ओर गये। लश्करिखोंने महाराजाका पीछा दिया और कुरमालकी धाटटीमें युद्ध किया किन्तु परास्त होकर भाग गया |

- इस समग्र उदंयपुरके महाराणा जयसिंह और उनके पुत्र अमरसिह गृह-कलह हो गया महाराणाते उस संकटको टालनेके उद्ेश्यसे अपने छोटे भाई गजसिंहकी पुत्रीका विवाह महाराजा अजीतसिहसे कर दिया

महाराजाने होटलूके- चौहान-:चतुरसिहकी कन्यासे भी विवाह किया था जिसके गर्भसे जालौरमें संवत्‌ १७५६ मार्गशीर्ष बदि १४का शोभनयोग, शकुति- करण, सिथुनलग्न- और विज्याखा नक्षत्रमें महा राजकुमार अभयसिहका जन्म हुआ |. 7 ४८: ! पा

महाराजा अजीतसिहने अपनी शक्तिसे मुगलोंके नाकमें दम कर रखा थां। उन्होंने दक्षिणमें औरंगजेवकी मृत्युका समाचार-सुनते ही अपनी सेना लेकर जोधपुर पर आक्रमण: कर दिया जाफरकुलीने पहले. तो महाराजाका सामना किया. किन्तु श्रवल राठौड़वाहिन्तीको देख.कर वह किला- छोड़ कर भाग गया :यवन इतने भयभीत हुए कि वे: अपनी जान -बचानेके लिए दाढ़ों सुडवा ,कर ;हाथमें- - माला लकर सीतारामका उच्चारण करते हुए जोध्पुरसे भागे कई राखड़ों द्वारा कंद कर लिये गये महाराजाने अपने पंत॒क-राज्यमें प्रवेश किया राजधानी, जो यवनोंसे दलित हो गई थी, गंगाजल आदि.छिड़क कर शुद्ध को गई.। मंदिरोंके | स्थान पर संस्जिदें बन.गृ थीं और इनमें मुल्लोंकी बांगें गंजती. थीं उनके स्थान

पर वापिस मंदिर्‌ वत गये और शंखों.व घंटोंकी ध्वनि गंजने लग्री। बड़ेठाट-... ....४.

वाटसे महाराजा अजीतर्सिह राजसिहासन पर आसीन. हुए

[७9.- | विज ८58 “की आरंगजेबके मरते ही शाहजादोंमें तख्तकें लिए तनातनी हुई और शाहजादी

./ “मुहम्मद -मुश्नज्जम बहांदुरशाहके नामसे-भारतका .बादेशाह बंन. गया | उसने

.. आमेर-नरेश जयसिहसे राज्य छीन कर उसके छोटे भाई विजयंसिंहको दे दिया «४. क्योंकि विजयसिह उसके: पक्षका >था ।-जब: बादशाह: बहादुरशाहको- मालूम 5 “हुआ कि अजीतसिहने: जोधपुर पर अधिकार - कर लिया है तो वह यवन-दलके : साथ अज॑मेरकी ओर रवाना. हुआ | इंस समय राज्यच्युंत आरमेर नरेश जयंसिह भी

5 “उसके साथ था महाराज -अजीतसिह और बादशाहमें मेड़तेमें संधि हो गई जिसमें

रा बादशाहने महाराजा और उनके पुन्रोंका: बंहुत संत्कार किया, उन्हें उपहार भेंट हे कि कियें और उपाधियोंसे सम्मानित किये दब कक कक

बांदेशांह जल्दी ही मारवाड़में शान्ति स्थापित कर के दक्षिणंकी श्रंशान्तिको - दवानेंके' लिए चल पड़ा) उस समय राजा -जयप्रिह, महाराजा ग्रजीतसिह, ..

:.:.. : दुर्गादांस आदि उनके साथ थे। यद्यपि बाहशाह ऊपरसे तो महाराजा अजीतसिह ... पर खुश नजर आता था तंथापि उसने जोधपुरका प्रबन्ध करनेके बहाने काजमंखाँ :.. और मेहराबर्खाक़ो भेज करे:जोधंपुर पर चुपंचाप अपने अधिकार करें लिया: : जब इंसकी सूचना .महाराजाअंजीतर्सिहको मिलीं तो वे -बंहुत अंद्ध हुए किंन्‍्तु «_: परिस्थितिवश “उन्हें चुप रहना पड़ा जयसिंह और दुर्गादासके साथ महाराजाने 5 « चुपंचाप: बांदशाहका.- साथ -छोड़ : दिया औरं तीनों उदयपुर -जाकर महाराणा :.. अमेरसिहसे मिले:।, वहां पंर उनका बहुत सत्कार हुआ

