आर्य्य सिद्धान्त विमर्झ

भा० आरय-अनिनिधि सभा, देशली |

ओपष्म आर्य सिद्धान्त विमश्ञ

[ प्रथम आर्य्य-वि्वत्सम्मेलन में पठित निबन्ध ]

सम्मेलन तिथि--१& से २णै.कक्टैबर सन्‌ १६३४ तक

सावदेशिक अ० भा० आर्य्य-पतिनिधि सभा, देहली हारा प्रकाशित |

प्रथम घार ) सम्बत्‌ १६६० विक्रमी १॥)

१७००

भूमिका

वैदिक धम, प्रकार की दृष्टि से दाशनिक धर्म है, उसकी प्रत्येक शिक्षा दर्शन और विज्ञान से समथित है ऐसा होते हुए भी, आय समाज के पुरुपाथ का तुच्छ भाग भी उत्कृष्ट साहित्य के पेंदा करने में व्यय नहीं हाता | इस बात को लक्ष्य में रखकर अनेक बार विचार किया गया कि इस त्रटि की पूति करने के लिए सब से पहल किस साधन का काम में लाया जावे अनेक विद्या प्रेमियों के साथ सलाह भी की गई ओर अन्त में सब की सम्मति से निश्चय किया गया कि “सावदेशिक विद्रत आये सम्मेलन” का आयेजन किया जाय | सावदेशिक सभा की अंतरंग सभा में भी यह विपय पेश किया गया ओर प्रतिप्ठित सभा के विद्वान सदस्यों ने भी इस ये।जना का स्वीकार किया। प्रशंसित सभा के विद्या प्रेमी पुस्तका- ध्यक्ष ला० ज्ञानचंद जी ठेकेदार ने पहले सम्मेलन का समस्त व्यय देना स्वीकार किया--सम्मेलन बुलाया गया और उसमे अनेक विद्वानों ने भिन्न-भिन्न विषयों पर अपने अपने निबंध सुनाय और उन पर वादानुवाद भी हुआ। सम्मेलन की बेठक लगातार चार

[ ]

दिन तक होती रही सम्मेलन, अन्त में उत्तमत्ता

के हृदयों में अपनी लोकप्रियता की छाया छोड़ता हुआ «

ओर सभी उपस्थित विद्वानों ने इच्छा प्रकट की कि सम्मेलन स्थिरता का रूप दिया जावे। अस्तु | उसी सम्मेलन में पढ़े . कतिपय विद्वानों के निबन्ध विद्या-प्रेमी पाठकों की भेट किये जा हैं और आशा की जाती है कि उनसे अधिक लाभ उठाय' जायगा

बलिदान भत्रन, देहती। | नारायण स्वामी

विंषय-सू चो

विषय लेखक पृ० सं० १) स््रागताध्यक्ष का भाषण. श्री लाछा ज्ञान चन्द्र्मी | २) उपोद्धघात-- श्री महात्मा नारायण वद्‌ का आविभोतर ओर स्वामी जी महाराज उनके समभने का प्रकार ४६ (३) ऋषि दयानन्द्‌ की श्री पं० घमदेवजी वेद भाष्य शेली सिद्धान्त'ल क्र, विद्या

वाचस्पति, मंगलोर

४) बेद ओर पश्चिमी विज्ञान. श्री पं० बह्मानन्द जी ७९ आयुवद शिरोमणि सनात +,गुरुकुल वृन्द्वान |

५) वेद्कि ऋषि श्रं। स्व॒ मी वेदानन्दजी, (२ तीथ॑ ) वेद्‌ में इतिहास श्रें। प० वेपाल दत्त जी १७५ प।स्त्रा «. के २३४७ ') जाति-विवचना श्री पं० इंश्वरचन्द्र भी

शास्त्री २५३

[ ]

सं० - विषय लेखक पृ० सं० (८ ) वेद और निरुक्त श्री पं० ब्रह्मदत्त जी

जिज्ञासु, रामलाल कपर-

टूस्ट, अनारकली, छाहौर।. २८८

(९) निरुक्तकार और वे द्‌ में

इतिहास ३७१ (१०) क्‍या वैदिक ऋषि मन्त्र श्री ब्र० युधिष्टिर जी,

रचयिता थे ? विरजाननद आश्रम ४७२७

श्रथम आये-विद्वृत्सम्मेलन

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स्वागताध्यक्ष श्री० लाला ज्ञानचन्द जी आसय्य का भाषण

पृज्य प्रधानजी तथा माननीय विद्वद्वृन्द !

में अपनी तथा देहली-निवासी आय समुदाय की ओर से आपका सहपे हार्दिक स्वागत करता हूँ। आप सब महानुभावों का सम्रेस तथा सादर सत्कार करता हूँ इसमें सन्देह नहीं है कि भाषा का पण्डित होने के कारण में ऐसे शब्दों में आपका स्वागत करने में असमथ हूँ जो कि आपके यथोचित सान, प्रतिष्ठा के लिए उचित हों। परन्तु मुझे तो इसमें भी सन्देह है कि

प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

मैं किसी प्रकार के भी शब्दों से अपने उस हपे, प्रेम ओर आदर को प्रकट कर सकता हूँ, जो कि आपका स्वागत करने के लिये मरे हृदय में हैं क्‍योंकि प्रेम ओर हपे के समय तो मनुष्य शब्द-शाख्र का पण्डित होते हुए भो गदुगद होकर मुग्ध सा हो जाता है। सच्चे प्रेम ओर आदर का प्रमाण शब्दों से नहीं, प्रत्युत अपने व्यवहार से ही दिया जा सकता हे

में तो सावदेशिक सभा का आभारी हूँ कि जिसकी कृपा से मुझे यह सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। में तो इसमें अपना सौभाग्य सममता हूँ यह हो सकता हे कि हम देहली- निवासी हृदय से चाहते हुए भी आपके योग्य सम्मान देने ओर यथोचित आतिथ्य करने में कृतकाये हो सके, परन्तु उसका कारण भी हमारी भूल अथवा अयोग्यता ही होगी, कि प्रेम और उत्साह की न्‍्यूनता अतः यदि सेवा ओर सत्कार करने में कोई त्रुटि रह जाय तो आशा है कि आप महानुभाव उसको क्षमा कर गे

उद्देश्य

मरी समझ में इस सम्मेलन का उद्देश्य यह हे कि आय विद्वानों के पारस्परिक स्वतन्त्र विचार करने से वेदिक सिद्धान्तों तथा वैदिक-धम्मे-सम्बन्धी कठिन समस्याओं का निणय होकर

निर्णीत यथाथे ज्ञान की उपलब्धि हो, जिसके श्रवण, मनन, निदि- ध्यासन से आय जनता के विचार ओर आचार सत्य, शुद्ध,

स्वागताध्यक्ष का भापण रे

निश्चित ओर #ढ हों, उनके मनन्‍्तव्यां ओर कत्तव्यों के भेद दूर होकर उनमें एक्रता हो ओर आयसमाज मे उत्कृष्ट साहित्य पेदा हो जो सज्जन मत-मतानतरों के अ्रमात्मक तथा द्वंप-जनक क्ुद्र मन्तव्यों ओर कतव्यां से निराश हो कर धर्म से भी विमुख हो गये हैं उनके सामने वैदिक धर्म की यथाथंता, साबजनिकता, उपयोगिता तथा आवश्यकता प्रकट हो, ताकि उनमें भी बैद्दिक धम अथवा मानवी धमे का प्रचार हो ऋषि दयानन्द-क्रृत भाष्य तथा ग्रन्थों का वास्तविक भाव जनता के सामने आये ओर उसके सम्बन्ध में होनेवाली आशह्लाओं का निवारण किया जाय, इत्यादि इत्यादि