वहांसे लौट कर महाराणा और अ्जीतसिहने अपने योद्धाश्रों सहित जोधपुर

ही पा पर शझ्राक्रमण कर दिया। फौजंदार मेहरावखाँ किला छोड़ कर. भाग गया और ..: जोधपुर पर पुनः महाराजाका अधिकार हो गयां। महाराजा. अपने उत्साहसे श्रागे 5... बढ़ते गये वे सांभर और डीडवानाको विजय करें के श्रामेरकी ओर: बढ़े :... बहाँके फौजदार संयद हुसैनखाँको परास्त किया /। महांराजों -अजीतसिहले

है है ज॑यंसिहको, जो उनके साथ:था, पुन: आमेरका राजा-बनां दिया सांभरके बराबर - दो भाग कर के: आधा झामेरकी ओर तथा आधों मारवाड़- राज्यमें' मिलो :दिया + + और स्वयं अपनी-राजधानी जोधपुर लौठ आये

कुंछ समय बाद. साँभरमें पुन: शाही फौजोंका जंमाव होने पर जोधंपुर और

हा हे आमेरकी - फोज ने आक्रमण: कर दियां.]. यह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ इसमें

. “जोघपुरका-भीम कूंपावत मारो: गया। अंतंमें राजपूतोंकी विंजय-दुन्दुर्भि बजी

हो औरं- महाराजा अजीतंसिंहजी जोधंपुर लौट आये हि जा राजपूर्तोंकी इस विजयकी खबर जब बादशाह बहादुरशाहने सुनी. तो वह

[5 |

बहुत .कुपित हुआ: और घवराया -भी.। वह. रात-दिन राजपृतों की. बढ़ ती. हुई शक्तिके कारण चिंतित रहने लगा। अंतमें उसने महाराज़ा अजीतसिहसे संधि. कर ली ओर जोधपुर तथा जयपुर नरेगोंके अधिकारको मान .लिया। + . . * बादशाह बहादुरशाहके मरनेके पश्चात्‌ उसका पुत्र मुइजुद्दोत जहाँदारशाह.. अपने भाइयोंको मार कर दिल्‍लीके तख्त-प्र आसीन हुआ इसके कुछ ही दिन; बाद सेग्रदवन्चुओंकी सहायता से फरुंखसियार मुइजुद्दीन जहाँदारशाहंको कैद: कर के स्वयं बादशाह बन बंठा उसने दोनों सैयदव॑न्धुओंको महत्त्वपूर्ण पद दिए. ओर उन्हें उपाधियोंसे सम्मानित किया | « हो | जव फरुंखसियर बादशाह बना तो नागौरके राव इच्द्रसिहका पुत्र म्होकमर्सिह दिल्‍ली. जाकर महाराजा+अजीतसिहजीके , विरुद्ध . वादशाहको वहकाने लगा:। 7राजा अजीतर्सिह वीर होनेके साथ .राजनीतिज्ञ भी थे होने भाटी... अ्मरसिहके साथ,कुछ सरदारों को दिल्ली भेज -कर धोखेसे.म्होकमर्सिहको मंरवा इस घटना से. बादशाह ,वहुत क्रोधित. हुआ ।.. उसने सैयंदहसैनअलीको एक : बहुत वड़ी. सेना देकर मारवाड़ की ओर भेजा | * विशाल यवन दंल और.

राजपूतोंमें मेड़तामें संधि हो गई और महाराज़कुमार अभयसिंहका हुसैनअलीके. : ह! पा साथ दिल्‍ली जाना तय हुआ राजकुमार -अभयश्निहंके वहां पहुँचने पर.बादशाहने .: ...

उसका वहुत आदर-सत्कार किया | उन्हें सुनहरी तलवार, जड़ांऊ खंजर; घोड़े... आदि भेंट किये तथा पंचहजारी मंसव दिया। महाराजकुसमार, अभयसिह . ठाट-

वाढ़के साथ जोधपुर लौठे.। महाराजा ,अजीतरस्तिह राज़कुमारसे मिल कर और

उनके सकुशल लौट आनेकें कारण वहुत हित

महाराजा अजीतसिह अपने मंन्में मुगलोंसे कभी प्रसन्न नहीं: हुए वे बगल सल्तनतको ढाह ही देना- चाहते थे ।उधर,सेयद बंन्धुओं औरवादशाह. फरखसियर:

में परस्पर वैमनस्य:हो ग़या ।:इन्‍्हीं दिनों: महाराजा अजीतसिह भी अंपने सरदारों:ः सहित दिल्‍ली पहुंचे-। जब महाराजा दिल्लीमें:प्रवेश कर रहे थे उस संमय- उन्होंने: - हे अपनी शेशवावस्थामें होने वाले दिल्लीः युद्धमें लड़ने वाले उन वी रोंके समाधि-स्थानः - थे देखे जो इनकी. रक्षार्थ औरंगजेव्से. लड़-करः दिल्‍लीमें ही- वीर-गतिको- प्राप्त ना

गये, थे ,इन्हें अपनी जन्मदात्री मांका-भी स्मरण हुआ. जिनकी समाधि भी ला

' स्थान. पर वनी हुईं थी-।. इनके. हृदयमें : निद्वित.प्रतिशोध की भावना प्रबल बेगसे उठी और मन ही मंनः ठान-लिया कि.मुगल, वंशका .. ध्वंसः कर दंगा - किस्तु इसे उन्होंने प्रकट नहीं होने दिया

हा

दिल्‍ली-में महारांजोंका सैयद भाइयों और बादशाह फरुखसियरने अलग-

के अलेग स्वोगत 'किया दोनोंमें से -हर एक. शक्तिशाली . महाराजा अश्रजीतर्सिहको

. अपनी ओर, मिलाना. चाहते- थे | महाराजाक़ा मन बादशाहसे उचट गया :था ग्रतः उन्होंने सैयद बन्धुश्रोंका-पक्ष लिया, किन्तु-ड्स शर्तके साथ “कि-इस बादशाहके

| “: हटनेके बाद. हिन्दुश्ों पर से जजिया कर हट जाना चाहिए, हिन्दू तीर्थों पर से कर .... हट जाना चाहिए, मंदिरोंके बनने और उनमें होने वाली नियमित पूजामें किसी

हा . प्रकारकी बाधा. नहीं .पड़नी चाहिए और गौ-वध बन्द हो जाना चाहिए, भ्रादि ये

सब वर्तें सैयद बन्धुओंसे करवाई

इधर-सैयद बन्धओंंको यह विश्वास था- कि. श्रामे र-नरेश जयसिंह बादशाहको : हमारे विरुद्ध बहकातां . है, भ्रतः उन्होंने और महाराजा भ्रजीतर्सिहने. बादशाह _ फरु खसियर पर दबाव डाल कर जयसिंहको आमेर.भिजवा दिया

-.... / बादशाह फरुंखसियर सैयदोंकों मरवानेक्रा पड़यंत्र. कर रहा था, श्रतः उन्होंने

-. अपने. वन्धु सैयद हुसेनअलीको दक्षिशासे अपनी रक्षा और मददके लिए बुला - लिया वह एक विशाल दलके साथ दिल्‍ली पहुँचा श्रब बादशाह पिटारीका - सांप बन गया और बहुत भयभीत रहने लगा सेयदोंने बादशाह फर्रुखसियरको

.. पकड़ कर कद कर लिया और मार डाला बादशाहके महलका सारा माल लूट लिया गया. और उसे सैयद बन्धुओं तथा महाराजा अंजीतंसिंहने परस्पर

>'. बांट लिया।

:: उस समय॑ महाराजा भजीतसिह और सेयद बन्धुशंंकी ही -दिल्‍लीमें चलती

थी।-सेयद बन्धु महाराजाका गुण गांतें थे। उन्होंने रफीउद्रजातको बादशाह : ““ खाया किन्तु कुछ ही समय बाद वह बीमार हो गयां तब उसके बड़े भाई ..-“ 'रफीउंद्दौलाको दिललीके तख्त पर बैठा कर बादशाह बनाया यह बादशाह भी

« अधिक दिन :तक “जिन्दा: नहीं रहा-और महाराजा श्रजीतर्सिहजीकी मंत्रणासे -:. मुहम्मदशाहकी बादशाह बनाया गया। -.. ६. इन्हीं दिनों आगरामें ईरानी-सुगलोंने आमेर नरेश जयसिंह आंदिसे प्रेरित . » हो कर उपद्रव कर दिया और उन्होंने श्रपत्ती औररसे निकोसियरको श्रागरेके तख्त 7 पर बेठा कर बादशाह घोषित कर दिया.। सैयद बन्धुओोंने हुसैनअलीको श्रागरेकी शोर. रवाना किया श्रौर कुछ दिन बाद. स्वयं भी महाराजा. अ्जीतसिंहजीको

... लेकर आागरेकी. तरफ. प्रयाण किया सैयदोंने .आगरे पर -झ्ाक्रमण कर-के “- बादशाह निकोप्चियरकों पेकड़ कर कैद कर लिया