विचार-स्वातन्द्रथ ओर आयसमाज

सम्मेलन के उपयुक्त उद्देश्य में मेंने विद्वानों के जिस पार- स्परिक विचार को यथाथ्र ज्ञान उपलब्धि का साधन बतलाया है, उसके सम्बन्ध में यह प्रश्न किया जा सकता है कि इस समय जो वेडिक सिद्धान्त आयेसमाज ने मान रखे हैं, उनमे परिवतन भी हो सकता है या नहीं यदि सिद्धान्त निर्णीत और यथाथ हें ओर उनमें परिवतन नहीं हो सकता, तो फिर सम्मेलन की क्‍या आवश्यकता है। यद्यपि इसका स्पष्ट उत्तर देना विशेष कर ऐसे आयसमाजी के लिये बड़ा ही कठिन है जो कि आयसमाज के सिद्धान्तों को निर्णीत और यथाथ सममना हो; परन्तु सम्मेलन की आवश्यकता ओर उपयोगिता को भी अनुभव करता हो,

प्रथम आये-विद्वत्सम्मलन

रा

तथापि आयसमाज के नियम, धारा अर्थात्‌ “सत्य ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सबदा उद्यत रहना चाहिये”, के आधार पर बिना संकोच यह कहा जा सकता है कि परिवतन सम्भव भी है, ओर असम्भव भी सम्भव उनमें कि जिनके रूप में मानवी अआ्रान्त बुद्धि के हस्तक्षेप से अन्तर गया हो, असम्भव उनमें जो कि अभीतक निश्नान्‍्त अर्थात्‌ नेसगिक सत्यों (९५(एा७)। 70४॥) के रूप में ही विद्यमान हों इसके अतिरिक्त स्मात विचारों ओर आचारों में भी काल ओर अवस्थाओं के अनुकूल परिवतन और समय समय पर सप्तक्तियों की श्रान्ति तथा सन्देहों ओर विपक्षियों के आक्षेपों के निवारण की भी आवश्यकता रहती है। अतः इन सब्र कार्यों की पृति के लिये विचार-श्वद्धला को जारी रखने के वास्त विद्वतू-सम्मेलन की अत्यन्त आवश्यकता हे

उपयुक्त उत्तर के मिलने के पश्चात्‌ किर यह प्रश्न होता है कि सम्मेलन में जो कुछ विचार होगा वह आयसमाज के माने हुए वेदिक सिद्धान्तों के बन्धन में बँधे रहकर केवल उनकी पुष्टि करने तक ही सीमित होगा, अथवा विद्वान्‌ विचार करने में बिलकुल स्वतन्त्र होंगे, यदि बन्धन में बंधे रह कर ही यह विचार होगा, तब तक तो इसका कोई विशेष लाभ और नियम धारा का अभिप्राय भी पूरा नहीं हो सकेगा, साधारणतया इसका यह उत्तर बड़ी सुगमता ओर शीघ्रता से दिया जा सकता है, कि विद्वान्‌

स्वागताध्यक्ष का भाषण मे

विचार करने में अवश्य स्वतन्त्र हैं| क्योंकि आयेसमाज समूह- रूपेण विचार-स्वातन्त्रय का मानने वाला है परन्तु विचार करने पर प्रतीत होगा, कि यह प्रश्न भी इतना सुगम नहीं है कि जितना सुगम इसको समझकर ऊपर का उत्तर दिया गया है। क्योंकि आयसमाजियों में विचार-स्वातन्क््य का विषय भी निर्विवाद नहीं बल्कि विवादास्पद है, अथवा आयेसमाजिया में भी विचार- स्वातन्त््य का अभिप्राय सममने में मतभेद है। इन मतभेद वालों को मुख्यतया चार प्रकार की निम्न श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।

९. प्रथम श्रेणी में वे सज्जन हैं जो कि विचार-स्वातन्त्र्य का यह अभिप्राय लेते हैं, कि आयेसमाजी अपने विचार रखने में बिलकुल स्वतन्त्र हैं वह चाहे किसी प्रकार के भी अपने विचार क्यों रक्खें, यदि वह आयेसमाज की आचार-पद्धति अथवा सदाचार के विरुद्ध आचरण नहीं करते तो वे आयेसमाज के सभासद रह सकते हैं। कोई सभासद केवल विचार-विभिन्नता के कारण समाज से प्रथक्‌ किए जाने का दण्डनीय नहीं हो सकता, क्योंकि वेदिक धमे आचार पर उचित बन्धन लगाते हुए भी मनुष्य की बुद्धि, ओर विचारों को पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। विचारों की परतन्त्रता दूसरे शब्दों में दिमागी गुलामी है, कि जिसका ऋषि दयानन्द ने भी बलपूवक विरोध किया है इसलिए आयेसमाज को अपने सिद्धान्तों के मनवाने पर अधिक बल

& प्रथम आय-विद्वत्सम्मेलन

नहीं देना चाहिये क्‍योंकि इससे स्व॒तन्त्र विचारों के सज्जन आयेसमाज में प्रविष्ट नहीं हो सकते। यदि आयेसमाज इसके विपरीत अपने सभासदों को विशेष मन्तव्यों के मानने के लिए बाधित करेगा, तो इससे आयेसमाज को हानि पहुँचेगी, और आयेसमाज भी एक प्रकार के विशेष मन्तव्यों के मानने वाला सम्प्रदाय बन जायगा।

२. द्वितीय श्रेणी में वे भाई हें जो कि विचार-स्वातन्त्रय के अतिरिक्त आचार-स्वातन्त्रय के भी पोषक हैं। इनके विचार में आयेसमाज एक हस्पताल है कि जिसमें विचार ओर आचार हीनता के रोगियों को रहने का भी अधिकार हे इसलिए केवल यह कि भिन्न-भिन्न विचार रखने वाले ही आयेसमाज में रह सकते हैं, बल्कि भिन्न-भिन्न आचार रखने तथा आचार-हीन हो जाने वाले भी आयंसमाज की सभासदी से नहीं हटाये जा सकते, अथवा यों समम्िए कि इनका सत है कि जो मनुष्य एक बार आये-समाज में प्रविष्ट हो चुके हैं वे स्‍्व्यम॒ तो आये-समाज को छोड़ सकते हैं, परन्तु विचार ओर आचार विभिन्नता तथा हीनता आदि कोइ भी ऐसा ओर कारण बिना मृत्यु के नहीं हे, कि जिससे समाज इनको अपने में से निकाल सके |

३. तृतीय श्रेणी वाले भाइयों का मत है कि विचार-स्वातन्त्रय का उपयुक्त अथ ठीक नहीं है क्‍योंकि आयेसमाज की जहाँ

स्वागताध्यकज्षञ का भापण

अपनी आचार-पद्धति है वहाँ उसके अपने कुछ मोलिक सिद्धान्त भी हैं, जिनका आचरण करना और मानना आर्यसमाजियों के लिए अनिवाये है। जैसे कि आयेसमाज के नियमों में वशित इेश्वर को सबचिदानन्द तथा निराकार आदि मानना और वेद का पढ़ना-पढ़ाना आदि है।

इनका कथन है कि मुख्य सिद्धान्तों को छोड़ कर गोण सिद्धान्तों में मतभेद होने पर भी आये-समाज का सभासद रह सकता है | इनमें से कुछ भाई वेदों को अपोरुषेय मानने के सिद्धान्त को भी गौण सममते हैं, इनका खयाल है कि ऋषि दयानन्द ने भी वेद को अपोरुषेय मानना अनिवाये नहीं बतलाया

9. चतुथ श्रेणी के वे महाशय हैं, जो कि आयेसमाज के प्रवत्तक ऋषि के बतलाये वैदिक मन्तव्यों ओर कत्तव्यों में ननु नच की गुजायश ही नहीं सममते | वे ऋषि दयानन्द के लिखे हुए प्रत्येक अक्षर को ही श्रुति की भाँति सत्य मानते हैं। इनका मन है कि अत्येक आयेसमाजी के लिए यह अनिवाये हे, कि वह ऋषि के बतलाये छोटे-बड़े सभी वैदिक सिद्धान्तों ओर कतव्यों को पूणतया ज्यों का त्यों मानें, जो आयेसमाजी ऐसा नहीं करता वह आयेसमाज में नहीं रह सकता यदि कोई आयेसमाजो ऋषि के किसी विचार के विपरीत अपना बिचार

प्रथम आय-बविद्व त्सम्मेलन

3 ४. ५४८४७. सी पट शक तु

प्रकट करता है तो उनके नज़दीक वह बागी ओर अगराधी है। वह उसके आये-समाजी रहते हुए ऐसा करने की इजाज़त नहीं देते ऐसे भाइयों के प्रकोप से डरत हुए ऋषि के कुछ एक निजी विचारों से मतभेद रखने वाले विचार-स्वातन्त्रय के पत्षपाती भी अपने विचार प्रकट करने का साहस नहीं कर सकते। इन भाइयों के व्यवहार को दृष्टि में रखने हुए इनके पत्ष में विचार-स्वातन्त्रय का यही अभिप्राय हो सकता है कि आये-समाज से बाहर के लोग तो आये-समाज के माने हुए मन्तव्यों और कतब्यों की कड़ी से कड्ठी समालोचना तथा इनसे मतभेद प्रकट करने वा कहने में पूण| स्वतन्त्र हैं ओर इसी तरह आयेसमाजी भी अन्य मतवादियों के विरुढठ आचार विचार रखते हुए उनकी स्वतन्त्रता- पृवक समालोचना कर सकते हैं; परन्तु अपने माने हुए मन्तव्यों अथवा सिद्धान्तों के सम्बन्ध में विचार करने के लिए आये- समाजियों की स्वतन्त्रता सीमित है इत्यादि इत्यादि यद्यपि उपयुक्त मतभेद की विचार स्वातन्त्रय के वास्तविक अथ की दृष्टि से समालोचना करना अथवा उनके यथाथ, अयथाथ होने की व्यवस्था देना विद्वतू-मण्डल का ही काम है ; मेरे जैसे साधारण व्यक्ति का नहीं। तथापि इस समय विचार-स्वातन्त्र्य सम्बन्धी मतभेद को प्रकट करके अपने आप को तटस्थ रखना भी केवल यह कि उचित ही प्रतीत नहीं होता, बल्कि यथाबुद्धि अपनी सम्मति प्रकट करना मेरे लिये आवश्यक हो जाता है |

स्वागताध्यक्ष का भापण

अतः निवेदन है कि मरी सम्मति में आयेसमाज के विचार-स्वातन्त्रय के पोपक होने के यह अथे कदापि नहीं हो सकते, कि इसके सभा- सद्‌ जिस प्रकार के चाहें अपने विचार रकखें, अथवा नास्तिक, आएस्तिक, एकेश्वरवादी, अनेकेश्वरवादी, ज्ञान, गड्जा स्नान, तथा मद्यगन से मुक्ति ओर, वेद, बाइबिल कुरान को इश्वरीय ज्ञान मानने वाले आदि परम्पर विरोधी विचारों के रखने वाले भी आये- समाज के सभासद रह सकते हैं, क्योंकि आयेसमाज के उपनियम धारा के अनुसार वही मनुष्य आयेसमाज के सभासद बने रह सकते हैं जो कि उसके नियमों में बशन किये गए मोलिक विचारों अथवा मन्तव्यों ओर आचारों को मानें, ओर आचरण में लायें नास्तिक, वेद-बिरोधी और मूति-पूजक आदि आर्यसमाज के सभासद वेसे ही बन सकते हैं, रह सकते हैं जैसे कि शरात्र पीने वाले टेम्परेन्स सुसाइटी के आयेसमाज टैनिस क्लब तथा फ्री मेसन सुसाइटी जेसी कोई क्लब सुसाइटी नहीं है कि उसमें इकट्र॒ होने वालों की क्लब लोज-सम्बन्धी क्रियापद्धति तो समान हो ओर धार्मिक विचार भिन्न-भिन्न भी हो सकें।

भिन्न-भिन्न विरोधी विचार वालों को आयेसमाज का सभासद मानना दूसरे शब्दों में आयेसमाज को बेअसूला मानना हे आयेसमाज में जो समाज शब्द आता है, वह किसी दूसरे नियम रहित समाज में आये समाज शब्द की भाँति साधारण

१० प्रथम आये-विद्व त्सम्मेलन

अर्थो' में नहीं, बल्कि विशेष अरथो' में आता है। क्‍योंकि वह नियमबद्ध ओर संगठनशील समाज हे। इसके अपने मोलिक नियम ओर सिद्धान्त हैं इनके मानने वाले ही इस के सभासद रह सकते हैं समाज शास्त्र के विद्वान इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि भिन्न-भिन्न अथवा विरोधी विचारों- वाले मनुष्यों के समूह से कभी कोई नियमबद्ध ओर संगठनशील समाज बन ओर संगठित रह ही नहीं सकता, ओर इनकी अधिक से अधिक संख्या होने पर भी इनका कोइ सामाजिक बल हो सकता है। चाहे वह सोशल, पोलिटिकल और धामिक, कोई भी समाज क्‍यों हो, केवल निश्चित मन्तव्य ओर कतव्य ही हैं जों किसी नियमबड्ध समाज को बना, दृढ़ और संगठित रख सकते हैं। यह तो हो सकता है कवि कोई नियमबद्ध संगठन- शील समाज भी अपने किसी नियम सिद्धान्त को अशुद्ध ओर अनुपयोगी जान कर बदल दे, परन्तु यह कदाप्रि नहीं हो सकता कि भिन्न-भिन्न तथा विरोधी विचारों वा निश्चित मन्तव्यों के रखन वाले परस्पर संगठित रह कर किसी नियमबद्ध समाज को बना और संगठित रख सके | यरि केवल आचाग्पद्धति के अनुकूल आचारण अथवा सदाचार को ही आयंसमाज के सभासद रहने का नियम मानेंगे, तो इस नियम की अतिव्याप्ति संसार भरके मत-मतान्तरों में रहने वाले सदाचारी मनुष्यों में हो जायगी, क्‍योंकि आयेसमाज की आचारपद्धति

स्वागताध्यक्ष का भाषण ११

सावभौम सदाचार (आलमगीर अखलाक़) के अनुरूप है, तो क्या वे आयेसमाज के सभासद समभे या बनाये जा सकेंगे एसा मानना वास्तविकता से आँखें मूंदना है। सदाचारी होने के कारण इस अंश में वे आये तो हो सकते हैं; परन्तु आयेसमाजी अथवा आयेसमाज के सभासद नहीं हे। सकते