संयद.बंधु आमेर त्तरेश जेयसिंह पर बहुत कुपित थे, भ्रतः उन्होंने आमेर-पर आक्रमण कर:के जयसिहको दण्ड देनेका निश्चय “किया + जयसिहने- पहलेसे ही

[ १० ]

भयभीत होकर महाराजा श्रजीतर्सिहको पत्र लिख कर प्रार्थना की कि श्रव मेरी लज्जा आपके हाथमें है, आप ही मुझे वचा सकते हें। इस पर महाराजा अजीतसिहने सैयद बंधुश्नोंको समभझा-बुका कर अ्रमिरकी शोर जानेसे रोका, यद्यपि सेयद बंधु मनमें जयसिहसे बहुत जलते थे, किंतु महाराजा अजीतसिहके सामने उनकी कुछ चल नहीं सकी और सब दिल्‍ली लौट आ्राये

कुछ समय पश्चात्‌ महाराजा अ्रजीतसिहने वादशाहसे विदा मांगी बादशाहने कई बहुमूल्य वस्तुएं महाराजांको भेंट कीं और बड़े सम्मानके साथ विदा किए महाराजा अजीतसिंह शोपुरके राजा इन्द्रसिह, बूंदीके हाडा वुधसिंह, रामपुरके राव, शिशोदिया अ्खमल और फतैमल आदिको साथ लेकर रवाना हुए। मार्ममें आमेर नरेश जयसिहको भी साथमें ले लिया श्रौर सबके सव मनोहरपुर होते हुए जोधपुर गये जोधपुरमें श्रतिथियों सहित महाराजा अ्रजीतसिहका शानदार स्वागत हुआ सभी अतिथियोंको जोधपुरमें ठहराया और उनका खूब आदर- सत्कार किया। महाराजा शअ्रजीतर्सिहके दरबारमें सभी अ्रतिथि उपस्थित हुए भर सबने महाराजाको मुजरा कर के नजरें कीं इस अ्रवसर पर महा राजाने अपनी पृत्रीका विवाह आमेर-नरेश जयसिंहदेः साथ बड़े ठाट-वाटसे कर दिया |

कुछ समय पद्चात्‌ महाराजा श्रजीतसिहजीको यह खबर मिली कि बादशाह . . मुहम्मदशाहने सैयद वन्धुश्रोंमें से हुसैनअलीको मरवा डाला और दूसरे भाई श्रवदुल्लाकों कंद कर 'लिया। इससे महाराजा बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने तुरन्त अपनी सेना लेकर अजमेर पर धावा बोल दिया और वहां के तारागढ़ पर राठौड़ोंकी पताका फहरने लगी जिस अजमेरमें कुरानके पाठ होते थे, - हत्या होती थी वह सब बन्द होकर मंदिरोंसे घंटा-रव श्रौर शंखनाद सनाईं देने लगा। इस समय महाराजा श्रजीतर्सिहजी एक बादशाह की तरह ग्ञाही शान- शोकतसे अजमेर में रहने लगे इन्हीं दिनों महाराजाने सांभर, डीडवाना आ्रांदि पर अपनी सेनाएँ भेज कर वहांके शाही फौजदारको भगा दिया और अपना अधिकार कर लिया

वादशाह मुहम्मदशाहने महाराजा अजीतसिहका दमन करनेके लिये मुजफ्फर- खाँको तीस हजारकी विश्ञाल सेना देकर भेजा। समुजफ्फरखांने मनोहरपुरयें आकर पड़ाव किया इधर महाराजा अजीतंसिहने एक बड़ा दश्वार किया और महाराज- कुमार अभयसिहको मृजफ्फरख़ाँका मुकाबला करनेके लिए भेजनेका निश्चय किया महाराजकुमार अभयसिहने इस-अवसर वर बड़। उत्साह दिखाया और अपनी सेनाके साथ रघनाथ भंडारीको लेकर रवाना हुए रागैड़वाहिनीको

. अपनी श्रोर-बढ़ती हुई सुनकर मुजफ्फरखाँ. बिना मुकाबला किये ही' अपनी: सेना-

,: सहित भाग गया। 8 2]