मुझे यह मालूम नहीं, कि विचारों में स्वतन्त्रता और आचारों में परतन्त्रता मानने वाले भाई किस हेतु के आधार पर यह मानते हैं, कि वैदिक धम्म॑ मनुष्य के आचारों पर तो बन्धन लगाता है ओर विचारों अथवा वुद्धि पर नहीं। दूसरे शब्दों में वैदिक धमे मानसिक गुलामी का तो समथक है, किन्तु दिमागी गुलामी का नहीं। यदि इनका यह खयाल हो कि मनुष्य के विचार करने ओर रखने की जो जन्मसिद्ध स्वतन्त्रता है, वह इसके किसी समाज का सभासद ओर धमे का अनुयायी होने पर भी रहनी चाहिये जो समाज धमे इस स्वतन्त्रता पर बन्धन लगाता है, वह बविचार-स्वातन्त्य का समथक नहीं हो सकता, तो वे फिर यह भी नहीं कह सकते कि आचारों पर बन्धन लगाना उचित हे। क्‍योंकि फिर तो उन्हें यही मानना पड़ेगा कि समाज धर्म को अपने सभासदों ओर अनुयायियों के विचारों पर ही नहीं; बल्कि आचारों पर भी बन्धन नहीं लगाना चाहिये | क्‍योंकि मनुष्य को शुभाशुभ आदि कम करने की भी तो जन्मसिद्ध स्वतन्त्रता प्राप्त हे, फिर इसकी यह

१२ प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

कु ध्जथ रे री री

स्वतन्त्रता क्यों छीनी जाय ? और यदि सामाजिक तथा धामिक मर्यादा की प्रवृत्ति और रक्षा के लिए समाज और घधमे का आचारों पर बन्धन लगाना उचित है, तो इनका विचारों पर भी बन्धन लगाना उचित ही नहीं बल्कि आवश्यक है। क्‍योंकि आयेसमाज तथा वैदिक धमे की विचार-पद्धति का उसकी आचार पद्धति से बैसा ही घनिष्ठ तथा नैसर्गिक सम्बन्ध हे जैसा कि, मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों का उसकी करमेंन्द्रियों से; इसलिये इनको एक दूसरे से प्रथक किया ही नहीं जा सकता। इनको एक दूसरे से प्रथक्‌ समझना इनके स्वरूप से अनभिज्ञता प्रकट करना है। यदि यह प्रथक हो जायें तो दोनों ही व्यथ होजायेँ। वैदिक धर्म केवल आचारों पर ही बन्धन नहीं लगाता, बल्कि विचारों पर भी उनके सत्य, शुद्ध, ओर पवित्र होने का बन्धन लगाता है क्‍योंकि आचारों की भाँति विचार भी सत्यासत्य, तथा श्रेयस्कर और भयंकर हो सकते हैं परन्तु इस प्रकार अपने सभासदों पर विशेष मन्तव्यों कतव्यों के मानने करने का बन्धन लगाने पर भी आयेसमाज सम्प्रदाय नहीं बन सकता, क्योंकि सत्य ओर व्यापक मन्तव्यों का मानना सम्प्रदाय होने का लक्षण नहीं है, चाहे वे विशेष ही क्यों हों। यदि है तो काँग्रेस जैसे सावजनिक संगठन भी सम्प्रदाय बन जायँगे, क्योंकि इनके भी तो विशेष मन्तव्य होते हैं, और इनके मानने वाले ही उनके मेम्बर बने रह सकते हैं

स्वागताध्यक्ष का भाषण १३

5 रॉ

आयेसमाज के अस्तित्व का निभर सम्प्रदायों की भाँति किसी व्यक्ति-विशप तथा वुद्धिविरोधी विश्वासात्मक कुद्र साम्प्रदायिक विचारों और आचारों पर नहीं है, बल्कि वुद्धि-पृवक सावजनिक विचारों ओर आचारों पर है, इसलिये भी यह सम्प्रदाय नहीं है। ओर यदि इसके किसी विचार और आचार में परिवतन की आवश्यकता हो, तो, वह अपने नियम धारा के अनुसार उसे बदल भी सकता है। इसलिये जत्र तक आयेसमाज के नियमों में “सत्य-प्रहण करने ओर असत्य के छोड़ने में उद्यत रहना चाहिये” की धारा विद्यमान हे तब तक वह अन्ध विश्वासी सम्प्रदाय नहीं बन सकता

दूसरी श्रेणी वाले भाइयों का कथन तो आयेसमाज के संगठन के नियमों तथा वेड्कि शिक्षा के ही विरुद्ध है, क्‍योंकि आयसमाज के उपनियम धारा के अनुसार इसके सभा- सद दो श्रणियों मे विभक्त हें। एक आये जो कि नियमों को मानकर तदनुकूल आचरण करना रवीकार करके अभी आये- समाज में सम्मिलित हुए हैं | दूसरे आये सभासद जो कि अपनी आय का शतांश देते और सदाचारपृवक रहते हुए बोट देने के अधिकारी बन चुके हैं, यदि विचारा4 इस श्रेणी के महाशयों की इस अलोकिक परिभाषा को मान भी लिया जाय, कि आयेसमाज हस्पताल है तो भी इसको कंबल उसकी उपनियम धारा अनुसार बनी हुई आये श्रणी पर ही प्रयुक्त किया जा

१४ प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

जी

सकता है कि जिसने अभी उपनियम धारा के अनुसार आये- समाज के आचार-विचार की ओपधि का सेवन करके अपने को स्वस्थ ओर योग्य बनाते हुए आय सभासदों की श्रेणी में परिणत होना है, कि खस्थ आये सभासदों की श्रेणी पर आये श्रेणी में भी वही जिज्ञासु अर्थात्‌ आध्यात्मिक स्वा- स्थ्य के इच्छुक रोगी ही रह सकते हैं, जो कि असाध्य तथा छूत रोग के रोगी हों। जो भयंकर विचार तथा दुराचार रूपी प्लेगादि किसी असाध्य तथा छूत की बीमारी में ग्रस्त हों उन्हें तो आध्यात्मिक स्वास्थ्य के नियम उपनियम धारा के अनुसार उपनियम धारा के सेनीटोरियम से भी प्रथक करना ही श्रेय- स्कर होगा ताकि वे दूसरों में भी वबा फैला सकें, और यदि इस प्रकार के आचारहीन भी आयेसमाज से प्रथक नहीं किए जा सकते तब या तो आयेसमाज का नाम बदल कर उसका नाम आयदस्यु-समाज रखना होगा, क्योंकि ऋ० १०९२८ के मंत्र “अकर्मादस्यु रभिनो अमन्तु रन्यत्रतो अमानुपः ।” में ऐसे ही आदमियों को दस्यु कहा है अथवा उपयुक्त विचार के महाशयों को ऐसे रोगियों के लिग अपना कारए्टीन आयेसमाज से प्रथक बनाना होगा, इसके अतिरिक्त यदि उपयुक्त सम्मति को जीवन के इस अत्यन्त आवश्यक नेसर्गिक नियम की कसौटी पर भी जाँचेंगे कि जीवित शरीर वही हो सकता है जिसमें पाचन तथा विरेचन दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हों, तो यही ज्ञात

स्वागताध्यक्ष का भाषण ५५

होगा कि उपयुक्त सम्मति वाले महाशय जीवित जाग्रत आये- समाज को अपनी सम्मति से जीवित नहीं किन्तु मत बतला रहे हैं | क्योंकि जीवित तथा स्वस्थ शरीर और समाज बही हो सकता है, कि जो अनुकूल को अपने में जज़्ब कर ले और प्रति- कूल को बाहर निकाल दे | जो शरीर समाज बिरोधी माद्दे को भी अपने में से बाहर नहीं निकाल सकता वह मत है। अथवा अपनी शक्तिहीनता की घन्टी से मृत्यु का आह्वान कर रहा है

तीसरी श्रेणी के भाइयों का यह कहना भी ठीक नहीं है कि ऋषि दयानन्द ने वेदों को अपोरुपय मानना अनिवायय नहीं बतलाया क्योंकि आयेसमाजियों के लिए आयेसमाज के सारे नियमों का मानना अनिवाये है, ओर उसमें से नियम धारा को मिलाकर पढ़ने से पता लगता है कि नियम धारा में इश्वर को जिन सब सत्य विद्याओं का मूल कारण बतलाया है, नियम धारा तीन में वेदों को उन्हीं सब सत्य विद्याओं का पुस्तक माना हे, जिससे स्पष्ट हे कि वेद इश्वरीय ज्ञान अथवा अपोरुषेय हैं। इसके अतिरिक्त ऋषि स्वमन्तव्यामन्तव्य के दूसरे मन्तव्य में भी वेदों को निर्श्रान्त ओर इश्वर-प्रणीत माना है।

चतुथ श्रेणी के महाशयों का मुख्य और गोण तथा श्रुति ओर स्मृति में भेद करना अथवा आयेसमाज के आचाये के

१६ प्रथम आये-विद्व त्सम्मेलन

निजी लेखों को भी वेद-बाक्यों के सटश ही सममना भी भूल है। क्‍योंकि ऋषि दयानन्द के निजी लेख श्रुति नहीं प्रत्युत स्मृति रूप हैं, वे भी अन्य स्मृतियों के लेखों की भाँन्ति वेदानुकूल ओर बुद्धि-यूवक होने पर ही ग्राहद्मय हें। ऋषि के जो लेख विशेष सम्प्रदायों, अवस्थाओं ओर सामयिक रस्म रिवाज आदि से सम्बद्ध हैं, उनकी श्रुति की भाँति सावजनिक, सावदेशिक और सावकालिक उपयोगिता भी नहीं हो सकती |

चूँकि गोण मन्तव्यों में आर्यंसमाज जैसे विचारशील समाज के स्वतन्त्र विचारक सभासदों में कुछ कुछ विचार-भेद होना आवश्यक ही है, इसलिए इनको सभासद रहने रहने का हेतु बनाया ही नहीं जा सकता। मेरे उपयुक्त कथन का अभिप्राय कदापि यह नहीं हे, कि आयेसमाज ने आयेसमाजियों को बुद्धि ओर मन पर विशेष विचारों ओर आचारों के बन्धन का ताला लगा दिया है ओर वे स्वतन्त्रता से इनके सम्बन्ध में विचार कर ही नहीं सकते अथवा सखतन्‍्त्र बुद्धि से इन पर विचार करना कुफ़ है। या यह भी कि वह आयसमाज को छोड़ ही नहीं सकते अथवा छोड़ने पर काबिलेकत्ल हें क्लोर ऋषि दयानन्द के निजी लेख मानने के योग्य ही नहीं हैं

बल्कि मेरा अभिप्राय इस वक्तव्य से यह है, कि जहाँ यह मानना स्वतन्त्रता की सीमा को उलइन करके उच्छु खलता को

स्वागताध्यत्त का भाषण १७

प्राप्त होता है, कि आर्यसमाजी आ;ने विचार रखने में बिलकुल स्वतन्त्र हैं, जिस प्रकार के चाहे, अपने विचार अथवा मन्तव्य सिद्धान्त रख सकते हैं | वहाँ यह कथन भी आयेसमाज को अन्य सम्प्रदायों की भाँति अन्धविश्वासी ठहराता है कि आये- समाजियों के लिए ऋषि दयानन्ठ के लिखे हुए प्रत्येक अक्षर का ज्यों का त्यों मानना अनिवाय है | क्‍योंकि तो विचार-स्वातन्ध्य के अथ उच्छु खलता तथा निरकुश होने के हैं ओर नहीं बिना सोच समझे ऋषि दयानन्द के लेखों के प्रत्येक अक्षर को मान लेना विचार-स्वातन्भ्य के अनुकूल हे

मरी सम्मति में विचार-स्वातन्त्य का अभिप्राय विचार करने रखने में स्वतन्त्र होने के हें। वेरिक घर्मे तथा आयेसमाज का कोई नियम उसका बाधक नही है। इसलिए प्रत्येक आयेसमाजों जहाँ मत-मतान्तरों के मन्‍्तव्यों ओर कतव्यों की सत्यासत्यता के सम्बन्ध में स्व॒तन्त्रता-पयूवक विचार कर सकता है वहाँ वह वेदों ओर ऋषि दयानन्द के लेखों तथा आयेसमाज के मन्तव्यों और कतव्यों के सम्बन्ध में भी येसा ही विचार करने में स्वतन्त्र हे यही विचार-स्वातन्भ्य का गुण है, जो कि आयेसमाज को सम्प्र- दायों से ऊँचा और जीवित रख सकता है। यह विचार- स्वतन्त्रता का गुण आर्यंसमाजियों को इस बात की पूण स्वतन्त्रता देता है कि यदि किसी भाई को विचार करने पर आयेसमाज के मोलिक नियमों अथवा मन्तव्यों ओर कतव्यों

श्द प्रथम आये-विद्व त्सम्मेलन

की सत्यता में सन्देह हो, तो वह आयेसमाज में रहता हुआ हो आये विद्वानों से मिल कर अपने सन्देह दूर करने का यत्न करे। ओर यदि उनसे इसके सन्देह दूर हो सके, बल्कि इसके विपरीत इसके अपने विचार सत्य निश्चत हो जाएं तो वह उनमें परिवतन कराने का यत्न करे ओर यदि समाज उसके साथ सह- मत हो, तो वह अपने विचार बदल ओर आयेसमाज को छोड़ सकता है। परन्तु आयेसमाज में रहते हुए आयेसमाज के मुख्य ओर मोलिक विचारों, सिद्धान्तों ओर आचारों के विरुद्ध अपने विचार और आचार नहीं रख सकता ओर ही उनका प्रचार कर सकता है। क्योंकि इसका ऐसा करना समाज- संगठन के नियमों के विरुद्ध है विचार-स्ातन्त्र्य शब्दों के अथ भी यह कदापि नहीं हो सकते, कि किसी समाज के नियमों अथवा मन्तव्यों ओर कतव्यों के विरुद्ध स्वतन्त्र विचार ओर आचार रखनेवाला मनुष्य भी उस समाज का सभासद रह सकता है मेरा अभिप्राय निम्नलिखित उदाहरणों से और भी स्पष्ट हो जायगा चूँकि आयेसमाज एक नियमबद्ध समाज है। इस प्रकार नियम बद्ध कि जिस प्रकार सृष्टि नियमबद्ध है इसके अस्तित्व को स्थिर ओर संगठित रखने के हेतु वैसे ही इसके मोलिक नियम हें जैसे कि रष्टि को स्थिर ओर संगठित रखने के हेतु इसके नियम | आर्यसमाज में रहते हुए आयेसमाजी आये- समाज के मनन्‍्तव्यों के सममने तथा उनके सत्यात्य होने के

स्वागताध्यक्ष का भापण १९

सम्बन्ध में वेसे ही ख्व॒तन्त्रता से विचार कर सकते हैं, जैसे कि सृष्टि में रहत हुए मनुष्य सथ्टिनियर्मों के समझने ओर उनकी सत्यता, असत्यता को जाँचने में स्वतन्त्रता से विचार कर सकते हैं परन्तु जिस तरह मनुष्य पर मनुष्यत्व तथा प्राकृतिक नियमों के बन्धन हैं उसी तरह आयेसमाजियों पर भी सामाजिक नियमों का बन्धन है, यह दोनों इनके तोड़ने में तो खतन्त्र हैं परन्तु तोड़ने के फल से नहीं बच सकते। सथ्टिनियमों के तोड़ने बाले अपने भोतिक शरीर ओर सामाजिक नियमों को तोड़ने वाले अपनी सामाजिक स्थिति को स्थिर नहीं रख सकते