महाराजकुमांर अ्रभयंसिहने नारनौल तथों दिल्‍ली व. आंगरेंकें- आसंपासके

-... प्रदेशको' लूटंना शुरू कर दियां और शाहजहाँपुरं तक पहुँचः गये!। यहाँका फौज-

दार भी इनके थ्रागे नहीं टिक सका और उन्होंने शाहजहाँपुरको लूट कर भस्मीभूत 'कर दिया.। महारांजकुमार श्रभयर्सिहका आतंक-चारों ग्रोर फैल गया श्रौर दिल्लीमें खलंबली मंच गई इस समय महाराजकुमारका: 'धौकछसिंह' नाम पड़ा। अभय- सिंहजी' विभिन्न. प्रकारकी लूंठकी वस्तुग्रोंके साथ विपुल धन-राशि लेकर वापिस लौटे ।: महाराजा अश्रजीतर्सिह पुत्रके:. इस रणकौशल और: प्रतापको देख कर . बहुत प्रसन्न हुए :और उनका. स्वागत किया | अब उनको यह: विश्वास हो गया

... कि मेरें बाद मेराः पुत्र भी राठौड़ोंकी- शानकोः रखनेमें समर्थ होगा

उधर वादर्शाहने घबरा कंर एक देरबार किया और उसमें सब राजाश्रों- _नबाबोंकीं संम्मति लेंकर महाराजा अश्रजीतर्सिहके पास नाहरखाँको अपना संदेश ' - लेकर भेजा नाहरखाँ महाराजाके पास पहुँचा किन्तु उसके श्रनुचित व्यवहारके - कारण वह मारा गया

_ जब बादशाहने यह खबर सुनी तो वह - बहुत घबराया और एक बड़ी सेना : देकर शरफुद्दोला इरादतमंदखांको और हैदरकुलीको भेजा इंस: विशाल: दलके

.. - साथ-आमेर नरेश जयसिंह, महम्मदखाँ बंगसःआदि भी अपनी-अपनी! सेनाएँ लेकर

. महाराजोकें विरुद्धआयें। इसःप्रकार शाही:दलको आता देख महाराजा अ्रजीत॑सिहने

हम _ नीमाज ठाकुर ऊदावत वीर अमरसिंहको.अजमेरके किलेकी रक्षाका भार सौंप कर स्वयं मारवाड़ जोधंपुरकी :रक्षार्थ गये शाहीं दलने अ्जमेरके किलेको

“घेर लिया। इस अवसर पर नीमाज- ठाकुर ऊदावतः अमरसिहने बड़ी वीरता .: दिंखाई।--कुछ :दिन युद्ध होनेके पश्चात्‌ श्रामेर नरेश जयसिंहने संधि: करवा दी . और अजमेर पर बादशाहका अधिकार हो गया। इस संधिमें महाराजकुमार 'अभयसिहका बादशाहके दरबारसें दिल्‍ली जान्ना- तय- हुआ

: बादशाह मुहम्मदशाहनें महाराजकुमार अ्रभयसिहके दिल्लीं पहुँचने पर . उनका बहुत आदर-सत्कार किया और उन्हें कई बहुमूल्य उपहार भेंठ किये। दिल्लीमें रहते हुए इन्हीं दिनों एक समंय महाराजकुमार अभयंसिंह बादशाह महम्मदशाहके - दरबारमें गये और निर्भयं होकर झ्रोंगे बढ़ने लगे जब वे बाद- _शाहके बिल्कुल निकट पहुँचे तो वहाँकेः एक श्रमी रने उन्हें रोक दिया महाराज- कुमारने तुरन्त ही अत्यन्त क्रोघित होकर कठार निकाल लिया | बादशाह

[ १२ ]

मृहम्मदशाह जो सिंहासन पर बैठा यह सव कुछ देख रहा था, तुरन्त उठा श्रीर थ्रागे बढ़ कर अ्रपने गलेका मोतियोंका हार महाराजकुमारकों पहना कर बड़ी कठिनाईसे इनके क्रोधकों शांत किया | अ्रगर बादशाह उस समय ऐसा नहीं करता तो संभवतया वही घटना घटती जो बादशाह शाहजहांके दरवारमें राठौड़ श्रमर- सिंह द्वारा हुई थी

महाराजकुमार अ्रभयर्सिह उन्त दिनों दिललीमें वड़े ठाद-वाट से रह रहे थे और महाराजा अजीतर्सिहजी जोधपुरमें सुखपुर्वक थे। उन्हीं दिनों एकाएक महाराजाका देहावसान हो गया यहाँ पर कर्नल टॉडके अनुसार बादशाह मुहम्मदशाहने ही महारांजकुमार अ्रभयसिहको दिल्‍लीमें महाराजा श्रजीतर्सिहके विरुद्ध बहकाया और एक जाली पत्र महाराजकुमार अ्रभय्सिहके हस्ताक्षरका उनके छोटे भाई वखतर्सिह के नाम भिजवा दिया, जिसमें मारवाड़के हितके लिये वृद्ध महाराजाको मौरनेका लिखा था। उसीके अनुसार राजकुमार बखतसिहने महाराजा अजीतसिहकों मार डाला। हो सकता है कविवर करणीदान राठौड़ वंश पर लगने वाले इस कलंकको छिपानेके लिए 'सूरजप्रकास' में इस वातके लिए मौन रह गये हों ]