सम्भव है कि मेरे उपयुक्त कथन पर यह आशंका की जाय कि उसमें आयसमाज को विचार-स्वातन्त््य का मानने वाला भी बतलाया है, लेकिन यह भी कहा गया है, कि यदि आयेसमाज का कोई सभासद उसके माने हुए मौलिक नियमों ओर सिद्धान्तों को नहीं मानता तो वह आयेसमाज में नहीं रह सकता यह दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं क्योंकि यदि आयसमाज विचार- स्वातन्त्रय का मानने वाला है, तो भिन्न भिन्न विचार रखने वाले सभासद भी उसमें रह सकते हैं ओर यदि नहीं रह सकते तो वह विचार-स्वातन्त्य का मानने वाला नहीं हे इसके उत्तर में निवेदन है, कि विचार-स्वातन्त्य जिसका अथे विचारों की स्वतन्त्रता है इसका अभिप्राय विचार करने और रखने में स्वतन्त्र होने के तो

२० प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

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लिये जा सकते हैं, परन्तु विचार-स्वातन्त्र्य का यह अभिप्राय कदापि नहीं लिया जा सकता, कि स्व॒तन्त्र विचार रखने वाले किसी ऐसी समाज में भी रह सकते हें कि जिसके मोलिक ( जिनपर इस समाज का निर्माण हुआ हो ) नियमों अथात्‌

मन्तव्यों ओर कतंव्यों के विरुद्ध उसके विचार हों। क्‍योंकि समाज तो उन सभासदों के समूह का ही नाम होता हे, कि जिन्होंने समाज निर्माण के हेतु उसके मोलिक नियमों और सिद्धान्तों को स्वीकार किया है। यदि वह इनको मानें और अपने अपने स्वतन्त्र विचार रकक्‍खें तो वे समाज बना ही नहीं सकते; अथवा इनसे कोई समाज बन ही नहीं सकता दूसरे शब्दों में यों भी कह सकते हैं कि चू कि विचार-स्वातन्त्य का यह अभि- प्राय समाज-निर्माण शाखत्र के नियमों के ही विरुद्ध है, इसलिये सामाजिक संसार के लिये इसका प्रयोग में लाना ही असम्भव है समाज-शाम्र के विद्वान इस बात को भली भाँति जानते हैं, कि किसी समाज, की रक्षा, ख्थितता और हृढ़ता के लिये उसके सभासदों के समाज-सम्बन्धी विचारों ओर आचारों में समानता ओर दृढ़ता कितनी आवश्यक है। जो भाई यह कहते हैं, कि भिन्न भिन्न विचार रखने वाले भी आयेसमाज या किसी भी नियम- वद्ध समाज में रह सकते हैं वे भाई स्वतन्त्रता की धुन में समाज निर्माण शाम्र के नियमों को ही भूल जाते हैं जो कि उन्हें नहीं भूलन चाहिएं इसके अतिरिक्त इस अभिप्राय में यह भी दोष है,

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सागताध्यक्ष का भाषण

कि इससे स्वतन्त्र विचार रखने वाला व्यक्ति प्रत्येक समाज का अथवा सत्र समाजों का सभासर बन सकता है, परन्तु इसका क्रियात्मक रूप में लाना सम्भव ही नहीं है अतः जब यह कहा जाता है, कि आयेसमाज विचार-स्वातन्त््य का मानने वाला है, तो उसका अमभिप्राय यही होता है, कि उसके सभासद आय- समाज के मन्तव्यों ओर कतव्यों पर खतन्त्रता से विचार भी कर सकते हैं ओर आयेसमाज के मन्तव्यों का मानना छोड़ कर किसी अन्य समाज अथवा अन्य प्रकार के मन्तव्य मानने या रखने में भी स्वतन्त्र हैंन यह कि आयेसमाज में रहत हुए वह आयेसमाज के मोलिक मन्तव्यों ओर सिद्धान्तों के विरुद्ध अपने भिन्न भिन्न विचार भी रख सकते हें

मेने विचार-स्वातन्त्रय सम्बन्धी जिन चार श्रेणियों का ऊपर वन किया है, वह तो आयेसमाज के अन्तगत हैं उनके अति- रिक्त विचार-स्वातन्त्र्य के समथेकों की एक ओर भी श्रेणी है। जो कि है तो ग़र आयेसमाजी सज्ञनों की परन्तु चूंकि आयेसमाज का उससे मनुष्य-समाज के उत्थान के साधनों में मतभेद है इस- लिए आयेसमाज को उससे भी निपटना ओर उसे भी विचार- स्वातन्त््य का वास्तविक अर्थ बतलाना है, इसलिये उसकी ओर भी आप महानुभावों का ध्यान दिलाना आवश्यक सममता हूँ।

यह श्रेणी नबीनता तथा खतन्‍्त्रतावादियों की है जो कि प्राची- नता के कट्टर विरोधी हें; यद्यपि इस श्रेणी के लोग प्राचीनताबादियों

२२ प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

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के प्रतिदवन्दी हैं ओर ये दोनों दल दो विरोधी सीमाओं पर खड़े हैं तथापि इनमें परस्पर कुछ गंगा-जमनी समानतायें भी हैं जो कि इस प्रकार हैं कि यदि प्राचीनतावादी महाशय बिना सोचे-सममे अथवा सत्यासत्य की परीक्षा किये पुराने सब ग्रन्थों की हर एक बात को सत्य, साथेक ओर प्रामाणिक मानते हैं, तो नवीनतावादी भी बिना पढ़े ओर सोचे विचार ही उनसे विपरीत उन सब ग्रन्थों को निरथक और अप्रमाणिक सममने हैं। यदि प्राचीनतावादी विश्वास के धनी हैं, तो नवीनतावादी अविश्वास तथा धुन के धनी हैं यह दोनों ही प्राचीन ग्रन्थों पर बुद्धि पूबक विचार नहीं करते नवीनता-बवादी महाशय तो ग्राचीनता और साम्प्रदायि- कता के द्वेप तथा नवीनता स्वतन्त्रता के आवेश में इतने मुग्ध हुए हैं कि अहर्निश क्रान्ति क्रान्ति का जाप करते हुये, केवल यह कि वेदादि शास्त्रों की बात सुनना ही नहीं चाहते, बल्कि उन्हें क्रान्ति द्वारा संसार से ही मिटा देना चाहते हैं। इनकी यह मनो- वृत्ति नीच उद्धृत किये हुए इनके हृदय के उद्गारों से स्पष्ट विदित है

“यहाँ क्रान्ति तमी होगी जब सबसे पहले हम वेद सब इलमी फुनून का ग्वज़ाना है, इस आतिल यक्ीन पर कुल्हाड़ा चलावेंगें। मुसलमानों में हरगिज़ कोई सुधार नहीं हो सकता जब तक बह कुरान को इल्हामी ही मानते रहेंगे। श्रुति का ढकोसला, शरियत का हव्वा हमारी तरक्की का कट्टर दुश्मन है योरुप में