सप्तस ब्रकररा महाराजा अभयसिह--- : स्वाभिमानी महाराजा भ्रजीतर्सिहके स्वर्गवासके पश्चात बादशाह मुहम्मद- 'शाहने महाराजकुमार अभयर्सिहका दिल्‍्लीमें अपने हाथसे राज्याभिषेक किया इस अवसर पर बादशाहने महाराजा अभयसिहके कमरमें तलवार बांधी, राज- मुकुट पहनाया और हीरे मोती आंदि भेंट किये कई बहुमूल्य वस्तुएँ उपहारमें दे कर वादशाहने नागौरकी शासन-सनद मारवाड़के नवीन महाराजा अभयसिंहको दे दी इस प्रकार महाराजा वादशाह द्वारा सम्मानित होकर अपने देश मारवाड लौटे महाराजाके मारवाड़में प्रवेश करते ही प्रजाने बड़ी भक्तिसे नवीन महांराजाका स्वागत किया। ज्यों-ज्यों महाराजा अभय्सिह राजधानीकी ओर बढ़ते गये त्यों- . त्यों प्रत्येक स्थानकी कुलवधुओोंने शिर पर -जलसे भरे कलश रख कर तथा गीत गा कर महाराजाका सम्मान किया। महाराजाने भी राजधानी छौट कर सामंतोंको उपहार दिये तथा कवियोंको पुरस्कार देकर सम्मानित किया। कम ' सदियोंसे चली आा रही प्रथाके अ्रनुसार महाराजा अभयसिहका जोधपुरमें 'ठाट-वाटसे राज्यामिषेक हुआ | तत्पश्चात्‌ महाराजा अ्रभयसिहने नागौर पर

[ ९३ ] .. आक्रमण: करनेके लिये अंपनी सेना.तैयार की-।. चिर-प्रचलित प्रथाके श्रनुसार . ज्वालामुखी तोपोंको शक्तिका रूप मान कर बकरों श्रादिकी बलि दी गई तेल- सिन्‍्दूरंसे-उनंकी पूजा:की -गई | युद्धकी सारी- सामग्री: तैयार की ।-महाराजा : अंभय्सिह अंपने छोटे भाई बखतसिंहके साथ पूर्ण रूपसे सुसज्जित होकर नागौरकी : और बढ़े | .नागौरकां राव इन्द्रसिह महाराजाकी शक्तिक्े सामने झुक गया . तागौर पर महाराजाकां अधिकार हो गया महाराजाने अपने छोटे भाई बखत- + . सिहंको नागौरंका रांजा बनाया श्र उन्हें 'राजाघधिराज' को उपाधि दी इन्हीं .. दिनों महाराजाके छोटे भाई आानन्दंसिह श्रौर रायसिंहने उपंद्रव कर के मेड़ता पर चढ़ाई कर दी। शेरसिह मेड़तियाने मेड़ताकी रक्षा की महाराजा भी नागौरकी -ओरसे निवंत्त होकर अपने भाई बखतसिहके साथ मेड़ता पहुँच गये यहां पर आंसपासके राजाश्रोंने महाराजाके पास नजरें भेजीं और इन्हीं दिंनों महाराजाने

कक _जैसलमेरकी राजकुमारीसे विवाह भी किया और जीधपुर लौट आगे

दर कुछ समय पद्चात्‌ बादशाहका: झ्ाज्ञा-पत्र. मिलनेके कारण महाराजा अभय- के ... सिह अपने सामंतों सहित दिल्‍ली जानेके लिये रवाना, हुए | जब वे दिल्‍ली पहुँचे

' - तो बादशाहने उनका बहुत श्रादर-सत्कार किया उसने अपने दरबारमें महा-

_" राजांको बेठे हुए सारे उमराबों अमीरोंसे उच्च स्थान पर आ्रासीन किया श्रौर

*... इनकी बहुत प्रेशंसो की।

“. :: बादेशाहने ग्रुजरातके उपंद्रवकी दबांनेके लिए सरबुलन्दर्खांको भेजा था। - सरबुलन्दर्ाने विद्रोहियोंस मिल कर गुजरात पर अधिकार कर के अपनेको वहांका

- अधीश्वर घोषितं कर दिया। सरबुलन्दके इस प्रकार स्वतंत्र होनेकी खबर जब बादशाहंके पास पहुँची. तो वह बहुत घबराया.