स्वागताध्यक्ष का भापर २३

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कोई बात निकले, आयेसमाजो चट वेदों के वक्त पलटने लगते हैं, कट मन्त्रों के नये अथे करने के लिये विचारे यास्क मुनि का गला दबाते हैं, ओर कहते हैं उगल | इसका गला रबड़ का है खब लचकीला है सब अर्थ कर देता हे****** ये मज़हबी किताबें अपना सिका लोगों पर जमाये बैठी हैं | सब ब्राह्मण उसी ग्रैले से प्रमाण निकालते हैं सब मुल्ला उसी के सहारे लोगों को लड़ाते हैं | इसीलिये क्रान्ति नया बिल्कुल नया रास्ता माँगती है। टाँके नहीं लगाये जा सकते, क्रान्ति के आशको ! गौर से मेरी बात सुन लीजिये। सबसे पहिले दिमागी आज़ादी दरकार हे। वेद ओर क़॒रान को इल्हामी मानने वाले दोनों ग्रुलांमी की जंजीरों में जकड़े हुए हें। वे कभी आज़ादी नहीं दिला सकते, क्योंकि उनका सब कुछ वेदों में मोजूद है अवाम वेद पढ़ नहीं सकते बराबर गुलामी के गढ़े में पड़े रहेंगे। जब आप इल्हाम को छोड़ देंगे तो संस्कृत लिटरेचर का सारा कूड़ा करकट आपको साफ़ दिखाई देने लगेगा। फिर महाभारत रामायण ओर गीता की नामुमकिन बातें साफ़ दिखाई देंगी, फिर सच ओर भ्ूठ को परखने वाली बुद्धि से आप छाँट सकेंगे, कि क्‍या लेना है ओर क्या छोड़ देना हे, उस वक्त यह पचड़ा नहीं रहेगा, कि फलाँ ऋषि है ओर फ़लाँ इन्सान हे; फ़लाँ प्रमाण हे ओर फ़लाँ नहीं है। उक्त सब इन्सानी दर्जे में जायेंगे ओर हर एक शख्स को, सच भूठ को जानने का अधिकार प्राप्त हो जाए्गा। क्रान्ति

२४ प्रथम आयं-विद्वत्सम्मेलन

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के लिए आज़ाद-खयाली निहायत ज़रूरी है। वह आज़ाद- खयाली हर एक शरूस का पेदायशी हक़ है। इल्हाम; श्रुति, आयत वग्गेरह का माया-जाल अज़ादी का मुखालिफ़ है। सैकड़ों, हज़ारों वर्षों' का संस्कृत लिटरेचर इसमें जाने कितने खुदगज मनुष्यों ने दूसरों के नाम पर क्‍या क्‍या मिला विया है, अगर छाँटन बैठेंगे तो छाँटन वालों के गिरोह बन जायेंगे और वह बैठ कर लड़ने लगेंगे जैसे आयेसमाजी और सनातनधर्मी वेदों के अथा पर लड़ते हैं इस गुलामी की फैक्टरी के गिरा देन का वक्त गया है। जब श्रुति या ऋषि प्रमाण का अडंगा निकल जायेगा तो फिर सब ग्रन्थों में से हम जो मानने लायक मालूम होंगे ले लेंगे, ओर जो मोजूदा जमाने के खिलाफ़ होगा, उसको छोड़ देंगे, और आगे शाहेराह तरक्क़ी पर गामज़न होंगे। अब जो उठता है वह गीता का तजुमा करने लगता है, जो निकलता है वह श्री कृष्ण की बंसरी बजाने लगता है, जो विद्वान बनता है वही उपनिषद्‌, वही दशन लेकर बैठ जाता है। अरे भले आदमियो ! हज़ारों वर्षा से जहाँ खड़े थे वहीं खड़े रहोगे या आगे भी बढ़ोगे ? चबाए हुए को फिर चबाना, बराबर कपड़े उधेड़ कर सीना, यह अब छोड़ने का वक्त गया है। उन ग्रन्थों को पढ़ो, लेकिन उनसे आग बढ़ो वह आगे बढ़ने की अक़ल तब तक हरगिज़ सकेगी जब तक श्री ऋष्ण ईश्वर बने रहेंगे, ऋषि निश्रोन्‍्त समझे जायेंगे ओर वेद इश्वर-वाक्य रहेंगे

स्वागताध्यक्ष का भाषण 2

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मुख्तसिर मेरा निवेदन यह हे कि क्रान्ति नया बिल्कुल नया राम्ता माँगती है वगेरह वरेरह |?

ऊपर उद्धृत की गई पंक्तियों पर कोई विशेष टीका टिप्पणी करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती क्‍योंकि यह युक्ति और प्रमाण से शून्य केवल वृथा प्रलाप मात्र है, जो कि स्वतन्त्रता ओर उन्नति के साधनाभास भ्रमात्मक क्रान्ति के आवेश मे आकर किया गया है में तो इस बात को खयाल में भी नहीं ला सकता कि कोई बड़िवादी तथा विद्या-प्॑रमी व्यक्ति से विद्याविरोधी, लज्ञास्पद विचार भी प्रकट कर सकता है, कि जिनमें उस सारे संस्क्रत साहित्य के इल्मी ख़ज़ाने को बिना उसके दोष दिखलाये, केवल उसके पुराना होने के कारण ही उसको कूड़ा ककट बतलाते हुए उसे त्याग देने की अपील की गई हो कि जिसके अन्तगत संसार भर के इलल्‍्मी ख़जाने के उच्चकोटि के ग्रन्थ-रत्न, वेद, उपनिषद्‌, दशन, आदि आदि भी हैं। इस प्रकार के विचार रखने उनका प्रचार करने वाले भाई मुझे इस कथन के लिए क्षमा करेंगे कि उन्होंने अपने उपयुक्त विचारों द्वारा केवल यह कि संस्कृत-साहित्य के जलाने वाले आरम्भिक काल के निष्ठुर और क्रूर मुसलमान आक्रमणकारियों की उदण्डता की ही फिर से याद ताज़ा करा दी है बल्कि उनकी क्रियात्मक उद्ण्डता की अनुवृत्ति, विद्याविरोधी अपनी मानसिक वृत्ति का भयंकर चित्र भी प्रकाशित कर दिया है। अस्तु, सज्जनों ! उपयुक्त विचारों के

२६ प्रथम आये-विद्वत्सम्मेलन

पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्राचीनता के भगत तो केवल विचार- स्वातन्त्य के ही विरोधी थे, ओर जहाँ खड़े थे उससे आगे बढ़ना नहीं चाहते थे; परन्तु आगे बढ़ो, आगे बढ़ो की दुह्ाई देने वाले यह नवीनता ओर खतन्त्रतावादी सज्जन तो सभ्य संसार की एकत्रित तथा निर्माण की हुई पिछली सारी बहुमूल्य साहित्यिक सम्पत्ति को ही निमू करके मूखता फैलाना चाहते हैं। अथवा यों भी कह सकते हैं कि विद्वत्‌ संसार के उिछले अनमोल अनुभवों, परीक्षणों तथा निरीक्षणों पर पोता फेर कर संसार को अज्ञता, अनिश्चितता, तथा अव्यवस्थिता की अवस्था में ले जाना चाहते हैं। उन्होंने बेअसूला अथवा निरंकुश होने का ही नाम आज़ादी रक्‍्खा हुआ है। ये भाई अपने विचारों पर किसी प्रकार के भी