बादशाहने शक्तिशाली सरबुलन्दका दमन. करनेके लिए अपने .विशाल

. “« दरबारमें सोनेके पात्रमें बीड़ा (ताम्बूल). रख कर घ॒माया। मगल साम्राज्यके

: शक्तिशाली वीरों तथा भ्रमोरोंस दरबार खचाखच भरा था कि तु किसीकी भी 5 सरबुलन्दके विरुद्ध बीड़ा उठोनेकी- हिम्मत नहीं हुई बादशाहको मिराश दुखी देख कर महांबंली महाराजा अभयसिहने बीड़ा उठा कर सरबलन्द्रको बाद-

- -. शाहके कदमोंमें भुकानेकी प्रंतिज्ञाकी | बादशाहने भ्रजमेरके साथ गुजरात सूबेकी - /शासन-सनद महाराजा अ्रभवसिहको दे दी | इस अवसर पर बादशाहमे प्रसन्न

: होकर महाराजाको मुकुट, सिरपेच, कीमती खजर, कटार, तलवार आदि देकर

_ सम्मानित किया इसके अतिरिकतः मंयं बारूदके विभिन्न आ्राकारकी तोपें,

'अ्रस्त्र-शस्त्र; बंदूक तथा कुछ सेताके साथ इकतीस राख रुपया खर्चेका देकर विदा किया।

जा

वहाँसे महाराजा सेना सहित जयपुर आये श्रामेरः नरेश जयसिंहने इनका बहुत आदर-सत्कार किया और अपने यहाँ ठहराया वह॑से महाराजा मेड़ते पहुँचे और. अपने छोटे भाई बखतसिहसे मिल कर उनके साथ जोधपुर लौट आये। '

राजधानी लौटने पर महाराजाने सरवुलन्द पर चढ़ाई करनेके लिये अपने राज्यके सारे सामनन्‍्तोंकों परवाने भेज कर सेना सहित इकट्ठा किया। महाराजाने एक विज्ञाल दल तैयार किया। पूर्ण रूपसे अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हुए। तोपोंको शक्तिका रूप मान कर उनकी पूजा की महाराजाने इस प्रकार तैयार होकर अपने छोठे भाई वखतर्सिहके साथ सरवुलन्दके विरुद्ध प्रयाण किया और जालोर शआ्राये वहांसे रोहेड़ां भौर पौसाब्ठियाके जागीरदारोंको परास्त किया | महाराजाने सिरोहीके रावको दण्ड देनेके लिए आक्रमण कर दिया महाराजाकी गसीम शक्तिके सामने सिरोहीके रावको भूकता पड़ा ओर उसने अपने भाईकी कन्याका विवाह कर के महाराजासे संधि कर ली। महाराजा अ्रभयसिंह वहांसे रवाना होकर पालनपुर पहुंचे यहाँका शासक फोजदार करीमदादखां महा-

राजासे मिल गया

महाराजाने सरबुलन्दको एक पत्र लिखा जिसमें उसको अहमदाबाद छोड़ कर वादशाहके सामने भुंकनेके लिए लिखा किन्तु सरवुलन्दने स्पष्ट इन्कार कर दिया

महाराजाने अपने दलबल सहित रवाना होकर सरस्वती नदीके किनारे सिद्धपुरमें डेरा किया उधर सरंबुलन्द महाराजासे लोहा लेनेके लिए पूर्ण रूपसे तैयारी कर चुका था। उसने अपने अधीनस्थ सभी मुसलमानोंको सेना-. सहित इकट्ठा कर महाराजाके विरुद्ध मोर्चा बांध लिया

इस समय महाराज़ाने एक दरबार किया: जिसमें उनकी सेनाके सभी सुभट इकट्ठे हुए इस अवसर पर राठौड़ वंशकी भिन्न-भिन्न शोखाओ्रोके--चांपावत, कंपावत, ऊदावत, करणावत,_ करमसिहोत, मेड़तिया, जोधा, ऊहड़, रूपावत भारमलोत आंदि तथा सभी वंशोंके राजपूत जेसे भाटो, चौहान, शिश्ोदिया, सोनगरा, शेखावत, मांगलिया आदिके अग्रणी वीरोंने तथा चारण कवियों, राज- गरु प्रोहितों तथा ओसवाल मुत्त्तहियों आदिने सभामें बड़ी जोशीली आवाज़से यह प्रदर्शित किया कि हम सरवृलन्द पर विजय करनेके लिये वीर-गतिको प्राप्त हीनेमें विल्कुल नहीं हिंचकिचायेंगे