बन्धन रखने के विरुद्ध हैं। सभा समाजों के नियमों का मानना भी इनके नज़दीक बन्धन और गुलामी है। यह तो आशा ही है कि जो आरयंसमाज प्राचीनता के अन्धे पुजारियां की अआान्ति को दूर करने के लिए अपने जन्म दिन से ही यत्र कर्ता चला रहा है, वह इन नवीनता तथा स्वतन्त्रता के अन्धे भगतों की इस भयंकर धारणा का प्रतिवाद भी अवश्य ही करेगा, परन्तु में भी यहाँ पर उन भाइयों की सेवा में इतना अवश्य निवेदन करू गा कि यदि वे विचार करके देखेंगे तो उन्हें ज्ञाव होगा कि वे शापनी इस प्रकार की विचार तथा आचार पद्धति से प्राचीनता तथा साम्प्रदायिकता का ही बिरोध नहीं कर रहे; बल्कि वे अपनी भी

सवागताध्यक्ष का भाषण २७

हल

एक ओर नवीनता तथा खतन्त्रता वादियों का नवीन सम्प्रदाय खड़ा करके सम्प्रदायों का नम्बर बढ़ा रहे हैं। उनका सब प्रकार के प्राचीन धामिक साहित्य का विरोध जहाँ मनुष्य समाज के लिए भयंकर ओर पतन का हेतु हे, वहाँ उनका सभा-समाजों के नियमों ओर सिद्धान्तों को बन्धन बतलाना भी समाज निर्माण शासत्र के विरुद्ध होने से मनुष्य जाति के लिए हानिकारक है, क्योंकि उनका नवीनता का सिद्धान्त केवल यह कि पुराने संस्क्ृत-साहित्य ओर साम्प्रदायिक विचारों पर ही लागू होगा, बल्कि आज जिस साहित्य ओर विचारों को वे नवीन सममते हैं कल उनके पुराना हो जाने के कारण उन पर भी वह लागू हो सकेगा इसलिए जिस नवीनता के कुठार से आज वह प्राचीन धार्मिक साहित्य ओर साम्प्रदायिकता की जड़ें काटना चाहत हैं कल वही कुठार उनकी आज की नवीनता और उनके अपने इन विचारों के पुराना हो जाने पर उनकी जड़ें भी कारटेगा। इस कारण यह सिद्धान्त जहाँ स्थिर साहित्य का मूल ही काट देता है वहाँ साहित्यिक उन्नति को भी असम्भव बना देता है अथवा प्रत्येक बिद्वान के विचारों तथा अनुभवों के संग्रह को उसके जीवन के साथ ही समाप्त कर देता है। क्‍योंकि वह उसके पश्चात्‌ उत्पन्न होने वालों के लिए पुराना हो जाता है, और उन्नति तब हो सकती है जब कि पिछले विद्वानों के ग्रन्थों को पढ़कर उनके अनुभवों से लाभ उठाते हुए आगे बढ़ने की योग्यता प्राप्त की

श्द प्रथम आये-बिद्वत्सम्मेलन

जाय | इसके अतिरिक्त यह सिद्धान्त मानवी प्रकृति से भी विरुद्ध है। क्योंकि मनुष्य का शरीर प्राकृतिक होने से जहाँ वह प्राकृतिक नियमों के बन्धन से बँधा हुआ है वहाँ मनुष्य के स्वभाव-सिद्ध, ममननशील और सामाजिक व्यक्ति होने से उसके स्वतन्त्र विचारक होने पर भी उसके आचार-विचार पर मनुष्यत्व तथा सामाजिक अर्थात्‌ पारिवारिक, नागरिक, देश-सम्बन्धी राष्ट्रीय और सावजनिक नियमों के बन्धन लगे हुए हैं। यह तो हो सकता है बल्कि होना चाहिए, कि यदि किसी सभा सुसाइटी अथवा समाज के नियम सिद्धान्त मनुष्यत्व तथा सामाजिक हितों के विपरीत हों या कि नैसर्गिक सत्यों तथा सृष्टि के नियम के विरुद्ध हों, तो नवीनता तथा स्वतन्त्रतावादियों को ही नहीं बल्कि प्रत्येक को उनके मानने से इन्कार कर देना चाहिए, परन्तु मनमानी नवीनता तथा स्वतन्त्रता अर्थात्‌ निरंकुशता के आवेश में उन्हें बन्धन बतलाना और उनसे द्वेष करना उनके विपरीत घृणा फैलाना मनुष्यत्व तथा सामाजिक हितों के विपरीत ओर ढुःख का कारण है | क्रान्ति उद्देश्य नहीं बल्कि वास्तविकता ओर सत्यतारूओ उद्देश्य की प्राप्ति के साथन हैं, ओर साधन भी वह क्रान्ति, नवीनता तथा स्वतन्त्रता जो कि प्राचीनता के मिटाने के लिए ही नहीं, बल्कि सुधार, सत्यता और वास्तविकता की शापना के लिए हो, क्‍योंकि यही सुधारकों के ध्येय हैं ओर इन्हीं से मानवी संसार का उत्थान और कल्याण होता हे यह

स्वागताध्यक्ष का भापण २९

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चाहे प्राचीन ग्रन्थों से मिले अथवा नवीन पुस्तकों से, ले लेने चाहिएं। सदू्सत के निशय रूपी ध्येय से शून्य प्राचीनता, नवीनता तथा म्बतन्त्रता की उपासना अधोगति का ही कार्ण है। यदि प्राचीनता के प्रतिनिधि और नवीनता के भ्रगत इस वैदिक सिद्धान्त को अपना पथप्रदशक बना लें तो परस्पर का विरोध भी मिट सकता है, ओर दोनों की अभीष्ट-सिद्धि तथा यथायोग्य सुधार और उन्नति भी हो सकती है

ज्ञान का स्रोत

यह विपय सिद्धान्तात्मक, मौलिक ओर बड़ा गहन है इसका समाधान करना आप सरीखे उच्च कोटि के किसी तत्तवज्ञ पंडित का ही काम है, क्योंकि यह विषय दाशनिक है। मेरे जैसे अल्यज्ञ का इस विषय पर कुछ लिखना अनधिकार चेष्टा करना है परन्तु ऐसा होते हुए भी में इस विषय पर कुछ लिखने का साहस इसलिए करता हूं कि मेरी सम्मति में वेइ-सम्बन्धी अन्य निबन्धों के पढ़े जाने के पूव इस मुख्य विपय का वणन किया जाना भी आवश्यक है आशा है कि पंडित महोदय मेरी इस धृष्टता पर ध्यान देकर मेरी भूलों को सुधार लेंगे।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि प्राचीन आय विद्वानों ने एक स्वर से वेदों को अपोरुपेय माना है। आयेसमाज के प्रवत्तक ऋतषि दयानन्द ने भी बेदां को इंश्वरीय ज्ञान ओर सत्र सत्य

३० प्रथम आये-विद्व त्सम्मेलन

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विद्याओं का भण्डार बतलाया है। परन्तु यह भी सत्य है कि वतमान काल के बहुत से विद्वान किसी भी इंश्वरीय ज्ञान के क़ायल नहीं हैं, बल्कि इनमें से कई एक तो किसी अपोरुषेय अथवा इश्वरीय ज्ञान के मन्‍्तव्य को मानना विद्धत्ता का एक प्रमाण या सार्टिफिकेट सममते हैं ओर किसी भी ईश्वरीय ज्ञान के मानने को अन्धविश्वास बतलाते हैं | मेरी सम्मति में विशेष कर इसके दो ही कारण हैं :---

१. पहला कारण यह है कि उनमें बहुत थोड़े विद्वान हैं जो कि आरम्भिक ज्ञान की जटिल समस्या पर गम्भीरता से विचार करने का परिश्रम उठाते हैं जो सज्जन कुछ विचा