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महाराजा अ्रभयर्सिहने सभामें बड़ा जोशीला भाषण दिया उन्होंने अपनी

हा सेनाके वीरोंको बताया कि एंक दिन मरना तो सभीको है ही फिर क्‍यों नहीं हम

रणा-भ्रमिमें वीर गतिकों प्राप्त होवें जो कि सन्यासियों महात्माश्रोंकी तपस्थासे भी बढ़कर है

सभी वीर अपनी-अ्रपनी सेना को तैयार कर के आगेका कार्यक्रम बनानेमें

जुट गये महाराजाकी सेनामें अंश्वारोही सेना बड़ी प्रबल थी। उसमें दक्षिणके

.. भीमरथछी नामक स्थानकी अरइव श्रेणी सबसे अग्रणी थी। इसके अतिरिक्त

झारवाड़के घाट, राड़धरा और काठियावाड़के अश्व प्रमुख थे। इस प्रकार

' राठौड़वाहिनी एक भयावनी घटाके समान तैयार होकर सरबुलन्दके विरुद्ध - चल पंड़ी 5) श्र

उधर सरबलन्दने इस भयंकर दलकां मुकाबिला करनेके लिये पूर्ण रूपसे

तैयारी करनेमें कोई कसर नहीं रखी . उसने नगरमें जानेके प्रत्येक मार्ग पर

.. अपनी सेनाके साथ तोपें तैथार करदीं जिन्हें यूरोपियत चलाते थे उसकी सेवामें बंदूकधारों यूरोपियन सैनिक भी .थे.।

है [ग्रंथ-सार देने. के साथ ही में यहां राजस्थान प्राच्य-विद्या-प्रतिष्ठान

. * जोधपुरके सम्मान्य संचालक, पद्मेश्री जिन विजयजी' मुनि, पुरातत्त्वाचार्यके प्रत्ति

. आश्षार प्रदर्शित किये बित्ता भी नहीं रह सकता कि जिन्होंने राजस्थानीके इस « प्राचीन ग्रंथकां-सम्पादेन करनेके लिए मुझे संत्प्रेरणा दी ग्रंथ-संपादनमें श्री

5 गोपालनारायणजी बहुरा, एम. .ए., उप-संचालक, राजस्थान प्राच्य-विद्या-प्रति-

- प्ठात, जोधपुरने समय-समय पर मार्ग-निर्देशन कर और पग्रंथ-सम्पादन हेतु

. . सहायक ग्ंथोंके अध्ययनमें सहंयोग देकर जो सौजन्य प्रकट किया उसके लिए

. मैं पूर्ण कृतज्ञ हूँ। श्री पुरुषोत्तमजी मेनारिया, एम. ए.ढ, साहित्यरत्नने भी ग्रंथके -. भ्रूंफ संशोधनमें भ्रपना पूर्ण सहयोग दिया है, इसके लिए वे धन्यवादके पात्र हैं।]

- जोधपुर; विन मि . “सीताराम लालस चसंत पंचसी, थि० सं० २०१८

सहायक ग्रंथों की सूची

लेटर सुगल्स- इविन

उदयपुर राज्य का इतिहास- डॉ० गौरीशंकर हीराचंद ओका कृत भांग १,

शऔरंगजेवर्नांमा- मुन्शी देवीप्रसाद

जोधपुर राज्य का इतिहास- डॉ० गौरीशंकर हीराचंद ओफा कृत भांग १,

जोधपुर राज्य की व्यात- (हस्तलिखित) हमारे संग्रह से

तवारीखे पालनपुर- संयद गुलावमियां कृत

दयालदास की ख्यात- सिढायच दयालदास कृत, भाग २-डॉ० दशरथ श्वार्मा द्वारा संपादित, अनुप संस्कृत लायबेरी, बीकानेर द्वारा प्रकाशित

नैणती महणोत की ख्यात- काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित, खंड १,

नैशसी मुहणोत की रु्यात- राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर द्वारा प्रकाशित

टॉड राजस्थान- हिंदी श्रनुवादक पं० वलदेवप्रसाद मिश्र, भाग १,

पालनपुर राज्य नो इतिहास- (गुजराती) भाग १, नवाब सरताले मुहमंदखां कृत

सारबांड का इधिहास- पं० विश्वेश्वरनाथ रेऊ, प्रथम भाग

सारबाड़ का संक्षिप्त इतिहास- पं० रामकरण आरसोपा

राजरूपक- वीरभांण रतनूं कृत

राजविलास- मात कवि कृत (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी का संस्करण)

वंद्भास्क र-